भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 210

सायं-प्रातः निरन्तर देवाधिदेव गणेशजीका ही पूजन करते थे। यह जानकर परम दयालु भगवान् गजानन गणेशजीने उन्हें अपने धाममें पहुँचा दिया॥ ३९१/२॥ [गणेशजीके] गण बोले- [हे मुनीश्वरो! हमने] दूर्वाके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया, जो अगाध है। जिसके एक पत्रकी तुलना तीनों लोक नहीं कर सकते, उस दूर्वांकुरकी सम्पूर्ण महिमाका वर्णन करनेमें न तो [सहस्र मुखवाले] शेषनाग समर्थ हैं, न ही विष्णु और शिव ॥ ४०-४१॥ दूर्वाके स्मरणमात्रसे त्रिविध पाप नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि उसका स्मरण करनेपर भगवान् गजाननका भी स्मरण हो जाता है। इस प्रकार चिन्तामणिक्षेत्रके माहात्म्यका स्पष्ट रूपसे वर्णन किया गया, जिसके श्रवण, कीर्तन और ध्यान करनेसे भोग और मोक्षरूपी फलकी प्राप्ति होती है ॥ ४२-४३॥ इसी कारण उन तीनों (रासभ, वृषभ और चाण्डाली)-के लिये सुन्दर विमान भेजा गया था। गधे और बैलके मुखसे [निकलकर] दूर्वा भगवान् गणेशजी [के मस्तक]-पर पहुँची थी। चाण्डालीद्वारा तृणोंका भार शीतनाशके लिये लाया गया था। प्रबल वायुके झोंकेसे [उड़कर उसमेंसे] एक दूर्वा गजानन गणेशजी [के मस्तक]-पर पहुँच गयी; क्योंकि दूर्वा उनको प्रिय है, इसलिये वे विनायक उससे प्रसन्न हो गये और उन तीनोंके निष्पाप हो जानेके कारण उन्होंने उन्हें अपना सान्निध्य प्रदान किया ॥ ४४-४६॥ दूर्वाके गन्धमात्रसे वे प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं, भक्तिपूर्वक उसकी चर्चा करनेसे प्रसन्न हो जाते हैं, तो फिर मस्तकपर दूर्वाके अर्पणसे होनेवाली उनकी प्रसन्नताका भला क्या कहना ? ॥ ४७ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी !] इस प्रकार [गणेशजीके] गणोंद्वारा कही गयी दूर्वाकी महिमाका राजा [कृतवीर्यके पिता]-ने श्रवण किया, जिसे मुनियोंने भी [कभी] न देखा था, न सुना था ॥ ४८ ॥ तदनन्तर राजाने स्नानकर दूर्वांकुरोंको लेकर [उनसे] भगवान् विनायकका पूजन किया, तत्पश्चात् उसके सेवकोंने भी दूर्वांकुरोंसे श्रीगजाननका अर्चन किया ॥ ४९ ॥ [इससे] वे सभी दिव्य शरीरवाले और तेजसे सूर्यसदृश कान्तिमान् हो गये। उन सबने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे और उनके अंगोंमें दिव्य चन्दनका लेप लगा था। देवताओंद्वारा बजाये जा रहे वाद्योंकी अनेक प्रकारकी ध्वनियोंका श्रवण करते हुए वे एक श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ होकर गणेशजीके धामको चले गये और उनमेंसे कुछने उनका रूप धारण कर लिया अर्थात् उन्हें सारूप्य मुक्ति प्राप्त हो गयी ॥ ५०-५१ ॥ उस [गणेश]-महोत्सवको देखनेके लिये कुछ नागरिक जन भी आये थे, उन्होंने भी गणेशजीके पृथक्- पृथक् इक्कीस नामों* से दूर्वांकुरार्चन किया ॥ ५२ ॥ वे सभी समस्त भोगोंका भोगकर गणेशजीके धामको चले गये और उनके पुण्यसमूहके प्रभावसे विमान भी ऊर्ध्वगामी हो गया ॥ ५३॥ इसलिये गणेशजीके भक्तको दूर्वांकुरोंसे उनका अर्चन करना चाहिये। जो मनुष्य प्रमादवश दूर्वांकुरोंसे उनका अर्चन नहीं करता, उसे चाण्डाल जानना चाहिये। वह अनेक नरकोंमें जाता है। मनुष्यको कभी भी उसका मुख नहीं देखना चाहिये ॥ ५४-५५ ॥ उन देवदेव गजाननका जो व्यक्ति दूर्वांकुरोंसे अर्चन करता है, उसके दर्शनसे अन्य पापी व्यक्ति भी शुद्धिको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ५६ ॥ यदि बहुत-से दूर्वांकुरोंकी प्राप्ति न हो सके तो एक दूर्वासे ही पूजन करे, उस एक दूर्वासे भी की गयी पूजा [बिना दूर्वाके की गयी पूजासे] करोड़ों गुना फल देती है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५७॥


पाद-टिप्पणी (Footnote): * १. गणाधिपाय नमः, २. उमापुत्राय नमः, ३. अघनाशनाय नमः, ४. एकदन्ताय नमः, ५. इभवक्त्राय नमः, ६. मूषकवाहनाय नमः, ७. विनायकाय नमः, ८. ईशपुत्राय नमः, ९. सर्वसिद्धिप्रदाय नमः, १०. लम्बोदराय नमः, ११. वक्रतुण्डाय नमः, १२. मोदकप्रियाय नमः, १३. विघ्नविध्वंसकर्त्रे नमः, १४. विश्ववन्द्याय नमः, १५. अमरेशाय नमः, १६. गजकर्णाय नमः, १७. नागयज्ञोपवीतिने नमः, १८. भालचन्द्राय नमः, १९. परशुधारिणे नमः, २०. विघ्नाधिपाय नमः, २१. विद्याप्रदाय नमः। (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड ६९। ३५)