श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२१२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'सहस्रशीर्षा० १'—इस वैदिक ऋचासे आवाहन करे। आसन— हे गणाधिपति ! हे सर्वसिद्धिप्रदायक ! आपको नमस्कार है। हे देव! आप आसन ग्रहण करें और मुझे संकटसे उबारें ॥ १८ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'पुरुष एव० २' इस वैदिक ऋचासे आसन प्रदान करे। पाद्य— हे उमापुत्र ! आपको नमस्कार है। हे मोदकप्रिय ! नमस्कार है। हे देवेश्वर ! [इस] पाद-प्रक्षालनहेतु दिये गये जलको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ १९ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'एतावानस्य ० ३' इस वैदिक ऋचासे पाद्य-समर्पण करे। अर्घ्य— हे लम्बोदर ! आपको नमस्कार है, हे देवेश्वर ! रत्नसे युक्त और फलसे समन्वित इस अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २० ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'त्रिपादूर्ध्व० ४' इस वैदिक ऋचासे अर्घ्य-समर्पण करे। आचमन— [हे प्रभो !] गंगा आदि सभी तीर्थोंसे लाये गये उत्तम जलको आचमनहेतु ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २१ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'ततो विराड० ५' इस वैदिक ऋचासे आचमनके लिये जल प्रदान करे। पंचामृतस्नान— [हे प्रभो !] दूध, दही, घी, शर्करा और शहदसे युक्त इस पंचामृतको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २२ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'पञ्च नद्यः० ६' आदि वैदिक मन्त्रोंसे पंचामृतस्नान कराये।
[दायाँ स्तम्भ] स्नान— [हे देव !] नर्मदा, चन्द्रभागा [आदि पुण्यदायिनी नदियों] तथा गंगा-संगमके जलसे आप मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक स्नान कराये गये हैं, आप मेरे संकटका निवारण करें ॥ २३ ॥ 'यत्पुरुषेण ० ७' इस वैदिक ऋचासे [शुद्धोदक] स्नान कराये। वस्त्र— हे गजानन ! आपको नमस्कार है। हे परमात्मन् ! इस वस्त्रयुगल (धोती और उत्तरीय)-को ग्रहण कीजिये। हे गणाध्यक्ष ! मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २४ ॥ 'तं यज्ञम् ० ८' इस वैदिक ऋचासे वस्त्र समर्पित करे। यज्ञोपवीत— हे विनायक ! आपको नमस्कार है। हे परशुधारिन् ! आपको नमस्कार है, इस उपवीतको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २५ ॥ 'तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतम् ० ९' इस वैदिक ऋचासे यज्ञोपवीत समर्पित करे। आभूषण— [हे गजानन !] केयूर, कटक, मुद्रिका, अंगद आदि इन अलंकारोंको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २६ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'स हि रत्नानि' इस वैदिक ऋचासे अलंकार अर्पण करे। गन्ध— हे ईशपुत्र ! आपको नमस्कार है। हे मूषकवाहन ! आपको नमस्कार है। हे देव! [इस] चन्दनको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २७ ॥ 'तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः ० १०' इस वैदिक ऋचासे चन्दन समर्पित करे। अक्षत— हे देव! घृत और कुंकुमसे युक्त सुन्दर मनोहर चावलोंको अक्षतके रूपमें आपको समर्पित किया है, [इन्हें ग्रहण कीजिये और] मेरे संकटका निवारण
