भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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उ०ख०-अ०३५] * चिन्तामणिक्षेत्रस्थ गणेशतीर्थमें स्नानसे राजा रुक्मांगदको दिव्य देहकी प्राप्ति * १०९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पैंतीसवाँ अध्याय चिन्तामणिक्षेत्रस्थ गणेशतीर्थमें स्नानसे राजा रुक्मांगदको दिव्य देहकी प्राप्ति तथा उनका माता-पितासहित विनायकलोकको जाना व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन्!] देवर्षि नारदके चले जानेपर उन राजा रुक्मांगदने तब क्या किया? आप मुझसे इस मनोरम कथाको कहिये॥ १॥ ब्रह्माजी बोले—हे पुत्र! जब इस प्रकारका अत्यन्त महान् उपदेशकर नारद नामवाले मुनि चले गये, तभी हर्षयुक्त राजा रुक्मांगदने अपनी उस चतुरंगिणी सेनाको देखा॥ २॥ उस सेनाने भी विकृत रूपमें उन राजाको देखा, जो पूर्वकालमें स्वर्णसदृश कान्तिवाले और रूपमें रतिपति कामदेवके समान थे। वे अब इस प्रकारके रूपवाले कैसे हो गये—ऐसा संशय करते हुए उन लोगों [सैनिकों]- ने राजासे इस विषयमें प्रश्न किया—॥ ३॥ सैनिकोंने कहा—हे राजेन्द्र! आपके दर्शनको अत्यन्त उत्सुक हम लोग भूखे-प्यासे पहाड़ों, जंगलों और नदियोंमें भटकते-भटकते यहाँतक आ गये॥ ४॥ स्थान-स्थानपर देखते-खोजते हुए हमने आपके चरणकमलोंको प्राप्त कर लिया, परंतु आपको इस अवस्थामें देखकर आपके दुःखसे हम लोग और अधिक दुखी हो गये हैं। हे नृपश्रेष्ठ! ऐसा किस कारणसे हो गया है, वह आप हमसे कहिये॥ ५१/२॥ राजा बोले—मैं तुम लोगोंसे आगे चला आया था। उस समय मैं भूख और प्याससे पीड़ित था। शीघ्र ही मैंने अपने सामने वाचकनविमुनिका आश्रमरूपी गृह देखा। वहाँ जाकर मैंने उनकी सुमुखी पत्नीको देखा॥ ६-७॥ उस सुन्दरीका नाम मुकुन्दा था। मैंने उससे जलकी याचना की। परंतु वह दुष्टा और स्वेच्छाचारिणी थी, उसने मुझसे अकल्याणकारी वचन कहे॥ ८॥ [उसने मुझसे कहा कि] तुम मेरे साथ रतिक्रीड़ा करो, अन्यथा मैं तुम्हें शाप दे दूँगी, परंतु मैंने शुद्ध- अन्तःकरणसे उसे बलपूर्वक निवारित कर दिया॥ ९॥ उसके पति जब स्नान करने चले गये थे, तभी उस दुष्टाने [अपने प्रस्तावमें असफल होकर] मुझे क्रोधित होकर शाप दे दिया। तब मैं दुखी होकर एक वृक्षके नीचे बैठ गया॥ १०॥ [उस समय] पूर्वजन्मके पुण्योंके प्रभावसे मुझे नारदमुनिके दर्शन हुए। उन्होंने मुझसे अरिष्टोंका नाश करनेवाली उत्तम विधि कही—चिन्तामणिक्षेत्रके अन्तर्गत गणेशतीर्थ स्थित है। नारदजीने विस्तारपूर्वक उसकी महिमाका वर्णन किया॥ ११-१२॥ उन दिव्यदृष्टिसम्पन्न मुनिने मुझे वहाँ स्नान करनेके लिये सम्यक् रूपसे कहा था, अतः मैं अपने दोषका निवारण करनेके लिये वहाँ स्नान करने जाऊँगा॥ १३॥ यदि इच्छा हो तो तुम लोग भी मेरे साथ स्नान करनेके लिये वहाँ चलो। वहाँ स्नानकर यथाशक्ति दान देकर और [भगवान् चिन्तामणि]-विनायकका सम्यक् प्रकारसे पूजन करके गणेशतीर्थ एवं भगवान् गणेशके प्रभावसे पवित्र होकर हम सब अपने नगरको जायँगे॥ १४१/२॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यास!] राजाका इस प्रकारका निश्चय जानकर वे सब भी उनके साथ चल दिये॥ १५॥ हे मुनीश्वर! गणेशतीर्थका दर्शनकर वे राजा रुक्मांगद पूर्वकी भाँति तपाये हुए सोनेके समान स्वर्णिम आभावाले दिव्य शरीरसे सुशोभित हो गये॥ १६॥ तब राजा रुक्मांगदने मान लिया कि नारदजीद्वारा कही गयी बात अमृतके समान [हितकारी] थी। तदनन्तर राजाने वहाँ स्नान करके परम प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दिये। [विघ्न] विनायक गणेशजीका पूजन करके उन्होंने ब्राह्मणों और सेवकोंसहित एक तेजोरशिका दर्शन किया, जो कि सूर्यसदृश प्रकाशमान विमान था। वह विनायकगणों, अप्सराओं और किन्नरोंसे युक्त था॥ १७–१९॥ राजाने उन्हें नमस्कारकर पूछा कि आप लोग कौन Kalyana Visheshank 2021_Section_5_2_Front