श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०३३ ] * गणेशजीके षडक्षरमन्त्रके प्रभावसे इन्द्रको सहस्र नेत्रोंकी प्राप्ति * १०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
**देवता बोले—**ईश्वरका अपराध करनेके कारण कामदेव भस्मत्वको प्राप्त हो गया था अर्थात् भस्म हो गया था, परंतु अपराधी होते हुए भी इन्द्रको आपने प्राणहीन नहीं किया। हे मुने! अब वह पुनः अपना स्थान जैसे पा जाय, वैसा ही आप करें। हम सबके वचनोंको मानकर आप उसके अपराधोंको क्षमा कर दें। आपके द्वारा ऐसी कृपा करनेपर हम सबकी भी इच्छा पूर्ण हो जायगी॥ २४—२६॥ **नारदजी बोले—**देवसमुदायके वचनोंको सुनकर उन गौतममुनिने सभी देवगणोंसे हँसते हुए प्रत्युत्तरमें इस प्रकार कहा—॥ २७॥ **गौतमजी बोले—**उस पतित, पापी, कपटी, मूर्ख, दुष्ट और विवेकहीनका तो नाम भी नहीं लेना चाहिये॥ २८॥ हे देवताओ! जिसे अपने दुष्कृतका पछतावा न हो, उसके उद्धारका तो कोई उपाय ही नहीं होता, फिर भी आप सबके वचनका मान रखनेके लिये उसका हित करूँगा॥ २९॥ क्योंकि जब आप लोग रुष्ट हो जायँगे तो शाप मुझपर पड़ जायगा, जिसपर बहुत-से प्राणी अनुग्रह करते हैं, वह पवित्र हो जाता है॥ ३०॥ अतः मैं आप लोगोंको एक मन्त्र बतलाता हूँ, आप लोग उस मन्त्रका उस इन्द्रको उपदेश कर देना। यह महासिद्धिप्रद षडक्षरमन्त्र उन देवाधिदेव विनायक गणेशजीका है, जो ब्रह्मारूपसे सर्वकर्ता, शिवरूपसे सर्वहर्ता, विष्णुरूपसे सबके पालनकर्ता और कृपाके निधान हैं। इस मन्त्रका उपदेश करनेपर वह दिव्य देहसे सम्पन्न हो जायगा। उसके शरीरमें बने स्त्रीयोनिके चिह्न नेत्र हो जायँगे। वह इन्द्र अपना राज्य पा जायगा—यह मैं आप लोगोंसे सत्य कह रहा हूँ॥ ३१—३३ १/२॥ [नारदजी बोले—हे राजन्!] देवताओंसे इस प्रकार कहकर वे गौतममुनि मौन हो गये॥ ३४॥ तदनन्तर उन देवगणोंने गौतममुनिका प्रसन्नतापूर्वक पूजनकर उन्हें नमस्कार किया और उनकी प्रदक्षिणा की। फिर उनकी आज्ञा प्राप्तकर मुनिकी प्रशंसा करते हुए वे वहाँ गये, जहाँ बलासुर और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र थे। उस समय उन देवताओंकी यह मान्यता थी कि गौतममुनिसे बढ़कर ज्ञानवान् और सात्त्विक दूसरा कोई नहीं है॥ ३५-३६॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'मन्त्रकथन' नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३२॥ ——————————————
तैंतीसवाँ अध्याय गणेशजीके षडक्षरमन्त्रके प्रभावसे इन्द्रको सहस्र नेत्रोंकी प्राप्ति
नारदजी बोले— [हे राजा रुक्मांगद!] वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्रसे देवता बोले—हे सौ यज्ञोंके कर्ता इन्द्र! बाहर आओ। हम लोग देवर्षि नारदके सहित वहाँ (गौतममुनिके आश्रमपर) गये थे और वहाँ जाकर गौतममुनिको प्रसन्नकर यहाँ आये हैं। उन्होंने तुम्हारी निष्कृतिका उपाय बताया है और तुम्हें वरदान भी दिया है॥ १-२॥ सन्तजन कोई दोष उत्पन्न हो जानेपर स्वयं ही जनसमुदायमें उसका ख्यापन कर देते हैं और सम्यक् रूपसे उसका प्रायश्चित्तकर उसके प्रभावको निरर्थक कर देते हैं॥ ३॥ छिपानेसे दोषकी वृद्धि होती है और प्रकट कर देनेसे उसका नाश हो जाता है। इसलिये हे देवेन्द्र! तुम भी बाहर आकर उसे कह दो॥ ४॥ तुम अपने दोषपूर्ण कृत्यको देवर्षि नारदजीसे कह दो और गौतममुनिद्वारा कथित उपाय करो। भगवान् विनायक गणेशजीके षडक्षर मन्त्रको तुम ग्रहण करो॥ ५॥ गिरिराजनन्दिनी पार्वती और महेशके विवाहमें ब्रह्माने [पार्वतीके] अँगूठेका दर्शन कर लिया था, जिससे उनके तेजका पतन हो गया और तब उन्होंने लज्जित होकर सिर झुका लिया॥ ६॥ इसे जानकर महेश्वरने उपायपूर्वक उन्हें दोषरहित