पाद-टिप्पणी (वैदिक मन्त्र): १. सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिग्ंसर्वत स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ (यजु० ३१ । १) २. पुरुष एवेदग्ं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ (यजु० ३१ । २) ३. एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (यजु० ३१ । ३) ४. त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः । ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥ (यजु० ३१ । ४) ५. ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥ (यजु० ३१ । ५) ६. पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः । सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित् ॥ (यजु० ३४ । ११) ७. यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥ (यजु० ३१ । १४) ८. तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥ (यजु० ३१ । ९) ९. तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥ (यजु० ३१ । ६) १०. तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत ॥ (यजु० ३१ । ७)
उ०ख०-अ०६९] * देवराज इन्द्रका राजा शूरसेनसे संकटचतुर्थीव्रतकी विधिका निरूपण करना * २१३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कीजिये—ऐसा कहकर अक्षत समर्पित करे ॥ २८ ॥ पुष्प—हे गणाध्यक्ष ! चम्पा, मालती, दूर्वा और अनेक जातिके पुष्प मैं आपके लिये लाया हूँ, इन्हें ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २९ ॥ 'तस्मादश्वा० १' इस वैदिक ऋचासे पुष्प चढ़ाये। धूप—हे लम्बोदर ! हे महाकाय ! हे धूम्रकेतु ! [इस] सुगन्धित धूपको ग्रहण कीजिये। हे देवेश ! मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ ३० ॥ 'यत्पुरुषं० २' इस वैदिक ऋचासे धूप आघ्रापित करे। दीप—विघ्नरूपी अन्धकारका संहार करनेवाले हे देवाधिदेव ! [इस] दीपको ग्रहण कीजिये अर्थात् मेरे द्वारा इस दीप दिखानेकी सेवा स्वीकार कीजिये। हे देवेश ! मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ ३१ ॥ 'ब्राह्मणो० ३' इस वैदिक ऋचासे दीप दिखाये। नैवेद्य—हे देव ! मोदक, पुआ, लड्डू, शर्करायुक्त खीर तथा घृतमें पके हुए विविध प्रकारके पकवानोंको नैवेद्यके रूपमें ग्रहण कीजिये ॥ ३२ ॥ 'चन्द्रमा मनसो० ४' इस वैदिक ऋचासे नैवेद्य समर्पित करे। फल—हे देवेश ! नारियल, अंगूर, आम, अनारके [इन] सुन्दर फलोंको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये ॥ ३३ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर नाभ्या आसीद्० ५ इस वैदिक मन्त्रसे ऋतुफल समर्पण करे। ताम्बूल—सुपारी, इलायची, लौंग और ताम्बूल- पत्रसे युक्त ताम्बूलको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये ॥ ३४ ॥ 'सप्तास्या० ६' इस मन्त्रसे ताम्बूल समर्पित करे। दक्षिणा—हे देव ! सुवर्ण सबके लिये प्रीतिकर और सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला होता है, अतः इसे आप दक्षिणाके रूपमें ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये ॥ ३५ ॥ 