भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 656 में से

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पृष्ठ 92

९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इस क्षेत्रमें स्थिर रहकर विघ्नोंसे मनुष्योंकी रक्षा करें॥ ५१॥ गणेशजी बोले—यहाँके मनुष्य पहले तुम्हारे नामका उच्चारणकर फिर मेरा शुभ नाम बोलेंगे। इस नगरमें मैं 'बल्लालविनायक'—इस नामसे प्रतिष्ठित रहूँगा॥ ५२॥ तुम्हारा मन मुझमें स्थिर रहेगा और तुम्हारी [मेरे प्रति] भक्ति अनन्य होगी। जो भाद्रपदमासके शुक्ल पक्षकी चतुर्थी तिथिको मेरे पल्ली* नामक नगरकी यात्रा करेंगे, मैं उनकी समस्त मनोकामनाओंको पूर्ण करूँगा॥ ५३ १/२॥ भृगुजी बोले—[हे राजा सोमकान्त!] इस प्रकार वर देकर भगवान् गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ५४॥ तदनन्तर बल्लालने ब्राह्मणोंके साथ अनेक प्रकारकी शोभासे समन्वित मन्दिरका निर्माण करवाया और वहीं रहने लगा, वह फिर पिताके घर नहीं गया॥ ५५॥ विश्वामित्रजी बोले—[हे राजा भीम!] मैंने तुमसे बल्लालविनायकसे सम्बन्धित इस कथानकका वर्णन किया, जिसको सुनकर व्यक्ति सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है और सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥ ५६॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'बल्लालविनायकका वर्णन' नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २२॥ तेईसवाँ अध्याय बल्लालके शापसे कल्याण वैश्यको अन्धत्व, बधिरत्व और मूकत्वकी प्राप्ति; माताकी प्रार्थनापर बल्लालद्वारा शापमुक्तिका उपाय बताना भृगुजी बोले—[हे राजा सोमकान्त!] विश्वामित्रके वचन सुनकर [कल्याण नामवाले] उस वैश्यसे सम्बन्ध रखनेवाली कथाके श्रवणमें परम उत्सुक राजा भीमने उनसे पुनः पूछा। हे नृपश्रेष्ठ सोमकान्त! मैं उसे तुमसे कहता हूँ, उसे सुनो॥ १ १/२॥ [राजा] भीम बोले—[हे मुने!] मैंने दक्षके चरितका श्रवण किया, इससे मेरा मन शान्त हुआ। कल्याण वैश्यकी क्या गति हुई ? अब आप उसे कहिये॥ २ १/२॥ विश्वामित्रजी बोले—हे भीम! मैं इस कथाको तुमसे कहता हूँ, तुम एकाग्र मनसे इसका श्रवण करो। बल्लालके शापके कारण कल्याणकी देहसे रक्तस्राव होने लगा। उसका शरीर असंख्य घावोंसे भर गया। उससे सड़े मांसकी दुर्गन्ध आने लगी। उस दुष्टमें बाधिर्य (बहरापन), अन्धत्व और मूकत्व (गूँगापन) उत्पन्न हो गये। तदनन्तर जब इन्दुमतीने उसकी ऐसी दशा देखी, जो कि अचानक ही उत्पन्न हो गयी थी, तो वह 'यह क्या हुआ?' 'यह क्या हुआ?' 'यह कैसे हुआ?' विचार करती हुई अत्यन्त शोकमें पड़ गयी कि मेरे ज्ञानी, उदार, देवद्विजपरायण, धर्मशास्त्रोक्त कर्तव्योंमें निष्ठा रखनेवाले, एकपत्नीव्रती निष्पाप पतिकी ऐसी अवस्था क्यों हो गयी ?॥ ३-७॥ मुनि बोले—इस प्रकार अत्यन्त विलाप करती हुई और बार-बार दीर्घ श्वास लेती हुई उस (इन्दुमती)- ने जब यह सुना कि उसके पतिने पुत्र बल्लालको वनमें बाँध रखा है, तो वह और भी रुदन करती हुई पुरवासियोंके साथ वनमें उस स्थानपर गयी, जहाँ उसका पुत्र बँधा हुआ था। वहाँ उसने भगवान् गणपति और उनके देवालयका दर्शन किया। भगवान् गजाननका सिन्दूरालेपित विग्रह अरुण वर्णका था, वह चार भुजाओं और तीन नेत्रोंसे युक्त था। उसका पुत्र बल्लाल वहाँ उन गजाननका पूजन कर रहा था॥ ८-१०॥ इन्दुमतीने जब देखा कि उसका पुत्र बन्धनमुक्त, घावरहित और स्वस्थ शरीरवाला है तो क्रुद्ध होकर पुरवासियोंकी बार-बार भर्त्सना करते हुए कहने लगी— तुम सब असत्यवादियोंने मेरे पतिके समीप मुझसे क्यों वंचना की कि मैं उनको वैसी स्थितिमें छोड़कर पुत्रस्नेहवश यहाँ चली आयी ? देखो, मेरा पुत्र इस प्रकार

  • महाराष्ट्रके रायगढ़ जिलेके सुधागढ़ तालुकेमें अम्बा नदीके तटपर पाली ग्राम है। यह स्थान मुम्बईसे १२० किमी०की दूरीपर स्थित है। कहा जाता है कि 'बल्लाल विनायक क्षेत्र' सिन्धुदेशमें था, किंतु अब वह लुप्त हो गया है।