श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 215, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०६९] * देवराज इन्द्रका राजा शूरसेनसे संकटचतुर्थीव्रतकी विधिका निरूपण करना * २१३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कीजिये—ऐसा कहकर अक्षत समर्पित करे ॥ २८ ॥ पुष्प—हे गणाध्यक्ष ! चम्पा, मालती, दूर्वा और अनेक जातिके पुष्प मैं आपके लिये लाया हूँ, इन्हें ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २९ ॥ 'तस्मादश्वा० १' इस वैदिक ऋचासे पुष्प चढ़ाये। धूप—हे लम्बोदर ! हे महाकाय ! हे धूम्रकेतु ! [इस] सुगन्धित धूपको ग्रहण कीजिये। हे देवेश ! मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ ३० ॥ 'यत्पुरुषं० २' इस वैदिक ऋचासे धूप आघ्रापित करे। दीप—विघ्नरूपी अन्धकारका संहार करनेवाले हे देवाधिदेव ! [इस] दीपको ग्रहण कीजिये अर्थात् मेरे द्वारा इस दीप दिखानेकी सेवा स्वीकार कीजिये। हे देवेश ! मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ ३१ ॥ 'ब्राह्मणो० ३' इस वैदिक ऋचासे दीप दिखाये। नैवेद्य—हे देव ! मोदक, पुआ, लड्डू, शर्करायुक्त खीर तथा घृतमें पके हुए विविध प्रकारके पकवानोंको नैवेद्यके रूपमें ग्रहण कीजिये ॥ ३२ ॥ 'चन्द्रमा मनसो० ४' इस वैदिक ऋचासे नैवेद्य समर्पित करे। फल—हे देवेश ! नारियल, अंगूर, आम, अनारके [इन] सुन्दर फलोंको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये ॥ ३३ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर नाभ्या आसीद्० ५ इस वैदिक मन्त्रसे ऋतुफल समर्पण करे। ताम्बूल—सुपारी, इलायची, लौंग और ताम्बूल- पत्रसे युक्त ताम्बूलको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये ॥ ३४ ॥ 'सप्तास्या० ६' इस मन्त्रसे ताम्बूल समर्पित करे। दक्षिणा—हे देव ! सुवर्ण सबके लिये प्रीतिकर और सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला होता है, अतः इसे आप दक्षिणाके रूपमें ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये ॥ ३५ ॥ 'यज्ञेन यज्ञम्० ७' इस मन्त्रसे दक्षिणा चढ़ाये। तदनन्तर इक्कीस दूर्वांकुरोंको लेकर भक्तिपूर्वक सावधानचित्त होकर इन नाम-मन्त्रोंसे भगवान् गणेशजीका अर्चन करे— (१) गणाधिपाय नमः—गणोंके अधिपतिके लिये नमस्कार है। (२) उमापुत्राय नमः—[भगवती] उमाके पुत्रके लिये नमस्कार है। (३) अघनाशनाय नमः—पापोंका नाश करनेवालेके लिये नमस्कार है। (४) एकदन्ताय नमः—एकदन्तको नमस्कार है। (५) इभवक्त्राय नमः—गजमुखके लिये नमस्कार है। (६) मूषकवाहनाय नमः—मूषकवाहनके लिये नमस्कार है। (७) विनायकाय नमः—विनायकके लिये नमस्कार है। (८) ईशपुत्राय नमः—ईशपुत्रके लिये नमस्कार है। (९) सर्वसिद्धिप्रदाय नमः— सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करनेवालेके लिये नमस्कार है। (१०) लम्बोदराय नमः—जिनका उदरप्रदेश लम्बा है, ऐसे गणेशजीके लिये नमस्कार है। (११) वक्रतुण्डाय नमः—टेढ़ी सूँड़वालेके लिये नमस्कार है। (१२) मोदकप्रियाय नमः—जिन्हें मोदक प्रिय है, ऐसे गणेशजीके लिये नमस्कार है। (१३) विघ्नविध्वंसकत्रे नमः—विघ्नोंका विध्वंस करनेवालेको नमस्कार है। (१४) विश्ववन्द्याय नमः—विश्ववन्द्यके लिये नमस्कार है। (१५) अमरेशाय नमः—अमरेश अर्थात् देवताओंके स्वामीके लिये नमस्कार है। (१६) गजकर्णाय नमः— हाथीके कानके सदृश कानवालेके लिये नमस्कार है। (१७) नागयज्ञोपवीतिने नमः—नागको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करनेवालेको नमस्कार है। (१८) भालचन्द्राय नमः—जिन्होंने चन्द्रमाको अपने मस्तकपर धारण कर रखा है, ऐसे गणेशजीके लिये नमस्कार है। १. तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज्जाता अजावयः॥ (यजु० ३१।८) २. यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादा उच्येते॥ (यजु० ३१।१०) ३. ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥ (यजु० ३१।११) ४. चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत॥ (यजु० ३१।१२) ५. नाभ्या आसीदन्तरिक्षः शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत। पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँर अकल्पयन्॥ (यजु० ३१।१३) ६. सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥ (यजु० ३१।१५) ७. यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (यजु० ३१।१६)