'यज्ञेन यज्ञम्० ७' इस मन्त्रसे दक्षिणा चढ़ाये। तदनन्तर इक्कीस दूर्वांकुरोंको लेकर भक्तिपूर्वक सावधानचित्त होकर इन नाम-मन्त्रोंसे भगवान् गणेशजीका अर्चन करे— (१) गणाधिपाय नमः—गणोंके अधिपतिके लिये नमस्कार है। (२) उमापुत्राय नमः—[भगवती] उमाके पुत्रके लिये नमस्कार है। (३) अघनाशनाय नमः—पापोंका नाश करनेवालेके लिये नमस्कार है। (४) एकदन्ताय नमः—एकदन्तको नमस्कार है। (५) इभवक्त्राय नमः—गजमुखके लिये नमस्कार है। (६) मूषकवाहनाय नमः—मूषकवाहनके लिये नमस्कार है। (७) विनायकाय नमः—विनायकके लिये नमस्कार है। (८) ईशपुत्राय नमः—ईशपुत्रके लिये नमस्कार है। (९) सर्वसिद्धिप्रदाय नमः— सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करनेवालेके लिये नमस्कार है। (१०) लम्बोदराय नमः—जिनका उदरप्रदेश लम्बा है, ऐसे गणेशजीके लिये नमस्कार है। (११) वक्रतुण्डाय नमः—टेढ़ी सूँड़वालेके लिये नमस्कार है। (१२) मोदकप्रियाय नमः—जिन्हें मोदक प्रिय है, ऐसे गणेशजीके लिये नमस्कार है। (१३) विघ्नविध्वंसकत्रे नमः—विघ्नोंका विध्वंस करनेवालेको नमस्कार है। (१४) विश्ववन्द्याय नमः—विश्ववन्द्यके लिये नमस्कार है। (१५) अमरेशाय नमः—अमरेश अर्थात् देवताओंके स्वामीके लिये नमस्कार है। (१६) गजकर्णाय नमः— हाथीके कानके सदृश कानवालेके लिये नमस्कार है। (१७) नागयज्ञोपवीतिने नमः—नागको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करनेवालेको नमस्कार है। (१८) भालचन्द्राय नमः—जिन्होंने चन्द्रमाको अपने मस्तकपर धारण कर रखा है, ऐसे गणेशजीके लिये नमस्कार है। १. तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज्जाता अजावयः॥ (यजु० ३१।८) २. यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादा उच्येते॥ (यजु० ३१।१०) ३. ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥ (यजु० ३१।११) ४. चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत॥ (यजु० ३१।१२) ५. नाभ्या आसीदन्तरिक्षः शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत। पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँर अकल्पयन्॥ (यजु० ३१।१३) ६. सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥ (यजु० ३१।१५) ७. यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (यजु० ३१।१६)
२९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] (१९) परशुधारिणे नमः—परशु धारण करनेवालेको नमस्कार है। (२०) विघ्नाधिपाय नमः—विघ्नोंके अधिपतिके लिये नमस्कार है। (२१) विद्याप्रदाय नमः—विद्या प्रदान करनेवालेके लिये नमस्कार है॥ ३६॥ नीराजन—हे ईश! कर्पूर और अग्निके संयोजनसे तैयार की गयी, सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली आरतीको स्वीकार करें और मुझे संकटोंसे छुटकारा दें॥ ३७॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'सप्तास्यासन्० १' इस वैदिक मन्त्रसे आरती दिखलाये। पुष्पाञ्जलि—[हे देव!] चम्पा, अशोक, मौलसिरी, पारिजातके सुन्दर पुष्पोंसे युक्त इस पुष्पाञ्जलिको स्वीकार करें और मुझे संकटोंसे मुक्त करें॥ ३८॥ 'यज्ञेन० २' इस वैदिक ऋचासे पुष्पाञ्जलि प्रदान करें। स्तुति—हे गजानन! आप ही विश्वका सृजन करते हैं। हे देव! आप ही विश्वका परिपालन करते हैं। हे अखिलेश्वर! आप ही विश्वका संहार करते हैं। हे विश्वात्मन्! आप ही सम्पूर्ण विश्वमें भासित हो रहे हैं॥ ३९॥ इस मन्त्रसे स्तुति करे। नमस्कार—गणाधिपति भगवान् गणेशजीको मैं प्रणाम करता हूँ, जो भक्तोंके कष्टोंको दूर करनेवाले, भक्तोंको मुक्ति प्रदान करनेमें निपुण, विद्या प्रदान करनेवाले, वेदोंका सर्वप्रथम विधान करनेवाले, विघ्नोंके स्वामी और विघ्नोंका विनाश करनेमें दक्ष हैं॥ ४०॥ इस मन्त्रसे नमस्कार करे। प्रदक्षिणा—इस प्रकार स्तुति करके बारम्बार विधिवत् प्रणाम करे और तदनन्तर यथाशक्ति [या न्यूनतम] इक्कीस बार परिक्रमा करे॥ ४१॥ प्रार्थना—हे गणेशजी! जो मूढ़जन आपका पूजन न करके अपने मनोरथकी सिद्धि करना चाहते हैं, वे इस संसारमें निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं, मुझे आपका सम्पूर्ण प्रभाव ज्ञात है॥ ४२॥ इस मन्त्रसे प्रार्थना करे।
[दायाँ स्तम्भ] वायनदान—हे आचार्य! हे द्विजाध्यक्ष! हे सर्वसिद्धिप्रदायक! वायन ग्रहण कीजिये। हे ब्रह्मन्! मेरे संकटोंका निवारण कीजिये॥ ४३॥ विशेषार्घ्य—[हे प्रभो!] फल, पुष्प, अक्षत और जलसे युक्त विशेषार्घ्यको मैंने दक्षिणासहित [आपके हेतु] प्रदान किया। [आप] मेरे संकटोंका निवारण कीजिये। इस प्रकार सोलह उपचारोंके द्वारा 'ॐ नमो हेरम्ब मदमोदित मम संकटं निवारय स्वाहा' इस मन्त्रसे [गणेशजीका] पूजन करे। साथ ही विद्वान् पुरुष उनके चारों ओर इन्द्रादि लोकपालों ३ का भी पूजन करें॥ ४४-४५॥ [गो-] घृतमें पकाकर बनाये गये तिल और मूँगके मोदक तथा अन्य भोज्य पदार्थोंको यथाशक्ति [गणेशजीके सम्मुख] रखे तथा [लौंग-इलायची-कर्पूर आदिसे समन्वित] ताम्बूल भी निवेदित करे॥ ४६॥ तदनन्तर इक्कीस दूर्वांकुरोंको लेकर भक्तिपूर्वक सावधान-चित्त होकर इन नामोंसे भगवान् गणेशका अर्चन करे— दूर्वांकुरार्चन— (१) गणाधिपाय नमः—गणोंके अधिपतिके लिये नमस्कार है। (२) उमापुत्राय नमः—[भगवती] उमाके पुत्रके लिये नमस्कार है। (३) अभयप्रदाय नमः— अभय प्रदान करनेवालेको नमस्कार है। (४) एकदन्ताय नमः—एकदन्तको नमस्कार है। (५) इभवक्त्राय नमः—गजमुखके लिये नमस्कार है। (६) मूषक- वाहनाय नमः—मूषकवाहनके लिये नमस्कार है। (७) विनायककाय नमः—विनायकके लिये नमस्कार है। (८) ईशपुत्राय नमः—ईशपुत्रके लिये नमस्कार है। (९) सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः—सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करनेवालेके लिये नमस्कार है। (१०) लम्बोदराय नमः—लम्बोदरको नमस्कार है। (११) वक्रतुण्डाय
[पाद-टिप्पणी] १. सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥ (यजु० ३१।१५) २. यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (यजु० ३१।१६) ३. वस्तुतः 'इन्द्रादि लोकपालानां' शब्दसे यहाँ 'इन्द्रादि दस दिक्पालों' का अर्थ लेना चाहिये। पूर्वमें इन्द्र, अग्निकोणमें अग्नि, दक्षिणमें यम, नैर्ऋत्यकोणमें निर्ऋति, पश्चिममें वरुण, वायव्यकोणमें वायु, उत्तरमें कुबेर, ईशानकोणमें ईशान, ईशान और पूर्वके मध्यमें ब्रह्मा, नैर्ऋत्य- पश्चिमके मध्यमें अनन्तका आवाहन, स्थापन और पूजन करना चाहिये।
