भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 656 में से

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पृष्ठ 94

९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अर्थात् गूँगा-बहरा, अन्धा और रक्तस्रावयुक्त पुत्र होगा। हे मंगलमयि ! इस प्रकार मैंने उसकी शापमुक्तिका वल्लभ नामक श्रेष्ठ क्षत्रिय तुम्हारा पति होगा और तुम उपाय बता दिया और भविष्यके विषयमें भी तुम्हें आज कमला नामसे प्रसिद्ध होओगी ॥ ३४-३५ ॥ ही बता दिया। अब तुम जहाँ इच्छा हो, वहाँ चली तुम्हारा पुत्र दक्ष नामसे प्रसिद्ध होगा। तदनन्तर जाओ ॥ ४१ ॥ दक्षके अन्धत्व, बधिरत्व, मूकत्व [आदि दोषों] और विश्वामित्रजी बोले- [हे राजन्!] उस घावोंसे निवृत्तिके लिये वल्लभ बारह वर्षोंतक तपस्याके (बल्लाल)-के द्वारा इस प्रकार निराकरण किये जानेपर नियमोंका दृढ़तापूर्वक पालन करते हुए कठोर तप दुःख और शोकसे युक्त उसकी माता (इन्दुमती)-को करेगा ॥ ३६-३७ ॥ कुछ हर्ष हुआ और वह वहाँसे चली गयी ॥ ४२ ॥ हे शुभानने ! [तपस्यासम्बन्धी] फलकी प्राप्ति न तदनन्तर वह (बल्लाल) भी गणेशजीकी भक्तिसे होनेसे वह पुत्रसहित तुम्हें घरसे बाहर निकाल देगा और भावित होकर गजानन गणेशजीद्वारा प्रस्तुत विमानपर तब तुम दूसरे देशमें जाकर रहने लगोगी ॥ ३८ ॥ आरूढ़ होकर स्वर्गको चला गया ॥ ४३ ॥ हे कल्याणि ! दैवयोगसे गजानन गणेशजीमें अनुरक्त इस प्रकार तुमने जो कुछ पूछा था, वह मैंने तुमसे चित्तवाले किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणके स्पर्शसे तुम्हारा पुत्र सब कुछ कह दिया। उस [कल्याण नामवाले] वैश्यने ठीक हो जायगा ॥ ३९ ॥ दोनों जन्मोंमें जो गति प्राप्त की, और बल्लालने जैसा वहीं उसे गणनाथ गणेशजीका दर्शन भी हो कहा था, वह सब वैसा ही हुआ। वह [इन्दुमती] जायगा और गजानन गणेशजीकी कृपासे उसे दिव्य कमला हुई और वह [कल्याण] क्षत्रियश्रेष्ठ (वल्लभके देहकी भी प्राप्ति हो जायगी ॥ ४० ॥ पुत्र)-के रूपमें उत्पन्न हुआ ॥ ४४-४५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'भविष्यकथन' नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥

चौबीसवाँ अध्याय दक्षको राज्यप्राप्तिसूचक स्वप्नका दर्शन राजा भीमने पूछा-हे मुनिवर ! बुद्धिमान् राजपुत्रने वहींपर स्थित रहकर उस दक्षने गजानन गणेशजीको कहाँ, कैसे और किसका अनुष्ठान किया था ? हे मुने ! प्रसन्न करनेके लिये तपस्या की। उसने मुद्गलद्वारा उपदिष्ट इसका विस्तारपूर्वक आप वर्णन कीजिये; क्योंकि मैं [गणेशजीके] एकाक्षर मन्त्रका बारह वर्षोंतक जपकर [इस कथाको] सुनकर भी तृप्त नहीं हो पा रहा उन भगवान् गणेशको प्रसन्न किया। [इसके अनन्तर] हूँ ॥ १ १/२ ॥ उसने उस गणेशप्रतिमाका स्नान, वस्त्र, सुगन्धि-द्रव्य, विश्वामित्रजी बोले-उस कौण्डिन्यपुरके निकट माला, धूप, दीप आदि उपचारोंसे पूजन किया; कन्द-मूल ही एक महान् रमणीय वन था, जो विविध प्रकारके आदि भक्ष्य पदार्थोंका नैवेद्य निवेदित किया। तदनन्तर उस वृक्षोंसे युक्त; अनेक हिंस्र पशुओंसे परिपूरित, नाना क्षत्रियश्रेष्ठने दक्षिणाकी मानसिक कल्पना की ॥ ५-७॥ प्रकारके पक्षी-समूहोंसे समन्वित और लताजालोंसे सुशोभित हे राजन्! इस प्रकार पूजन करते हुए उसके इक्कीस था ॥ २-३ ॥ दिन बीत गये। तदनन्तर [एक दिन] प्रभातकालमें उसने सत्पुरुषोंके मनकी भाँति निर्मल जलवाले सरोवर इस प्रकारका स्वप्न देखा कि एक सुन्दर और पर्वतसदृश और वापियाँ वहाँ स्थित थे, वहीं एक प्राचीन देवालयके महान् गजराज सिन्दूरसे आलिप्त होनेके कारण अत्यन्त मध्यभागमें गजानन गणेशजीकी प्रतिमा विराजमान थी ॥ ४ ॥ शोभायमान हो रहा है, उसके दोनों सुन्दर गण्डस्थलोंसे