श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०६९ ] * देवराज इन्द्रका राजा शूरसेनसे संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधिका निरूपण करना * २१५ नमः—वक्रतुण्डको नमस्कार है। (१२) अघनाशनाय नमः—पापोंका नाश करनेवालेको नमस्कार है। (१३) विघ्नविध्वंसकर्त्रे नमः—विघ्नविध्वंसकर्ताको नमस्कार है। (१४) विश्ववन्द्याय नमः—विश्ववन्द्यको नमस्कार है। (१५) अमरेश्वराय नमः—अमरेश्वरको नमस्कार है। (१६) गजवक्त्राय नमः—गजाननको नमस्कार है। (१७) नागयज्ञोपवीतिने नमः—नागको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करनेवालेको नमस्कार है। (१८) भालचन्द्राय नमः—मस्तकपर चन्द्रमाको धारण करनेवालेको नमस्कार है। (१९) परशुधारिणे नमः— परशुधारीको नमस्कार है। (२०) विघ्नाधिपाय नमः— विघ्नोंके अधिपतिको नमस्कार है। (२१) सर्वविद्या- प्रदायकाय नमः—सभी विद्याएँ प्रदान करनेवालेको नमस्कार है॥४७-५१॥ इस प्रकार [इन इक्कीस नाम-मन्त्रोंसे] पृथक्- पृथक् [एक-एक] दूर्वासे भगवान् गणेशका अर्चन करे। [तदनन्तर इस प्रकार कहे—हे देव!] जिस उद्देश्यसे मैंने यथाशक्ति सम्यक् रूपसे [आपका] पूजन किया है, उससे आप शीघ्र प्रसन्न हों और मेरी मनोकामनाओंको पूर्ण करें तथा मेरे सभी विघ्नों और उपस्थित दुष्टोंका नाश करें॥ ५२-५३॥ मैं आपके कृपाप्रसादसे ही सारे कार्य कर रहा हूँ, आप मेरे शत्रुओंकी बुद्धिका नाश और मित्रोंका अभ्युदय कीजिये ॥ ५४ ॥ इस प्रकार निवेदनकर देवाधिदेव गणेशजीको बारम्बार प्रणामकर व्रती एक सौ आठ आहुतियोंसे हवन करे॥ ५५॥ वायनदान—[तदनन्तर] व्रतकी सम्यक् रूपसे सम्पूर्णताके लिये इक्कीस मोदकों अथवा इक्कीस लड्डुओं या इक्कीस बड़ोंको इक्कीस फलोंके साथ लाल कपड़ेमें लपेटकर वायनके रूपमें अपने आचार्यको निवेदित करे ॥ ५६ १/२ ॥ वायनदान मन्त्र—वायनदानका मन्त्र इस प्रकार है—'सम्पूर्ण संकल्पोंमें सिद्धि प्रदान करनेवाले हे गणाधिपति! आपको नमस्कार है। इस वायनदानसे मेरे संकटोंका निवारण कीजिये।' तदनन्तर पुण्यमयी कथाका श्रवणकर समाहित चित्तवाला होकर अर्घ्य प्रदान करे ॥ ५७-५८ ॥ तिथ्यर्थदान—तिथियोंमें उत्तम हे देवि! गणेशजीकी हे प्रिय वल्लभा! [इस] अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये। हे देवि! आपको नमस्कार है ॥ ५९ ॥ ऐसा कहकर तिथ्यर्थ दे। देवार्थ अर्घ्यदान—हे मोदकप्रिय लम्बोदर गणेशजी! आपको निरन्तर नमस्कार है। हे देव! [इस] अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये, आपको नमस्कार है। हे गजानन! आपको नमस्कार है, हे गजकर्ण! हे महाबल! मेरे द्वारा प्रदत्त अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और संकटोंसे मुझे दूर कीजिये। हे गणराज! हे महाकाय! हे विघ्नराज! हे गजानन! हे सभी कार्योंमें अभीष्ट फल देनेवाले! अर्घ्य ग्रहण कीजिये। आपको नमस्कार है। हे प्रभो! हे देवेश! मेरे जो-जो संकट तथा विघ्न हों, उन सबका शीघ्र ही ध्वंस कीजिये और अर्घ्य ग्रहण कीजिये। आपको नमस्कार है ॥ ६०-६३॥ ऐसा कहकर भगवान् गणेशके लिये अर्घ्य दे। चन्द्रार्थ अर्घ्यदान—[देवराज इन्द्र राजा शूरसेनसे कहते हैं—] हे राजन्! इस मन्त्रसे चन्द्रमाको सात बार अर्घ्य दे— 'क्षीरसागर [-का मन्थन होने]-से प्रकट हुए, अत्रिगोत्रमें उत्पन्न हे चन्द्रदेव! मेरे द्वारा दिये गये अर्घ्यको रोहिणीसहित ग्रहण करें'॥ ६४ ॥ यह चन्द्रमाको अर्घ्य देनेका मन्त्र है। तदनन्तर भगवान्से क्षमा-याचना करे, उसके बाद ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर ब्राह्मणोंको अर्पित करनेके बाद जो शेष बचा हो, उसका स्वयं भोजन करे ॥ ६५ ॥ मौन रहते हुए यथाशक्ति, यथारुचि सात ग्रास भोजन करे। इस प्रकार चार महीनेतक विधानपूर्वक [संकष्टचतुर्थी] व्रत करे ॥ ६६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीव्रतविधिवर्णन' नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६९ ॥