भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 656 में से

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पृष्ठ 214

२१२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'सहस्रशीर्षा० १'—इस वैदिक ऋचासे आवाहन करे। आसन— हे गणाधिपति ! हे सर्वसिद्धिप्रदायक ! आपको नमस्कार है। हे देव! आप आसन ग्रहण करें और मुझे संकटसे उबारें ॥ १८ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'पुरुष एव० २' इस वैदिक ऋचासे आसन प्रदान करे। पाद्य— हे उमापुत्र ! आपको नमस्कार है। हे मोदकप्रिय ! नमस्कार है। हे देवेश्वर ! [इस] पाद-प्रक्षालनहेतु दिये गये जलको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ १९ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'एतावानस्य ० ३' इस वैदिक ऋचासे पाद्य-समर्पण करे। अर्घ्य— हे लम्बोदर ! आपको नमस्कार है, हे देवेश्वर ! रत्नसे युक्त और फलसे समन्वित इस अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २० ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'त्रिपादूर्ध्व० ४' इस वैदिक ऋचासे अर्घ्य-समर्पण करे। आचमन— [हे प्रभो !] गंगा आदि सभी तीर्थोंसे लाये गये उत्तम जलको आचमनहेतु ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २१ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'ततो विराड० ५' इस वैदिक ऋचासे आचमनके लिये जल प्रदान करे। पंचामृतस्नान— [हे प्रभो !] दूध, दही, घी, शर्करा और शहदसे युक्त इस पंचामृतको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २२ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'पञ्च नद्यः० ६' आदि वैदिक मन्त्रोंसे पंचामृतस्नान कराये।


[दायाँ स्तम्भ] स्नान— [हे देव !] नर्मदा, चन्द्रभागा [आदि पुण्यदायिनी नदियों] तथा गंगा-संगमके जलसे आप मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक स्नान कराये गये हैं, आप मेरे संकटका निवारण करें ॥ २३ ॥ 'यत्पुरुषेण ० ७' इस वैदिक ऋचासे [शुद्धोदक] स्नान कराये। वस्त्र— हे गजानन ! आपको नमस्कार है। हे परमात्मन् ! इस वस्त्रयुगल (धोती और उत्तरीय)-को ग्रहण कीजिये। हे गणाध्यक्ष ! मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २४ ॥ 'तं यज्ञम् ० ८' इस वैदिक ऋचासे वस्त्र समर्पित करे। यज्ञोपवीत— हे विनायक ! आपको नमस्कार है। हे परशुधारिन् ! आपको नमस्कार है, इस उपवीतको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २५ ॥ 'तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतम् ० ९' इस वैदिक ऋचासे यज्ञोपवीत समर्पित करे। आभूषण— [हे गजानन !] केयूर, कटक, मुद्रिका, अंगद आदि इन अलंकारोंको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २६ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'स हि रत्नानि' इस वैदिक ऋचासे अलंकार अर्पण करे। गन्ध— हे ईशपुत्र ! आपको नमस्कार है। हे मूषकवाहन ! आपको नमस्कार है। हे देव! [इस] चन्दनको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २७ ॥ 'तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः ० १०' इस वैदिक ऋचासे चन्दन समर्पित करे। अक्षत— हे देव! घृत और कुंकुमसे युक्त सुन्दर मनोहर चावलोंको अक्षतके रूपमें आपको समर्पित किया है, [इन्हें ग्रहण कीजिये और] मेरे संकटका निवारण


पाद-टिप्पणी (वैदिक मन्त्र): १. सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिग्ंसर्वत स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ (यजु० ३१ । १) २. पुरुष एवेदग्ं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ (यजु० ३१ । २) ३. एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (यजु० ३१ । ३) ४. त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः । ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥ (यजु० ३१ । ४) ५. ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥ (यजु० ३१ । ५) ६. पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः । सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित् ॥ (यजु० ३४ । ११) ७. यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥ (यजु० ३१ । १४) ८. तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥ (यजु० ३१ । ९) ९. तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥ (यजु० ३१ । ६) १०. तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत ॥ (यजु० ३१ । ७)