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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 656 में से

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पृष्ठ 218

२१६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- सत्तरवाँ अध्याय संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमा राजा बोले—हे प्रभो! पूर्वकालमें इस व्रत (संकष्टचतुर्थीव्रत)-को किसने किया ? भूलोकमें इसका प्रचार किसने किया? इस व्रतका क्या पुण्य है? इसके करनेका क्या फल है? दया करके इसे मुझे बतलाइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे राजन्! पूर्वकालमें कार्तिकेय [घरसे] चले गये थे१ तो शिवजीके कहनेसे पार्वतीजीने चार मासतक इस व्रतको किया था ॥ २ ॥ [उसके फलस्वरूप] पाँचवें महीनेमें अपर्णा (पार्वतीजी)-को कार्तिकेय दृष्टिगोचर हुए। [इसी प्रकार] पूर्वकालमें अगस्त्यजीने समुद्रको पी लेनेकी इच्छासे तीन महीनेतक व्रत किया और विघ्नेश्वर गणेशजीके कृपाप्रसादसे वे उसे पी गये।२ हे राजेन्द्र! पूर्वकालमें नलकी खोज करती हुई दमयन्ती३ने [भी] छः मासतक उस व्रतको किया था, तब उन्हें नलका दर्शन हुआ था। हे राजन्! पूर्वकालमें प्रद्युम्नके पुत्र अनिरुद्धको चित्रलेखा हर ले गयी थी।४ तब 'मेरा पुत्र कहाँ है', 'कौन उसे ले गया'—इस प्रकार सोचते हुए पुत्रशोकसे दुखी एवं व्याकुल प्रद्युम्नसे रुक्मिणीने कहा— ॥ ३-६ ॥ रुक्मिणीजी बोलीं—हे पुत्र! सुनो, अब मैं वह घटना बतलाती हूँ, जो अपने [ही] भवनमें घटित हुई थी। पूर्वकालमें जब तुम छः दिनके बालक थे, तो शम्बरद्वारा तुम्हें हर लिया गया था५॥ ७ ॥ तुम्हारे वियोगजनित दुःखसे मेरा हृदय व्याकुल था। [सोचती थी कि] मैं अपने अद्वितीय और अत्यन्त सुन्दर पुत्रको कब देखूँगी ? ॥ ८ ॥ अन्य स्त्रियोंके पुत्रोंको देखकर मैं मन-ही-मन सोचती थी कि मेरा भी पुत्र इतना ही बड़ा होता ॥ ९ ॥ इस प्रकार चिन्तासे व्याकुल रहते हुए मुझे अनेक वर्ष बीत गये, तब दैवयोगसे लोमशमुनि मेरे पास आये। हे पुत्र! तब मैंने उनके द्वारा उपदिष्ट उत्तम संकष्ट- चतुर्थीव्रतका, जो सम्पूर्ण चिन्ताओंका हरण करनेवाला है, चार बार अनुष्ठान किया ॥ १०-११ ॥ उसके प्रभावसे शम्बरको रणमें मारकर तुम आ गये। [अतः] तुम भी इस व्रतको करो, तब तुम्हें अपने पुत्रके विषयमें ज्ञान हो जायगा ॥ १२ ॥ ब्रह्माजी बोले—भगवान् गणेशको प्रसन्न करनेवाले इस (संकष्टचतुर्थी) व्रतको पूर्वकालमें प्रद्युम्नने किया था। [तदनन्तर] उन्होंने नारदजीसे सुना कि अनिरुद्ध बाणासुरके नगर (शोणितपुर)-में है ॥ १३ ॥ [वहाँ] ईश्वर (शंकरजी)-के साथ होनेवाले संग्रामसे भयभीत कृष्णने उद्धवकी आज्ञासे उस उत्तम व्रतको विधिपूर्वक एक बार किया। हे नरेन्द्र! तभी वे शोणितपुर जाकर क्षणभरमें बाणासुरको रणमें जीतकर उषासहित अनिरुद्धको ले आये थे ॥ १४-१५ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! सृष्टि करनेकी इच्छासे मैंने भी इस व्रतको किया था और इसके प्रभावसे मैंने अनेक प्रकारकी सृष्टि की। अन्य देवताओं, असुरों, मनुष्यों, ऋषियों, दानवों, यक्षों, किन्नरों, नागों और राक्षसोंके द्वारा विघ्नोंकी शान्तिके लिये यह व्रत किया गया है ॥ १६-१७ ॥ [मनुष्य अपनी] आपत्तियों और कष्टोंकी शान्तिके लिये इस व्रतको करे। संसारमें इसके समान दूसरा कोई १. कार्तिकेयजीके घर छोड़कर चले जानेकी कथा शिवपुराणकी कोटिरुद्रसंहिताके अध्याय १५में सविस्तार प्राप्त होती है। २. कालेय नामक राक्षसगण समुद्रमें रहते थे, इसलिये देवगण उनका वध करनेमें समर्थ नहीं हो पा रहे थे। देवताओंकी प्रार्थनापर महर्षि अगस्त्यने समुद्रके सम्पूर्ण जलका पान कर लिया, जिससे देवगण अत्याचारी कालेय राक्षसोंका वध कर सके। यह कथा महाभारत वनपर्वके अध्याय १०४-१०५ में प्राप्त होती है। ३. नल-दमयन्तीका आख्यान महाभारतके वनपर्वमें अध्याय ५३ से अध्याय ६९ तक विस्तारसे प्राप्त होता है। ४. चित्रलेखाद्वारा अनिरुद्धको हर ले जानेकी कथा श्रीमद्भागवतमहापुराणके दशम स्कन्धके ६२वें अध्यायमें प्राप्त होती है। ५. शम्बरद्वारा प्रद्युम्नके हरणकी कथा श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धके ५५वें अध्यायमें प्राप्त होती है।