श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कर दिया। हे राजन्! तब देवर्षियोंद्वारा कही गयी इस वाणीको सुनकर तथा वहाँ आये हुए सभी देवताओंकी बातोंको भी आदरपूर्वक सुनकर इन्द्र कमलिनीकोशसे बाहर आ गये ॥ ७-८ ॥ उस समय उनका शरीर पीप और रक्तसे लिप्त, मलिन तथा सड़े हुए मांसकी गन्धसे युक्त था। उन देवराजको इस प्रकार देखकर [भी] देवताओंने उन्हें नमस्कार किया ॥ ९ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! अपने नासिका-छिद्रोंको वस्त्रके अग्रभागसे ढककर बृहस्पतिजीने सम्यक् रूपसे स्नान और तदनन्तर आचमन किये इन्द्रको गणेशजीके षडक्षर महामन्त्रका उपदेश किया। उन (बृहस्पतिजी)- के द्वारा मन्त्रोपदेश करते ही इन्द्र दिव्य देहवाले हो गये ॥ १०-११ ॥ [उस समय] वे सहस्र नेत्रोंसे युक्त और शोभासम्पन्न होकर दूसरे सूर्यकी भाँति प्रतीत हो रहे थे। तब वाद्योंकी ध्वनि, देवताओंद्वारा की गयी जय- जयकारकी ध्वनि और गन्धर्वोंके गायनकी ध्वनिसे दसों दिशाएँ अनुनादित हो उठीं। सभी देवताओंने हर्षित होकर पुष्पोंकी वर्षा की। नारद आदि सभी मुनियोंने उन इन्द्रको आशीर्वाद प्रदान किये। [कुछ] देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक उनका आलिंगन किया और अन्य देवोंने उनकी स्तुति की ॥ १२-१४ ॥ कुछ देवताओंने प्रसन्न मनसे उनसे कहा कि हम आपके संरक्षणमें सनाथ हो गये। आपके बिना हमारी शोभा वैसे ही नहीं होती थी, जैसे चन्द्रमाके बिना आकाशकी शोभा नहीं होती ॥ १५ ॥ जैसे अपने माता-पिताके बिना बालक सर्वथा सुखका अनुभव नहीं कर पाते, वैसे ही हम सबको भी आपके बिना शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती ॥ १६ ॥ [नारद] मुनि बोले-[हे राजन्!] देवताओंके इस प्रकारके वचन सुनकर शतक्रतु इन्द्र हर्षित हो गये और उन्होंने प्रसन्न मनसे देवताओंसे यथार्थ बात कही ॥ १७ ॥ इन्द्र बोले-देवर्षि नारदके कथनसे विमोहित होकर मैंने जो अत्यन्त गर्हित कर्म किया, उसका असहनीय फल मुझे प्राप्त हो गया। मैं आप सब श्रेष्ठ देवगणों तथा परमप्रभावशाली समस्त ऋषियोंको नमस्कार करता हूँ, आप सबने आज मेरा उस पापके गहन पंकसे उद्धार कर दिया। आप सभी मेरा उद्धार करनेवाले हैं, मैं आप सबकी शरणमें हूँ, आप सबको मेरी रक्षा करनी चाहिये ॥ १८-१९ ॥ आप सबने उन गौतममुनिको प्रसन्न करनेका कैसे प्रयत्न किया और उन्होंने कैसे मेरे हितार्थ उस परम मन्त्रका कथन किया, आप सब उसे बतलायें ॥ २० ॥ देवताओंने कहा-हे देवेन्द्र! हम लोग नारद मुनि और देवगुरु बृहस्पतिजीको आगेकर उन गौतम मुनिके पास गये और उन्हें सम्यक् रूपसे साष्टांग प्रणाम करके सुधामयी मनोहर वाणीसे उन्हें प्रसन्न किया और तब हमारे द्वारा याचना किये जानेपर उन्होंने हमें अपना मन्त्र (स्वयंद्वारा जप किया जानेवाला मन्त्र) बतलाया, जिसके उपदेशसे आप सहस्र नेत्रवाले होकर सबके लिये सुखप्रद हो गये। अब आप अपनी अमरावतीपुरीको जायें और लोकों तथा देवताओंका पालन करें ॥ २१-२२ ॥ इन्द्र बोले-हे श्रेष्ठ देवताओ और ऋषियो! मैं गणेशजीका कृपा-प्रसाद प्राप्त किये बिना अपनी पुरीको नहीं जाऊँगा। आप सबने साधुवादका कार्य किया है, अब आप लोग प्रसन्नतापूर्वक खुशी मनाते हुए अपने-अपने दिव्य धामको जायें। आप सबने मेरे लिये बहुत श्रम किया। मैं लज्जाके कारण छिपा हुआ था, मेरी बहुत दुर्गति हो रही थी, आपने उससे मुझे बाहर निकाला। आप सबने उन उग्र तेजवाले गौतममुनिको मेरे हितार्थ प्रसन्न किया। आप सबकी कृपासे ही मुझे बहुत-से (सहस्र) नेत्रोंकी प्राप्ति हुई है ॥ २३-२४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'षडक्षरमन्त्रके प्रभावका वर्णन' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