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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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उ०ख०-अ०३६ ] * गृत्समदमुनिके जन्मकी कथा * १११ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कर दिया ॥ ४२ ॥ कुशनिर्मित प्रतिकृतिके स्नानजन्य पुण्यफलको [अन्य लोगोंके निमित्त] देनेमात्रसे विनायक (गणेशजी)-की आज्ञासे वहाँ अन्य बहुत-से विमान आ गये ॥ ४३ ॥ उनमें-से प्रत्येक आकाशगामी विमानमें वे एक- एक करके बैठ गये। इस प्रकार [राजा] रुक्मांगद, [उनके पिता] भीम और उनकी माता चारुहासिनी तथा अन्य सभी लोग वहाँ पहुँच गये, जहाँ भगवान् विनायक थे। इस प्रकार उस नगरके बालकसे लेकर वृद्धतक तथा ब्राह्मणसे चाण्डालतक— सभी गणेशतीर्थके स्नानजनित पुण्यफलके प्रभावसे सद्गतिको प्राप्त हो गये ॥ ४४-४५ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार मैंने वह सब कुछ कह दिया, जो कुछ तुम्हारे द्वारा पूछा गया था। चिन्तामणिक्षेत्र* के अन्तर्गत स्थित गणेशतीर्थसे सम्बन्धित इस माहात्म्यको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह भी उस गतिको प्राप्त कर लेता है, जो उस तीर्थमें स्नानसे प्राप्त होती है ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कादम्बपुरवर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥ छत्तीसवाँ अध्याय गृत्समदमुनिके जन्मकी कथा व्यासजी बोले- हे कमलासन ब्रह्माजी! मैंने गणेशतीर्थके माहात्म्य, रुक्मांगद और कौण्डिन्यपुरवासियोंके चरितके विषयमें श्रवण किया, तथापि हे ब्रह्मन् ! आप मुकुन्दाके मनोहर चरितको मुझसे कहिये ॥ १ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे पुत्र ! राजा रुक्मांगदके चले जानेपर वह मुकुन्दा कामनारूपी अग्निमें उसी प्रकार जल उठी, जैसे ग्रीष्मकालमें दावाग्निसे महान् वनस्थली जल उठती है। मुकुन्दाको न शीतल वायुवाले वनमें, न लता- पुष्पमय कुंजमें, न चन्द्रमाकी चाँदनीमें और न चन्दनके आलेपनमें—कहीं शान्ति नहीं मिल रही थी। उसे हास्य, गीत, नृत्य और वस्त्राभूषणादि भी रुचिकर नहीं लग रहे थे ॥ २-४ ॥ हे मुनीश्वर ! उस कामविह्वला मुकुन्दाको अन्न और जल भी रुचिकर नहीं लगता था। भूख-प्यास और श्रमजनित थकानसे उसे क्षणभरमें नींद आ गयी ॥ ५ ॥ हे सुत ! उस एकान्त वनमें सोयी हुई मुकुन्दाको रुक्मांगदके विरहमें विह्वल जानकर देवराज इन्द्र रुक्मांगदका रूप धारणकर वहाँ आये। उन्हें देखकर मुकुन्दाको अत्यन्त हर्ष हुआ। इन्द्रने उस पुत्रार्थिनी नारीको अपने हृदयसे लगा लिया और अपने अनुग्रहसे मानो कृतकृत्य- सा करते हुए उसके साथ नानाविध शृंगारचेष्टाएँ कीं। उस पारस्परिक संयोगके फलस्वरूप मुकुन्दाने गर्भ धारण किया। तदुपरान्त मुकुन्दाको आश्वस्तकर इन्द्र अन्तर्धान हो गये और मुकुन्दा भी सलज्ज भावसे अपने आश्रमको चली आयी ॥ ६-१० ॥ मुकुन्दाने नवम मासमें, शुभ वेलामें शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्रको जन्म दिया, जो मनोहर, सर्वांगसुन्दर और रूपमें कामदेवसे भी बढ़कर था। उसके धरणीपर गिरते ही महान् शब्द हुआ, जिससे दसों दिशाएँ, आकाश, पृथ्वी और रसातल भी अनुनादित हो गये ॥ ११-१२ ॥ पक्षिगण उड़-उड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करने लगे। वाचक्नवि भी अपना नित्यकर्म छोड़कर वहाँ चले आये। मुकुन्दाके चरितका ज्ञान उन्हें कभी नहीं हो पाया। उन्होंने अत्यन्त हर्षपूर्वक [शिशुके] जातकर्मादि संस्कार किये ॥ १३-१४ ॥ उन्होंने [इस अवसरपर] ब्राह्मणोंको यथाशक्ति और यथायोग्य दान दिया। दस दिन बीत जानेपर उन मुनिने [शिशुका] नामकरण-संस्कार किया ॥ १५ ॥

  • चिन्तामणिक्षेत्र महाराष्ट्र प्रान्तके कदम्बपुर, जिला- यवतमालमें स्थित है। मन्दिरके सामने ही 'चौमुखी गजानन' की मूर्ति है। इसकी विशेषता यह है कि एक ही पत्थरमें चारों ओर चार गणेश मूर्तियाँ खुदी हुई हैं। सामनेके गर्भगृहमें मुख्य चिन्तामणि-गणेशकी मूर्ति है। 'कलम्ब' नामसे इक्कीस गणपतिक्षेत्रमें इसकी गणना है।