भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 656 में से

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पृष्ठ 93

उ०ख०-अ०२३] * बल्लालके शापसे कल्याण वैश्यको अन्धत्वकी प्राप्ति * ९१ देवभक्ति कर रहा है! ॥ ११-१२१/२॥ मुनि बोले- ऐसा देखकर वे सभी [पुरवासी] आश्चर्यचकित हो गये और अणुमात्र (कुछ) भी नहीं बोले। तत्पश्चात् उनमेंसे कुछ लोग कहने लगे- महाभक्तिकी महिमा कौन जान सकता है ? ॥ १३१/२ ॥ सिन्दूरकी आभासे अरुण वर्णवाले, लाल चन्दनका लेप किये हुए, लाल वस्त्र पहने, लाल पुष्पोंकी मालासे शोभायमान, आसक्तिरहित, निरहंकार और बिना सूँड़के विघ्नराज गणेशके जैसे अपने पुत्रको देखकर वह इन्दुमती शोकका त्यागकर आनन्दित हो उठी। उसने पुत्रका आलिंगन किया, उस समय वात्सल्यस्नेहवश उसके स्तनोंसे दुग्ध-प्रवाह होने लगा ॥ १४-१६ ॥ उसने पुत्रसे कहा- हे महामते! अपने घरको चलो, तुम्हारे पिता महान् संकटमें फँस गये हैं। वहाँ चलकर तुम उनके स्वस्थ होनेका कुछ उपाय करो ॥ १७ ॥ तुम्हारे सदृश पुत्रको प्राप्तकर हम दोनों इस संसारमें धन्य हो गये। तुम्हारे पिताका सम्पूर्ण शरीर घावयुक्त हो गया है, उससे रक्तस्राव होता है और सड़े हुए मांसकी-सी गन्ध आती है। उनका मुख काला पड़ गया है। वे कृशकाय, बधिर और अन्धे हो गये हैं। मैं उनकी यह स्थिति तुमसे निवेदन करने यहाँ आयी हूँ ॥ १८-१९ ॥ यद्यपि उन्होंने तुम्हें ताड़ित करके अनर्थ ही किया है, पर पिताके कर्तव्यके कारण ही उन्होंने ऐसा किया है। वेदों, स्मृतियों और पुराणोंके अनुसार इसमें उनका अपराध नहीं है ॥ २० ॥ हे पितृभक्त! तुम अपने पुत्रधर्मका निरीक्षणकर उन्हें निरोग करनेपर विचार करो। तुम्हारे कारण ही तुम्हारे पिता इस संसारमें अत्यन्त प्रशंसनीय हैं ॥ २१ ॥ माता-पिताके वचनका पालन करना, उनका पूजन करना और उन दोनोंका पालन-पोषण करना यशस्वी सत्पुत्रके लिये कर्तव्य है ॥ २२ ॥ हे पुत्र! तुम मुझपर [कृपा]-दृष्टि करो। औषधि- प्रयोग, मन्त्रजप और देवप्रार्थनासे [पिताके स्वस्थ होनेका] उपाय करो ॥ २३ ॥ हे मेरे बालक (पुत्र) ! इससे संसारमें तुम्हारा यश होगा और मेरा सौभाग्य सुरक्षित रहेगा। उस (माता)- की इस प्रकारकी बात सुनकर बल्लालने इस प्रकार कहा - ॥ २४ ॥ बल्लाल बोला- कौन किसकी माता है ? कौन किसका पिता है ? कौन किसका पुत्र है ? अथवा कौन किसका मित्र है ? यह सब विघ्नराज गणेशजीद्वारा निर्मित आनुषंगिक सम्बन्ध कहा जाता है ॥ २५ ॥ हे भद्रे ! इसलिये मेरे माता-पिता भगवान् विनायक ही हैं। जो जैसा कर्म करता है, वह वैसा ही फल भोगता है ॥ २६ ॥ मैंने अपना जीवन देवाधिदेव गजानन गणेशजीको समर्पित कर दिया है। मेरी सुन्दर भक्तिसे प्रसन्न होकर उन्होंने ही मुझे प्राण और ज्ञान प्रदान किया है ॥ २७ ॥ हे कल्याणी! देवालय तोड़ने, देवप्रतिमाको फेंकने और विघ्नविनायक गणेशजीके अतिशय भक्त मुझको पीटनेके कारण उन्हें वैसा फल प्राप्त हुआ है ॥ २८ ॥ [तात्त्विक दृष्टिसे] विचार किया जाय तो न तुम मेरी माता हो और न वह [कल्याण] मेरा पिता है; क्योंकि सबके माता-पिता तो वे भगवान् गजानन गणेशजी ही हैं ॥ २९ ॥ वे ही ज्ञानदाता, रक्षक और कालरूप संहारक हैं। सम्पूर्ण स्वरूपोंमें वे ही हैं। वे ही देवेन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु और शिवस्वरूप हैं ॥ ३० ॥ जिस घमण्डी, दुष्ट और निर्दयोने व्यर्थमें ही मुझे पीटा; देव-प्रतिमाको फेंक दिया और [उनके] मन्दिरको भी तोड़ डाला- ऐसे उस पतितके मुखको देखनेसे भी महान् दोष होगा। अतः आप मेरे प्रति स्नेहका त्याग करके अपने पतिकी विशेष रूपसे सेवा कीजिये ॥ ३१-३२ ॥ विश्वामित्रजी बोले - पुत्रके इस प्रकारके वचन सुनकर वह पुनः उससे बोली- ॥ ३२१/२ ॥ माताने कहा- [हे पुत्र!] तुम मुझपर अनुग्रह करके अथवा स्नेहसम्बन्धके कारण इस शापसे मुक्तिके विषयमें कृपापूर्वक बताओ ॥ ३३ ॥ पुत्र बोला- हे उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाली! वर माँगनेवाली तुम अगले जन्ममें इस (कल्याण)-की जननी होओगी। यह (कल्याण) तुम्हारा इसी प्रकारका

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