भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 656 में से

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पृष्ठ 95

उ०ख०-अ०२५ ] * कौण्डिन्यनगरके राजा चन्द्रसेनकी पुत्रहीन-अवस्थामें मृत्यु * ९३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

मदका स्राव हो रहा है। उसका मुख सुन्दर और | किया है। [स्वप्नमें] गजारोहणका फल राज्यकी प्राप्ति प्रसन्नतासे युक्त है। उसकी सूँड़ विशाल और एक दाँतसे | ही है—इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ १४॥ शोभित थी। भ्रमर-समूहोंसे वह समाकीर्ण था अर्थात् भौरै | दक्ष बोला—यदि मुझे राज्यकी प्राप्ति होती है, उसपर मँडरा रहे थे। [इस प्रकार] वह दूसरे गजानन | तो मैं तुम्हें एक पालकी, आजीविकाके लिये बहुत-से (गणेश)-के समान प्रतीत हो रहा था॥८-१०॥ | ग्राम और मोतियोंकी माला दूँगा॥ १५॥ उस गजराजने उस (दक्ष)-के गलेमें रत्नमाला | गोदान और अष्टापद (सुवर्ण)-दानकर धर्म करूँगा। समर्पित की। तदनन्तर जनताने उसे उठाकर हाथीके | व्रतों और नियमोंका पालन करते हुए अनेक प्रकारके स्कन्धदेशपर विराजित कर दिया ॥ ११ ॥ | अन्यान्य दान भी दूँगा॥ १६॥ तत्पश्चात् उस गजश्रेष्ठने पताकाओं और ध्वजाओंसे | मुनि बोले—यह सुनकर कमला हर्षित होकर सुशोभित नगरके लिये प्रस्थान किया। स्वप्नावस्थासे | पुत्रसे बोली—हे पुत्र ! तुम जब राजसिंहासनपर विराजमान जाग्रत् होनेपर उस दक्षने अपनी मातासे पूछा—हे माता | होगे, तो मुझे परम आनन्दकी प्राप्ति होगी॥ १७॥ कमला! मेरे इस स्वप्नका अभिप्राय बताओ—गजस्कन्धपर | तुम्हारा मन सज्जनोंद्वारा आचरित धर्ममें रत हो, आरोहण शुभ होता है या अशुभ ? ॥ १२-१३ ॥ | तुम सज्जनोंका भरण-पोषण करनेवाले होओ, तुम्हें कमला बोली—[हे पुत्र!] तुम धन्य हो, तुमने | विपुल आयुष्यकी प्राप्ति हो तथा तुम्हारी ब्राह्मणों और गजरूपधारी भगवान् विनायक (गणेशजी)-का दर्शन | देवताओंके अर्चनमें प्रीति हो ॥ १८॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'स्वप्नकथन' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥

पच्चीसवाँ अध्याय कौण्डिन्यनगरके राजा चन्द्रसेनकी पुत्रहीन-अवस्थामें मृत्यु, मुद्गलमुनिका उनके उत्तराधिकारीके सम्बन्धमें निर्णय देना

विश्वामित्रजी बोले—हे राजन् ! दैव और कालके | दोनों पैरोंको पकड़कर उनके चरणोंमें झुक गये, कुछने प्रभावसे घटित इस मंगलमयी आश्चर्यकारी घटनाके | उनका हाथ पकड़कर अपने सिरपर रख लिया ॥ ५ ॥ विषयमें श्रवण करो। कौण्डिन्यनगरमें महाबुद्धिमान् | कुछ लोग तीव्र स्वरमें रोने लगे तो कुछ लोग मुखपर चन्द्रसेन राजा थे। अपने कर्मफलका भोग कर लेनेपर | हथेली रखकर धीमे स्वरमें रोने लगे। कुछ अन्य लोग कालयोगसे वे मृत्युको प्राप्त हुए। [किये गये] धर्मपूर्ण | अतिशय स्नेहके कारण मृतककी भाँति गिर पड़े ॥ ६ ॥ कार्योंकी बहुलताके कारण वे दिव्य विमानसे स्वर्गको | उस (राजा)-की पत्नी सुलभा अत्यन्त दुखी गये ॥ १-२ ॥ | होकर अपने दोनों हाथोंसे अपने हृदयपर आघात करते इस समाचारको सुनकर नगरके निवासी हाहाकार | हुए करुण स्वरमें रुदन कर रही थी ॥ ७ ॥ करने लगे। अनेक कार्योंका त्यागकर वे लोग दौड़ते हुए | उसके आभूषण बिखर गये थे और मूर्च्छा आ वहाँ पहुँचे ॥ ३ ॥ | जानेसे वह पृथ्वीपर गिर पड़ी थी। उसीके समान शोकसे व्याकुल होकर लोग अपने हाथोंसे अपना | शोकाकुल नगरकी अन्य स्त्रियोंने उसे पकड़कर बैठाया ॥ ८ ॥ सिर पीट रहे थे। गिरते-पड़ते उन्होंने वहाँ पहुँचकर | उस समय राजा चन्द्रसेनकी वह सुन्दरी पत्नी राजाके मृत शरीरका दर्शन किया॥ ४॥ | विलाप करने लगी। 'हा नाथ! हा नाथ!' कहती हुई दुःख और मोहके वश होकर उनमेंसे कुछ राजाके | वह लज्जाका त्यागकर विधाताको कोसते हुए इस प्रकार