श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 110, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
मुनि परम शान्तिको प्राप्त हो गये ॥ १९-२० ॥ हे परमेश्वर! षडक्षरमन्त्रके प्रभावसे मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने कृपा करके मुझे इस मन्त्रका उपदेश दिया था ॥ २१ ॥ उस समय ब्रह्माजीने मुझसे कहा था कि जब तुम इस मन्त्रका विस्मरण कर दोगे, तभी तुम अपने पदसे च्युत हो जाओगे और दुर्दशाको प्राप्त हो जाओगे ॥ २२ ॥ तब (विस्मृत हुए मन्त्रवाले) मुझ अत्यन्त लोलुपने दुर्भाग्यके वशीभूत होकर उन मुनिपत्नी अहल्याका सतीत्व नष्ट किया, इसलिये मैं दुर्गतिंको प्राप्त हो गया ॥ २३ ॥ हे देवेश! पुनः बृहस्पतिजीके द्वारा उपदिष्ट उस मन्त्रके जपके प्रभावसे मैं इस समय सहस्र नेत्रोंवाला होकर आपके स्वरूपका दर्शन कर रहा हूँ ॥ २४ ॥ मैं एक अन्य वरकी याचना करता हूँ; क्योंकि आप चिन्तित अर्थको देनेवाले (मनोकामना पूर्ण करनेवाले) हैं, इसलिये यह कदम्बनगर 'चिन्तामणिपुर' - इस नामसे प्रसिद्ध हो जाय ॥ २५ ॥ हे विघ्नराज ! इस समय अनुष्ठानके फलरूपमें मैंने आपके चरणकमलोंका दर्शन कर लिया। अब मैं जो वर माँग रहा हूँ, उसे मुझे दीजिये। हे देव! जिससे आपका कभी विस्मरण न हो; हे देव! वैसा करो। हे विभो! आपके चरणकमलोंमें मेरा मन सदैव रमण करता रहे ॥ २६-२७ ॥ हे गजानन ! आजसे इस लोकमें यह [विशाल] सरोवर 'चिन्तामणितीर्थ' के रूपमें प्रसिद्ध हो जाय ॥ २८ ॥ हे जगद्गुरु ! इस सरोवरमें स्नान करने, यहाँ दान देनेसे मनुष्योंको आपकी कृपासे धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष-सम्बन्धी सिद्धियाँ प्राप्त हों ॥ २९ ॥ मुनि बोले- इन्द्रके वचनोंको सुनकर जगत्पति विघ्नेश्वर गणेशजी मेघसदृश गम्भीर और मधुर स्वरमें बोले- ॥ ३० ॥ [विघ्न ] विनायक श्रीगणेशजी बोले - हे विभो! जिन-जिन वरदानोंके लिये तुमने प्रार्थना की, वे सब तो तुम्हें प्राप्त होंगे ही, एक अन्य वरदान भी मैं तुम्हें देता हूँ कि तुम अपने इन्द्रपदपर सदैव स्थिर रहो ॥ ३१ ॥ हे देवेन्द्र ! तुम्हें मेरी निरन्तर अविस्मृति रहे अर्थात् तुम मेरा स्मरण कभी न भूलो। हे वासव ! जब तुमपर कोई संकट आये तो मुझे स्मरण कर लेना ॥ ३२ ॥ मैं सदैव प्रकट होकर तुम्हारे सारे कार्योंको सम्पादित कर दूँगा। यह (कदम्बपुर) पृथ्वीपर चिन्तामणिपुर नामसे प्रसिद्ध होगा और मैं चिन्तामणि विनायकके रूपमें इच्छित मनोकामनाओंको प्रदान करूँगा ॥ ३३-३४ १/२ ॥ नारदजी बोले- तब इस प्रकार वर प्राप्त करके इन्द्रने स्वर्गस्थित गंगाजीके जलका आनयन किया और उसके द्वारा उन सर्वव्यापक महाभाग गणेशजीका उनके परिवार (पत्नियों- सिद्धि-बुद्धि और पुत्रों - क्षेम-लाभ)- सहित अभिषेक एवं पूजन किया ॥ ३५-३६ ॥ देवराज इन्द्रद्वारा पूजित होकर वे प्रभु गणेशजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तब शतक्रतु इन्द्रने भी स्फटिकसे निर्मित सर्वांगसुन्दर मंगलमयी दिव्य वैनायकी मूर्तिकी वहाँ आदरपूर्वक स्थापना की और सुवर्ण तथा रत्नोंसे जटिल विशाल मन्दिर बनवाया ॥ ३७-३८ ॥ उनकी प्रदक्षिणा और नमस्कार करके शतक्रतु इन्द्र अपने स्थानको चले गये। तबसे इस पृथ्वीपर वह महान् सरोवर चिन्तामणि [तीर्थ]-के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३९ ॥ आज भी पवित्र जलवाली गंगाजी शतक्रतु इन्द्रके आदेशसे उस मूर्तिको नित्य अभिषेक करके सदा अपने धामको चली जाती हैं ॥ ४० ॥ [नारदजी कहते हैं- हे राजन् !] इस प्रकार मैंने तुमसे अद्भुत दर्शनवाले इस क्षेत्रकी महिमा कह दी। [यह क्षेत्र] सभी दोषोंका हरण करनेवाला, ऐश्वर्यसम्पन्न, सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाला और मंगलमय है ॥ ४१ ॥ हे पृथ्वीपति ! तुम वहाँ जाकर विधिपूर्वक स्नान करो, इससे तुम सभी दोषोंसे मुक्त हो जाओगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ४२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] तदनन्तर मुनि नारद उन राजा रुक्मांगदको आशीर्वादोंसे अभिनन्दितकर और आदरपूर्वक उनसे विदा लेकर शीघ्र ही चल दिये ॥ ४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'चिन्तामणितीर्थवर्णन' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_5_1_Back