भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 656 में से

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पृष्ठ 91

उ०ख०-अ०२२ ] * दक्षके पूर्वजन्मकी कथाके प्रसंगमें बल्लालकी गणेशभक्ति * ८९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] पृथिवीको धारण करना छोड़ दें, सूर्य प्रकाश करना छोड़ दे, चन्द्रमा अमृत [-की वर्षा करना] छोड़ दे या अग्नि उष्णता छोड़ दे, परंतु आप भक्तोंको नहीं छोड़ते—ऐसा वेदों और शास्त्रोंमें कैसे प्रसिद्ध है ? — इस प्रकार विलाप करते हुए उसने अपने कल्याण नामवाले अत्यन्त दुष्ट पिताको शाप दे दिया— ॥ ३५-३६ ॥ 'यदि मेरी गजानन गणेशजीमें सुदृढ़ और उत्तम भक्ति हो तो जिसने मेरे इस उत्तम देवालयका विध्वंस किया है, गणेशजीकी मूर्तिको फेंक दिया है और मुझे प्रताड़ित किया है—वह निश्चित रूपसे बहरा, कुबड़ा और गूँगा होगा। [हे प्रभो!] मैंने जो कुछ भी कहा, वह सब सत्य हो जाय। उस [मेरे पिता] - की शक्ति मेरे शरीरको ही बाँध सकनेकी है, वह मेरी भक्ति और मेरे मनको नहीं बाँध सकता। अनन्य बुद्धिसे भगवान् गणेशका चिन्तन करके मैं इस विजन वनमें अपनी देहका त्याग करता हूँ; क्योंकि [पिताद्वारा पीटे जानेके भयसे] जब मैंने पलायन नहीं किया था, तभी मैंने इस देहका देवताको अर्पण कर दिया था' ॥ ३७-४० ॥ उसके इस प्रकारके निश्चयको जानकर भगवान् गजानन गणेशजी बल्लाल [-की भक्ति] -के प्रभावसे ब्राह्मण स्वरूपसे प्रकट हो गये ॥ ४१ ॥

[दायाँ स्तम्भ] जैसे भगवान् सूर्यदेवके उदयाचलपर आगमनसे रात्रिका अन्धकार दूर हो जाता है, वैसे ही बल्लालके बन्धन उन गणेशजीके तेजसे शिथिल हो गये ॥ ४२ ॥ तत्पश्चात् उसने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। उस समय उसकी देह सौन्दर्यपूर्ण हो गयी, उसमें न तो घाव थे, न ही रक्तस्राव हो रहा था। उन देवाधिदेवके दर्शनसे उसके अन्तःकरणमें निर्मल ज्ञानका प्रादुर्भाव हो गया और तब उसने बुद्धिके अनुसार विविध स्तोत्रोंसे उन गजानन गणेशजीका स्तवन किया ॥ ४३-४४ ॥ बल्लाल बोला— [हे प्रभो!] आप ही [मेरे] माता, पिता और बन्धु हैं। आप ही इस स्थावर- जंगमात्मक जगत्के कर्ता हैं। आप ही दुष्टों, अत्याचारियों और साधुजनोंका सृजन करते हैं। आप ही प्राणियोंको विभिन्न शुभ योनियों और कुत्सित योनियोंमें जन्म देते हैं ॥ ४५ ॥ आप ही दिशाचक्र, आकाश, पृथिवी, समुद्र, पर्वत, इन्द्र, काल, अग्नि और वायुरूपवाले हैं। सूर्य, चन्द्रमा, तारा, ग्रह, लोकपाल, वर्ण, इन्द्रियोंके विषय, औषधि और धातुके रूपमें आप ही हैं ॥ ४६ ॥ मुनि [विश्वामित्र] बोले— [हे राजा भीम! बल्लालद्वारा की गयी] इस स्तुतिको सम्यक् रूपसे सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए गजानन गणेशजीने अपने भक्त [बल्लाल]-का आलिंगनकर मेघसदृश [गम्भीर] वाणीमें कहा— ॥ ४७ ॥ गजानन (गणेशजी) बोले— मेरे मन्दिरको जिसने तोड़ा है, वह अवश्य ही नरकमें गिरेगा। मेरी आज्ञासे तुम्हारा शाप भी उसपर वैसे ही प्रभावी होगा ॥ ४८ ॥ मेरे शापसे वह अन्धा, बहरा, कुबड़ा, गूँगा और रक्तस्राव करते हुए घावोंसे युक्त शरीरवाला होगा— इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४९ ॥ इसका पिता इसे माताके साथ घरसे बाहर कर देगा। अब तुम अपनी अन्य इच्छाओंको बताओ, दुष्प्राप्य होनेपर भी मैं तुम्हें उन्हें दूँगा ॥ ५० ॥ मुनि बोले— इसपर बल्लालने भगवान् गणेशसे कहा— [हे देव!] मुझमें आपकी दृढ़ भक्ति हो। आप