श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 209, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०६७ ] * दूर्वांकुरकी महिमा * २०७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
फिर भी वह दूर्वांकुरवाला पलड़ा ऊपर न उठा ॥ १८ ॥ [इस आश्चर्यमयी घटनाका] दूतके मुखसे वृत्तान्त सुनकर इन्द्र गजारूढ़ हो वहाँपर आये और अपने द्रव्यसहित स्वयं भी घट [-के पलड़े]-पर चढ़ गये ॥ १९ ॥ तब भी वह दूर्वांकुर ऊपरकी ओर नहीं उठा। [यह देख] इन्द्र यह सोचते हुए कि यह क्या हो रहा है ? चिन्तित हो गये। उन्होंने [लज्जित होकर] अपना मुख नीचे कर लिया ॥ २० ॥ उन्होंने उस तराजूके पलड़ेपर चढ़नेके लिये विष्णु और शिवका स्मरण किया। तब वे दोनों [महान् देवता] भी अपने-अपने नगरोंसहित वहाँ आ गये और उन दोनोंने भी उस घटपर आरोहण किया ॥ २१ ॥ परंतु तब भी वह दूर्वांकुर स्पष्ट रूपसे ऊपर नहीं उठा। तब वे—शिव, विष्णु, धनाधिपति कुबेर, वरुण, इन्द्र, अग्नि और वायु आदि देवता उस घटसे उतर आये तथा कौण्डिन्यमुनिके पास गये। सभी देवता, देवर्षि, सिद्धगण, विद्याधर और नाग उन मुनिके पास वैसे ही पहुँचे, जैसे दिनकी समाप्तिपर सायंकालमें पक्षी अपने घोंसलेमें पहुँच जाते हैं। [तदनन्तर] उद्विग्न चित्तवाले उन सबने मुनिको नमस्कारकर कहा— ॥ २२-२४ ॥ सभी [देवता, ऋषि आदि] बोले— हे मुने ! हमारे पूर्वजन्मोंके पुण्योंका उदय हुआ है, जो आपका दर्शन हुआ। इससे हमारे सारे पाप नष्ट हो गये और अब हमारा कल्याण हो जायगा ॥ २५ ॥ आपकी पत्नीने हम सबके सत्त्व (बल)-का आज हरण कर लिया है—यह स्पष्ट रूपसे प्रकट है। दूर्वांकुरकी उत्पत्ति और उसकी महिमाको हम नहीं जानते ॥ २६ ॥ आपके द्वारा भक्तिपूर्वक समर्पित और गणेशजीके सिरपर स्थित एक ही दूर्वांकुरकी समतुल्यता तीनों लोक भी नहीं कर सकते ॥ २७ ॥ दूर्वांकुरकी महिमाको सम्यक् रूपसे कौन जान सकता है; यज्ञ, दान, व्रत, तप और स्वाध्याय भी उसकी समता नहीं कर सकते ॥ २८ ॥
[दायाँ स्तम्भ]
निरन्तर जप और तपमें लीन रहनेवाले गजानन गणेशजीके एकनिष्ठ भक्त आपकी भी महिमाको सम्पूर्ण प्राणियोंमें भला कौन जान सकता है ? ॥ २९ ॥ इस प्रकार कहकर उन सबने पहले गणेशजीका पूजनकर तदनन्तर भार्यासहित मुनिका गीत, नृत्य और स्तवन [आदि]-से पूजन किया ॥ ३० ॥ [तदनन्तर गणेशजीका स्तवन करते हुए उन सबने कहा—] हे देव ! आपका स्वरूप वेदोंद्वारा भी अज्ञात है, आपकी महिमाको ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, वायु, अग्नि, सूर्य, यम, शेष, सम्पूर्ण (षोडश) कलाओंसे युक्त चन्द्रमा, वरुण, अश्विनीकुमारद्वय, बृहस्पति, गरुड़, यक्षराज कुबेर और देवी सरस्वती भी नहीं जानते हैं ॥ ३१ ॥ इस प्रकार देवाधिदेव गजानन गणेशजीका स्तवनकर उन सबने मुनि कौण्डिन्यकी आज्ञा लेकर अपने-अपने निवास-स्थानके लिये प्रस्थान किया ॥ ३२ ॥ तदनन्तर आश्रया भी दूर्वाके उत्तम माहात्म्यको जानकर पतिके वचनोंके प्रति विश्वस्त होकर उन विघ्नेश्वर गणेशजीका पूजन करने लगी, जो सभी देवताओंके भी देवता हैं और सभीके द्वारा दूर्वांकुरोंसे अर्चित हैं। अत्यन्त निर्मल चित्तसे उसने अपने पति कौण्डिन्यमुनिको प्रणाम किया और अपने-आपकी अत्यन्त निन्दा करते हुए कहने लगी— ॥ ३३-३४१/२ ॥ आश्रया बोली— हे स्वामिन् ! मुझ-जैसी कोई दुष्टा नहीं है, जिसने आपके भी वचनोंपर संशय किया। आप विशेष ज्ञानवालोंसे भी अधिक विशेष ज्ञानवाले हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंपर दयाभाव रखनेवाले हे प्रभो ! आपने उचित ही किया। [मैंने जो आपके वचनोंपर अविश्वास किया,] मेरे उस अपराधको अब आप क्षमा करें। मैं आपकी शरणमें आयी हूँ ॥ ३५-३६१/२ ॥ तदनन्तर दूर्वाके उत्तम माहात्म्यको जानकर उन दोनोंने प्रातःकाल शीघ्र उठकर और दूर्वा लाकर स्नान करके सम्यक् प्रकारसे गणेशजीका पूजनकर अनन्य भक्तिभावसे दूर्वांकुरका अर्पण किया ॥ ३७-३८ ॥ वे दोनों यज्ञ, व्रत, दान आदिका त्याग करके