श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 216, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] (१९) परशुधारिणे नमः—परशु धारण करनेवालेको नमस्कार है। (२०) विघ्नाधिपाय नमः—विघ्नोंके अधिपतिके लिये नमस्कार है। (२१) विद्याप्रदाय नमः—विद्या प्रदान करनेवालेके लिये नमस्कार है॥ ३६॥ नीराजन—हे ईश! कर्पूर और अग्निके संयोजनसे तैयार की गयी, सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली आरतीको स्वीकार करें और मुझे संकटोंसे छुटकारा दें॥ ३७॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'सप्तास्यासन्० १' इस वैदिक मन्त्रसे आरती दिखलाये। पुष्पाञ्जलि—[हे देव!] चम्पा, अशोक, मौलसिरी, पारिजातके सुन्दर पुष्पोंसे युक्त इस पुष्पाञ्जलिको स्वीकार करें और मुझे संकटोंसे मुक्त करें॥ ३८॥ 'यज्ञेन० २' इस वैदिक ऋचासे पुष्पाञ्जलि प्रदान करें। स्तुति—हे गजानन! आप ही विश्वका सृजन करते हैं। हे देव! आप ही विश्वका परिपालन करते हैं। हे अखिलेश्वर! आप ही विश्वका संहार करते हैं। हे विश्वात्मन्! आप ही सम्पूर्ण विश्वमें भासित हो रहे हैं॥ ३९॥ इस मन्त्रसे स्तुति करे। नमस्कार—गणाधिपति भगवान् गणेशजीको मैं प्रणाम करता हूँ, जो भक्तोंके कष्टोंको दूर करनेवाले, भक्तोंको मुक्ति प्रदान करनेमें निपुण, विद्या प्रदान करनेवाले, वेदोंका सर्वप्रथम विधान करनेवाले, विघ्नोंके स्वामी और विघ्नोंका विनाश करनेमें दक्ष हैं॥ ४०॥ इस मन्त्रसे नमस्कार करे। प्रदक्षिणा—इस प्रकार स्तुति करके बारम्बार विधिवत् प्रणाम करे और तदनन्तर यथाशक्ति [या न्यूनतम] इक्कीस बार परिक्रमा करे॥ ४१॥ प्रार्थना—हे गणेशजी! जो मूढ़जन आपका पूजन न करके अपने मनोरथकी सिद्धि करना चाहते हैं, वे इस संसारमें निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं, मुझे आपका सम्पूर्ण प्रभाव ज्ञात है॥ ४२॥ इस मन्त्रसे प्रार्थना करे।
[दायाँ स्तम्भ] वायनदान—हे आचार्य! हे द्विजाध्यक्ष! हे सर्वसिद्धिप्रदायक! वायन ग्रहण कीजिये। हे ब्रह्मन्! मेरे संकटोंका निवारण कीजिये॥ ४३॥ विशेषार्घ्य—[हे प्रभो!] फल, पुष्प, अक्षत और जलसे युक्त विशेषार्घ्यको मैंने दक्षिणासहित [आपके हेतु] प्रदान किया। [आप] मेरे संकटोंका निवारण कीजिये। इस प्रकार सोलह उपचारोंके द्वारा 'ॐ नमो हेरम्ब मदमोदित मम संकटं निवारय स्वाहा' इस मन्त्रसे [गणेशजीका] पूजन करे। साथ ही विद्वान् पुरुष उनके चारों ओर इन्द्रादि लोकपालों ३ का भी पूजन करें॥ ४४-४५॥ [गो-] घृतमें पकाकर बनाये गये तिल और मूँगके मोदक तथा अन्य भोज्य पदार्थोंको यथाशक्ति [गणेशजीके सम्मुख] रखे तथा [लौंग-इलायची-कर्पूर आदिसे समन्वित] ताम्बूल भी निवेदित करे॥ ४६॥ तदनन्तर इक्कीस दूर्वांकुरोंको लेकर भक्तिपूर्वक सावधान-चित्त होकर इन नामोंसे भगवान् गणेशका अर्चन करे— दूर्वांकुरार्चन— (१) गणाधिपाय नमः—गणोंके अधिपतिके लिये नमस्कार है। (२) उमापुत्राय नमः—[भगवती] उमाके पुत्रके लिये नमस्कार है। (३) अभयप्रदाय नमः— अभय प्रदान करनेवालेको नमस्कार है। (४) एकदन्ताय नमः—एकदन्तको नमस्कार है। (५) इभवक्त्राय नमः—गजमुखके लिये नमस्कार है। (६) मूषक- वाहनाय नमः—मूषकवाहनके लिये नमस्कार है। (७) विनायककाय नमः—विनायकके लिये नमस्कार है। (८) ईशपुत्राय नमः—ईशपुत्रके लिये नमस्कार है। (९) सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः—सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करनेवालेके लिये नमस्कार है। (१०) लम्बोदराय नमः—लम्बोदरको नमस्कार है। (११) वक्रतुण्डाय
[पाद-टिप्पणी] १. सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥ (यजु० ३१।१५) २. यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (यजु० ३१।१६) ३. वस्तुतः 'इन्द्रादि लोकपालानां' शब्दसे यहाँ 'इन्द्रादि दस दिक्पालों' का अर्थ लेना चाहिये। पूर्वमें इन्द्र, अग्निकोणमें अग्नि, दक्षिणमें यम, नैर्ऋत्यकोणमें निर्ऋति, पश्चिममें वरुण, वायव्यकोणमें वायु, उत्तरमें कुबेर, ईशानकोणमें ईशान, ईशान और पूर्वके मध्यमें ब्रह्मा, नैर्ऋत्य- पश्चिमके मध्यमें अनन्तका आवाहन, स्थापन और पूजन करना चाहिये।