उ०ख०-अ०६९ ] * देवराज इन्द्रका राजा शूरसेनसे संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधिका निरूपण करना * २१५ नमः—वक्रतुण्डको नमस्कार है। (१२) अघनाशनाय नमः—पापोंका नाश करनेवालेको नमस्कार है। (१३) विघ्नविध्वंसकर्त्रे नमः—विघ्नविध्वंसकर्ताको नमस्कार है। (१४) विश्ववन्द्याय नमः—विश्ववन्द्यको नमस्कार है। (१५) अमरेश्वराय नमः—अमरेश्वरको नमस्कार है। (१६) गजवक्त्राय नमः—गजाननको नमस्कार है। (१७) नागयज्ञोपवीतिने नमः—नागको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करनेवालेको नमस्कार है। (१८) भालचन्द्राय नमः—मस्तकपर चन्द्रमाको धारण करनेवालेको नमस्कार है। (१९) परशुधारिणे नमः— परशुधारीको नमस्कार है। (२०) विघ्नाधिपाय नमः— विघ्नोंके अधिपतिको नमस्कार है। (२१) सर्वविद्या- प्रदायकाय नमः—सभी विद्याएँ प्रदान करनेवालेको नमस्कार है॥४७-५१॥ इस प्रकार [इन इक्कीस नाम-मन्त्रोंसे] पृथक्- पृथक् [एक-एक] दूर्वासे भगवान् गणेशका अर्चन करे। [तदनन्तर इस प्रकार कहे—हे देव!] जिस उद्देश्यसे मैंने यथाशक्ति सम्यक् रूपसे [आपका] पूजन किया है, उससे आप शीघ्र प्रसन्न हों और मेरी मनोकामनाओंको पूर्ण करें तथा मेरे सभी विघ्नों और उपस्थित दुष्टोंका नाश करें॥ ५२-५३॥ मैं आपके कृपाप्रसादसे ही सारे कार्य कर रहा हूँ, आप मेरे शत्रुओंकी बुद्धिका नाश और मित्रोंका अभ्युदय कीजिये ॥ ५४ ॥ इस प्रकार निवेदनकर देवाधिदेव गणेशजीको बारम्बार प्रणामकर व्रती एक सौ आठ आहुतियोंसे हवन करे॥ ५५॥ वायनदान—[तदनन्तर] व्रतकी सम्यक् रूपसे सम्पूर्णताके लिये इक्कीस मोदकों अथवा इक्कीस लड्डुओं या इक्कीस बड़ोंको इक्कीस फलोंके साथ लाल कपड़ेमें लपेटकर वायनके रूपमें अपने आचार्यको निवेदित करे ॥ ५६ १/२ ॥ वायनदान मन्त्र—वायनदानका मन्त्र इस प्रकार है—'सम्पूर्ण संकल्पोंमें सिद्धि प्रदान करनेवाले हे गणाधिपति! आपको नमस्कार है। इस वायनदानसे मेरे संकटोंका निवारण कीजिये।' तदनन्तर पुण्यमयी कथाका श्रवणकर समाहित चित्तवाला होकर अर्घ्य प्रदान करे ॥ ५७-५८ ॥ तिथ्यर्थदान—तिथियोंमें उत्तम हे देवि! गणेशजीकी हे प्रिय वल्लभा! [इस] अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये। हे देवि! आपको नमस्कार है ॥ ५९ ॥ ऐसा कहकर तिथ्यर्थ दे। देवार्थ अर्घ्यदान—हे मोदकप्रिय लम्बोदर गणेशजी! आपको निरन्तर नमस्कार है। हे देव! [इस] अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये, आपको नमस्कार है। हे गजानन! आपको नमस्कार है, हे गजकर्ण! हे महाबल! मेरे द्वारा प्रदत्त अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और संकटोंसे मुझे दूर कीजिये। हे गणराज! हे महाकाय! हे विघ्नराज! हे गजानन! हे सभी कार्योंमें अभीष्ट फल देनेवाले! अर्घ्य ग्रहण कीजिये। आपको नमस्कार है। हे प्रभो! हे देवेश! मेरे जो-जो संकट तथा विघ्न हों, उन सबका शीघ्र ही ध्वंस कीजिये और अर्घ्य ग्रहण कीजिये। आपको नमस्कार है ॥ ६०-६३॥ ऐसा कहकर भगवान् गणेशके लिये अर्घ्य दे। चन्द्रार्थ अर्घ्यदान—[देवराज इन्द्र राजा शूरसेनसे कहते हैं—] हे राजन्! इस मन्त्रसे चन्द्रमाको सात बार अर्घ्य दे— 'क्षीरसागर [-का मन्थन होने]-से प्रकट हुए, अत्रिगोत्रमें उत्पन्न हे चन्द्रदेव! मेरे द्वारा दिये गये अर्घ्यको रोहिणीसहित ग्रहण करें'॥ ६४ ॥ यह चन्द्रमाको अर्घ्य देनेका मन्त्र है। तदनन्तर भगवान्से क्षमा-याचना करे, उसके बाद ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर ब्राह्मणोंको अर्पित करनेके बाद जो शेष बचा हो, उसका स्वयं भोजन करे ॥ ६५ ॥ मौन रहते हुए यथाशक्ति, यथारुचि सात ग्रास भोजन करे। इस प्रकार चार महीनेतक विधानपूर्वक [संकष्टचतुर्थी] व्रत करे ॥ ६६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीव्रतविधिवर्णन' नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६९ ॥
