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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 656 में से

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पृष्ठ 106

१०४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

सुनकर वे सभी देवता शोकमग्न हो गये। वे अत्यन्त दुखित होकर रुदन करने लगे और हड़बड़ीमें जोर- जोरसे साँस लेने एवं छोड़ने लगे ॥ ४ ॥ देवताओंने कहा- [हे नारदजी !] जिन्होंने सौ यज्ञोंका सम्पादन किया, जिन्होंने दानवोंको परास्त किया, जिन्होंने त्रैलोक्यका पालन किया और सौभाग्यशाली ऐन्द्रपदका भोग किया, बहुत-से देवताओं और ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मणोंका पूजन किया, दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ अनेक प्रकारके भोगोंका भोग किया-वे देव [-राज] इन्द्र कहाँ रह रहे होंगे? वे भोजन और शयन कैसे कर रहे होंगे? आज हम उनके या अपने [हितके] लिये किसकी शरणमें जायें ? ॥ ५-७॥ कौन हम सबका, ऐन्द्रपदका और शचीका पालन करेगा ? मुनिश्रेष्ठ गौतम कैसे प्रसन्न हो सकेंगे ? ॥ ८ ॥ वे गौतममुनि अपनी भार्यासे वियुक्त हैं और रोषपूर्वक उस इन्द्रके अपराधका स्मरण करते हैं। गौतममुनिको प्रसन्न करनेका अन्य कोई उपाय हमें दिखायी भी नहीं देता है ॥ ९ ॥ हे नारदजी ! इसलिये हम लोग गौतममुनिको सान्त्वना देनेके लिये जायँगे। इस प्रकार वे देवता नारदजीके साथ गौतममुनिके आश्रमपर गये ॥ १० ॥ [वहाँ] गौतममुनिके पास जाकर उनके शरणागत होकर हाथ जोड़ करके अनेक प्रकारसे प्रार्थनाकर [देवता] उन्हें प्रसन्न करने लगे ॥ ११ ॥ देवता बोले- हे मुने! आपका प्रभाव कह सकनेकी शक्ति हममें नहीं है। भला, सुमेरु और हिमालयकी गरिमा कौन कह सकता है ? ॥ १२ ॥ वर्षाकी बूँदों, पृथ्वीके धूलिकणों, गंगाजीकी बालुकाके कणों, समुद्रके जलकणों और भगवान् विष्णुके गुणोंकी गणना कौन मूढ़बुद्धि कर सकता है ? ॥ १३ ॥ पूर्वकालमें [अकालके समय] आपने प्रातः- काल बीज बोकर मध्याह्नमें फसल तैयार कर ली थी और [दुर्भिक्षपीड़ित] श्रेष्ठ ऋषियोंकी रक्षा की थी ॥ १४ ॥ वालखिल्य मुनियोंने यज्ञ करके दूसरे इन्द्रकी रचना कर दी थी, पर बादमें ब्रह्माजीकी प्रार्थनापर उसे पक्षियोंका इन्द्र बना दिया था ॥ १५ ॥ एक [अगस्त्यमुनि]-ने जलनिधि (समुद्र)-को चुल्लूमें भरकर पी लिया था, बुद्धिमान् गाधिपुत्र विश्वामित्रके द्वारा तो दूसरी सृष्टिका ही निर्माण प्रारम्भ कर दिया गया था ॥ १६ ॥ महात्मा च्यवनके द्वारा इन्द्रकी भुजाका स्तम्भन कर दिया गया था। इसलिये सभी प्राणियोंको आप- जैसे मुनियोंकी सब प्रकारसे सेवा और उन्हें नमन करना चाहिये; क्योंकि लोकोपकारमें रत और दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले आप-जैसे ऋषि-मुनियोंका दर्शन, सम्भाषण, पूजन और स्पर्श पापोंका नाश करनेवाला होता है। हम लोग इन्द्रपर आपके अनुग्रहके निमित्त आपकी शरणमें आये हैं, आप ही कृपा करनेमें समर्थ हैं ॥ १७-१८१/२॥ गौतमजी बोले- आप लोगों (देवताओं)-का दर्शन चर्म चक्षुवाले [हम-जैसे मनुष्यों]-को नहीं होता, मेरे किसी पुण्यका उदय हुआ है, जिससे आपका दर्शन हो सका है, यह मनुष्योंकी मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। आप सबके दर्शनमात्रसे मेरा जन्म, मेरा आश्रम, मेरी तपस्या, मेरा दान, मेरी देह और आत्मा तथा मेरे द्वारा किये गये व्रत- सभी सार्थक हो गये। इस समय आप सब मुझसे किस विषयमें प्रार्थना कर रहे हैं, उसे मेरे समक्ष निरूपित करें, यदि मेरे करनेयोग्य होगा तो आप सब देवताओंके स्मरणके प्रभावसे मैं उसे अवश्य करूँगा ॥ १९-२११/२॥ मुनि (नारदजी) बोले- [हे राजा रुक्मांगद!] मुनि गौतमके इस प्रकारके वचन सुनकर वे देवता इस प्रकार हर्षित हो गये, जैसे [पूर्ण] चन्द्रमाके उदय होनेपर समुद्र हर्षको प्राप्त करता है अथवा जैसे बालककी [तोतली] वाणी सुनकर माता-पिता मुदित होते हैं।* तब उन सबने महामुनि गौतमसे प्रार्थना की ॥ २२-२३१/२॥

  • जौं बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता ॥ (रा०च०मा० १।८।९)