भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 656 में से

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पृष्ठ 96

९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

[बायाँ स्तम्भ] प्रलाप करने लगी—रे विधाता! तुझे दया नहीं है। तेरे क्रिया-कलाप बालकोंके-से हैं। पहले तुम दो प्राणियोंमें स्नेहभावसे संयोग कराते हो, फिर उनके कृतार्थ हुए बिना ही उनमें वियोग करा देते हो॥ ९-१०॥ हे राजन्! हे करुणानिधे! मुझे बताओ, तुम मुझसे पूछे बिना कहाँ चले गये? तुम तो प्रतिदिन कहते थे कि हे प्रिये! भद्रासनपर बैठने जा रहा हूँ। मेरे किस अपराधके कारण आज तुम इतने निष्ठुर हो गये हो? मेरे उस अपराधको तुम क्षमा कर दो। मैं लज्जा छोड़कर प्रजाजनोंके मध्य तुम्हें नमस्कार करती हूँ॥ ११-१२॥ मैं आपका प्रिय करनेवाली प्रिया हूँ, पुत्रहीना होनेके कारण बिना पतिके मैं इस त्रिलोकीको शून्य देख रही हूँ, इसलिये आप जहाँ जा रहे हैं, वहाँ मुझे भी लेते चलें ॥ १३॥ मुनि बोले—उस (राजा चन्द्रसेन)-के सुमन्तु और मनोरंजन नामवाले दो मन्त्री थे, वे भी रो-रोकर कहने लगे—अब राज्यका क्या होगा?॥ १४॥ हे राजश्रेष्ठ! आप हम दोनोंसे बिना विचार-विमर्श किये कहाँ चले गये? हे राजन्! आप बोल क्यों नहीं रहे हैं? आपने मौन क्यों साध लिया है?॥ १५॥ आप अनाथकी भाँति विह्वल अपनी प्रिय पत्नीको भी नहीं देख रहे हैं। हम दोनों भी सम्पूर्ण गृहस्थाश्रमका त्याग करके आपके साथ चलते हैं। आपका नगर और राष्ट्र अनाथ हो गया है, कौन इसका पालन करेगा?॥ १६ १/२॥ मुनि बोले—इसी बीच वहाँ वेद और शास्त्रके तात्त्विक अर्थको जाननेवाले और सुन्दर बुद्धिवाले एक ब्राह्मणने निष्ठुर वाणीमें कहा—तुम सभी स्वार्थपरायण हो, कोई भी वास्तविक हितैषी नहीं है। सुहृज्जनोंके रोनेसे जो अश्रु गिरते हैं, वे मृत प्राणीके मुखमें जाते हैं। प्राणहीन शरीर पृथ्वीपर भार होता है॥ १७-१९॥ इस ब्रह्माण्डगोलकमें ऐसा कौन है, जो मृतकका अनुगमन करता हो? यह रानी सुलभा अपने जीवनकी आशासे रो रही है॥ २०॥ जिसका मन अनुगमनका होता है, वह कभी नहीं रोता। आप सभी नगरवासी अपने-अपने कार्योंपर जानेके

[दायाँ स्तम्भ] लिये आकुल हैं॥ २१॥ जो राजा सूर्यवंश और चन्द्रवंशमें हुए, क्या वे नहीं मरे? इसलिये आप सभी उठकर राजाका संस्कार करें॥ २२॥ मृतकका [अन्तिम] संस्कार करनेवाला ही उसका सच्चा हितैषी होता है, दूसरा नहीं। इसीलिये लोगोंमें पुत्रप्राप्तिकी कामना रहती है॥ २३॥ इसलिये धर्मपुत्र या किसी अन्य प्रकारके पुत्रको ले आओ। वह [अन्त्येष्टि] क्रियाका आरम्भ करे और तत्पश्चात् सभी लोग [राजाको] तिलांजलि दें॥ २४॥ मुनि बोले—तदनन्तर सभी नगरनिवासी, दोनों मन्त्री और वे स्त्रियाँ—सभीने उस ब्राह्मणद्वारा प्रबोधित होकर [राजाका] और्ध्वदैहिक कर्म किया॥ २५॥ सुमन्तुने राजाकी समस्त और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न की और सभीने तिलांजलि दी। पुनः सभीने स्नान करके देरसे नगरमें प्रवेश किया॥ २६॥ तदनन्तर उन लोगोंने परमात्माको नमस्कार करके निम्बपत्रोंका प्राशन किया और रानी सुलभाको सान्त्वना देकर अपने-अपने घरको चले गये॥ २७॥ त्रयोदशाहकी समाप्तिपर उन लोगोंने रानीको वस्त्र देकर बहुत दिनोंतक [उनके यहाँ राजाके प्रति] प्रीतिवश प्रतिदिन भोजन किया॥ २८॥ एक बारकी बात है, कौण्डिन्यनगरके सभी निवासी, दोनों मन्त्री और राजाके प्रियजन प्रजापालन कर्मके सम्बन्धमें संशयमें पड़े थे। उसी समय वहाँ मुद्गलमुनि आये और बोले—‘राजा (चन्द्रसेन)-का जो गजराज है, वह उनके सभी अभिप्रायोंको जाननेवाला है। वह ‘गहन’ नामवाला गजराज कमल-पुष्पोंसे बनी माला [अपनी सूँड़में] ग्रहण करे। सम्पूर्ण समाजमें वह जिसके गलेमें उस मालाको डाल देगा, वही राजा होगा'॥ २९-३१॥ तब उन अतीन्द्रिय ज्ञानसे सम्पन्न ब्राह्मण मुद्गलके इस प्रकारके वचनोंका सबने 'साधु-साधु', 'ऐसा ही हो' कहकर अभिनन्दन किया॥ ३२॥

[पाद-टिप्पणी / अध्याय समाप्ति] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संस्कारका वर्णन' नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २५॥