श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 114, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें११२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- ज्योतिषशास्त्रमें पारंगत द्विजोंसे अनुज्ञा लेकर उन्होंने [उस शिशुका] गृत्समद - यह नाम रखा। तदनन्तर पाँचवें वर्षमें उसका व्रतबन्ध-संस्कार किया ॥ १६ ॥ उन्होंने उस बटुकके चार वेदव्रत संस्कार सम्पन्न किये। तेजसे सम्पन्न होनेके कारण वह एक बार बोलनेपर ही वेदमन्त्रोंको ग्रहण कर लेता था ॥ १७ ॥ इस प्रकार वह वेदशास्त्रका निधान और अपने कर्ममें भी कुशल हो गया। किसी समय शुभ मुहूर्तमें उसके पिता वाचक्नवीने उसे ऋग्वेदके महान् मन्त्र 'गणानां त्वा० २' का उपदेश दिया और कहा कि यह वैदिक महामन्त्र सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है ॥ १८-१९ ॥ यह आगमोंमें कहे गये सम्पूर्ण मन्त्रोंमें श्रेष्ठ है। भगवान् गजानन गणेशजीका ध्यान करके तुम स्थिर चित्तसे इस मन्त्रका जप करो ॥ २० ॥ इससे तुम परम सिद्धिको प्राप्त कर लोगे और तुम्हारा यश संसारमें फैल जायगा। तब विप्र गृत्समद पिताके मुखसे मन्त्र प्राप्तकर अनुष्ठानपरायण होकर जप और ध्यानमें लग गये। इस प्रकार उन मुनिश्रेष्ठका बहुत समय व्यतीत हो गया ॥ २१-२२ ॥ उस समय मगध देशमें जो राजा थे, उनका भी नाम मगध ही था। वे सुन्दर रूपवाले, महान् स्वाभिमानी, दानवीर, शत्रुनाशक, अनेक प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित, महामूल्यवान् आसनपर स्थित, न्यायी, धैर्यवान्, दूसरे इन्द्रके समान, चतुरंगिणी सेनासे समन्वित, ज्ञानी और विद्वानोंका सम्मान करनेवाले थे। उनके दो मन्त्री थे, जो ज्ञाननिधान और गुणोंमें बृहस्पतिसे भी बढ़कर थे ॥ २३-२५ ॥ उन (राजा मगध)- की पत्नीका नाम अम्बिका था, जो मनोहर रूपवाली अत्यन्त गुणवती, पतिव्रता, महान् सौभाग्यशालिनी और शाप देने तथा अनुग्रह करनेमें सक्षम थी ॥ २६ ॥ [एक बार] उन राजाके यहाँ पितृश्राद्धमें राजाद्वारा आमन्त्रित वेदोंमें पारंगत वसिष्ठ, अत्रि आदि बहुत-से महर्षि आये थे ॥ २७ ॥ तपस्वी और पवित्र अन्तःकरणवाले गृत्समदको भी वहाँ बुलाया गया था। वहाँ किसी शास्त्रसम्बन्धी प्रसंगमें गृत्समदने गर्वपूर्ण बात कही ॥ २८ ॥ तब उन मुनियोंके बीचमें ही अत्रिजी इस प्रकार कहने लगे कि 'तुम्हें धिक्कार है ! धिक्कार है ! तुम इस बातपर विचार करो, चूँकि तुम तपस्वी हो, इसीलिये मान्य हो। तुम मुनि नहीं हो; क्योंकि तुम्हारा जन्म राजकुमार रुक्मांगदसे हुआ है। तुम हम सबके समक्ष पूजा पानेके योग्य नहीं हो, अतः अपने आश्रमको चले जाओ' ॥ २९-३० ॥ अत्रिके इस प्रकारके वचन सुनकर वे गृत्समद क्रोधसे अग्निके समान प्रदीप्त हो उठे। [उस समय] ऐसा लगता था, मानो वे त्रिलोकीको भस्म कर डालेंगे और उन मुनियोंको खा जायँगे ॥ ३१ ॥ उनको देखकर अन्य बहुत-से मुनि तो इस प्रकार पलायन कर गये, जैसे सिंहको देखकर हरिण भाग जाते हैं। उन्होंने वहाँ सभामें बैठे हुए वसिष्ठ आदि मुनियोंसे कहा- ॥ ३२ ॥ गृत्समद बोले- हे मुनीश्वरो ! यदि मैं रुक्मांगदका पुत्र न सिद्ध हुआ तो मैं अपनी शापाग्निसे तुम सबको भस्मावशेष कर दूँगा ॥ ३३ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यास !] उन सभी मुनियोंसे इस प्रकार कहकर वे अपनी माँके पास पहुँचे। गृत्समदने उससे पूछा- अरी दुष्टे! अत्यन्त कामाचारिणी मुकुन्दा! बता, मेरा पिता कौन है? अन्यथा तू भस्म हो जायगी। तब उनके इस प्रकारके वचन सुनकर मुकुन्दा अत्यन्त व्याकुल होकर उसी प्रकार काँपने लगी, जैसे आँधीके वेगसे पुष्पयुक्त कदलीवृक्ष ! वह असती हाथ जोड़कर अत्यन्त दीन वाणीमें बोली- ॥ ३४-३६ ॥ मुकुन्दा बोली- आखेटमें आसक्त चित्तवाले नृपश्रेष्ठ रुक्मांगद अपने साथवालोंसे बिछुड़कर यहाँ आ गये थे। १-चार वेदव्रत हैं- १. महानाम्नी व्रत, २. महाव्रत, ३. उपनिषद् व्रत तथा ४. गोदान। प्रथमं स्यान्महानाम्नी द्वितीयं स्यान्महाव्रतम् । तृतीयं स्यादुपनिषद् गोदानाख्यं ततः परम् ॥ (संस्कारमयूखमें आश्वलायनका वचन) २- गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् । ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥ (ऋक्० २।२३।१)