सत्तरवाँ अध्याय
२१६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- सत्तरवाँ अध्याय संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमा राजा बोले—हे प्रभो! पूर्वकालमें इस व्रत (संकष्टचतुर्थीव्रत)-को किसने किया ? भूलोकमें इसका प्रचार किसने किया? इस व्रतका क्या पुण्य है? इसके करनेका क्या फल है? दया करके इसे मुझे बतलाइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे राजन्! पूर्वकालमें कार्तिकेय [घरसे] चले गये थे१ तो शिवजीके कहनेसे पार्वतीजीने चार मासतक इस व्रतको किया था ॥ २ ॥ [उसके फलस्वरूप] पाँचवें महीनेमें अपर्णा (पार्वतीजी)-को कार्तिकेय दृष्टिगोचर हुए। [इसी प्रकार] पूर्वकालमें अगस्त्यजीने समुद्रको पी लेनेकी इच्छासे तीन महीनेतक व्रत किया और विघ्नेश्वर गणेशजीके कृपाप्रसादसे वे उसे पी गये।२ हे राजेन्द्र! पूर्वकालमें नलकी खोज करती हुई दमयन्ती३ने [भी] छः मासतक उस व्रतको किया था, तब उन्हें नलका दर्शन हुआ था। हे राजन्! पूर्वकालमें प्रद्युम्नके पुत्र अनिरुद्धको चित्रलेखा हर ले गयी थी।४ तब 'मेरा पुत्र कहाँ है', 'कौन उसे ले गया'—इस प्रकार सोचते हुए पुत्रशोकसे दुखी एवं व्याकुल प्रद्युम्नसे रुक्मिणीने कहा— ॥ ३-६ ॥ रुक्मिणीजी बोलीं—हे पुत्र! सुनो, अब मैं वह घटना बतलाती हूँ, जो अपने [ही] भवनमें घटित हुई थी। पूर्वकालमें जब तुम छः दिनके बालक थे, तो शम्बरद्वारा तुम्हें हर लिया गया था५॥ ७ ॥ तुम्हारे वियोगजनित दुःखसे मेरा हृदय व्याकुल था। [सोचती थी कि] मैं अपने अद्वितीय और अत्यन्त सुन्दर पुत्रको कब देखूँगी ? ॥ ८ ॥ अन्य स्त्रियोंके पुत्रोंको देखकर मैं मन-ही-मन सोचती थी कि मेरा भी पुत्र इतना ही बड़ा होता ॥ ९ ॥ इस प्रकार चिन्तासे व्याकुल रहते हुए मुझे अनेक वर्ष बीत गये, तब दैवयोगसे लोमशमुनि मेरे पास आये। हे पुत्र! तब मैंने उनके द्वारा उपदिष्ट उत्तम संकष्ट- चतुर्थीव्रतका, जो सम्पूर्ण चिन्ताओंका हरण करनेवाला है, चार बार अनुष्ठान किया ॥ १०-११ ॥ उसके प्रभावसे शम्बरको रणमें मारकर तुम आ गये। [अतः] तुम भी इस व्रतको करो, तब तुम्हें अपने पुत्रके विषयमें ज्ञान हो जायगा ॥ १२ ॥ ब्रह्माजी बोले—भगवान् गणेशको प्रसन्न करनेवाले इस (संकष्टचतुर्थी) व्रतको पूर्वकालमें प्रद्युम्नने किया था। [तदनन्तर] उन्होंने नारदजीसे सुना कि अनिरुद्ध बाणासुरके नगर (शोणितपुर)-में है ॥ १३ ॥ [वहाँ] ईश्वर (शंकरजी)-के साथ होनेवाले संग्रामसे भयभीत कृष्णने उद्धवकी आज्ञासे उस उत्तम व्रतको विधिपूर्वक एक बार किया। हे नरेन्द्र! तभी वे शोणितपुर जाकर क्षणभरमें बाणासुरको रणमें जीतकर उषासहित अनिरुद्धको ले आये थे ॥ १४-१५ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! सृष्टि करनेकी इच्छासे मैंने भी इस व्रतको किया था और इसके प्रभावसे मैंने अनेक प्रकारकी सृष्टि की। अन्य देवताओं, असुरों, मनुष्यों, ऋषियों, दानवों, यक्षों, किन्नरों, नागों और राक्षसोंके द्वारा विघ्नोंकी शान्तिके लिये यह व्रत किया गया है ॥ १६-१७ ॥ [मनुष्य अपनी] आपत्तियों और कष्टोंकी शान्तिके लिये इस व्रतको करे। संसारमें इसके समान दूसरा कोई १. कार्तिकेयजीके घर छोड़कर चले जानेकी कथा शिवपुराणकी कोटिरुद्रसंहिताके अध्याय १५में सविस्तार प्राप्त होती है। २. कालेय नामक राक्षसगण समुद्रमें रहते थे, इसलिये देवगण उनका वध करनेमें समर्थ नहीं हो पा रहे थे। देवताओंकी प्रार्थनापर महर्षि अगस्त्यने समुद्रके सम्पूर्ण जलका पान कर लिया, जिससे देवगण अत्याचारी कालेय राक्षसोंका वध कर सके। यह कथा महाभारत वनपर्वके अध्याय १०४-१०५ में प्राप्त होती है। ३. नल-दमयन्तीका आख्यान महाभारतके वनपर्वमें अध्याय ५३ से अध्याय ६९ तक विस्तारसे प्राप्त होता है। ४. चित्रलेखाद्वारा अनिरुद्धको हर ले जानेकी कथा श्रीमद्भागवतमहापुराणके दशम स्कन्धके ६२वें अध्यायमें प्राप्त होती है। ५. शम्बरद्वारा प्रद्युम्नके हरणकी कथा श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धके ५५वें अध्यायमें प्राप्त होती है।
कुछ भी नहीं है। हे राजन् ! इस व्रतकी कथा सुनकर
उ०ख०-अ०७१ ] * संकष्टचतुर्थी व्रतके उद्यापनकी विधि * २१७ सर्वसिद्धिकर व्रत, तप, दान, जप, तीर्थ, मन्त्र और विद्या कुछ भी नहीं है। हे राजन् ! इस व्रतकी कथा सुनकर स्वयं वाणीपर संयम रखते हुए भोजन करे ॥ १८-१९ ॥ [उस समय] हाथको घुटनेके अन्दर रखे और हृदयमें गणेशजीका चिन्तन करे। ब्राह्मणोंको भोजन करानेके पश्चात् जो शेष रहे, उसका बन्धु-बान्धवोंके साथ भोजन करना चाहिये ॥ २० ॥ [इस व्रतको करनेसे] बहुत बड़ा कार्य भी थोड़े ही महीनों (अल्पकाल) - में सिद्ध हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है। बहुत क्या कहा जाय, अन्य कोई भी साधन इससे शीघ्र सिद्धि देनेवाला नहीं है ॥ २१ ॥ इसका उपदेश अभक्त, नास्तिक तथा दुष्ट व्यक्तिको न दे। इसका उपदेश केवल पुत्र, शिष्य और भक्तियुक्त सज्जन व्यक्तिको ही दे ॥ २२ ॥ हे राजेन्द्र ! तुम मेरे प्रिय हो, धर्मात्मा हो और क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ हो, प्रजाजनोंका उपकार करनेवाले हो, इसीलिये मैंने तुम्हें इस व्रतका उपदेश दिया है ॥ २३ ॥ इसलिये सभी व्रतोंमें श्रेष्ठतम इसी व्रतको तुम्हें करना चाहिये। इससे तुम्हारे समस्त कार्योंकी सिद्धि होगी, मेरा वचन अन्यथा नहीं है। जब-जब कोई स्त्री या पुरुष यह देखे कि उसके सामने कोई कठिन कार्य उपस्थित है, तो वह इस श्रेष्ठ व्रतको करे; इससे मनोऽभिलषित कार्य सिद्ध हो जाते हैं। भला, विघ्नेश्वर गणेशजीके प्रसन्न होनेसे क्या दुर्लभ है ! ॥ २४-२५ ॥ सूतजी बोले - [ हे ऋषियो !] उस नृपश्रेष्ठने यह सब सुनकर सम्पूर्ण दुःखोंकी शान्तिके लिये इस व्रतको किया। व्रतके प्रभावसे उसने वैरियोंको जीतकर पुत्रोंसहित निष्कंटक राज्यका भोग किया ॥ २६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीव्रतमाहात्म्यवर्णन' नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥ इकहत्तरवाँ अध्याय संकष्टचतुर्थी व्रतके उद्यापनकी विधि, संकष्टचतुर्थीव्रतके अनुष्ठानसे राजा कृतवीर्यको पुत्रप्राप्ति राजा बोले - हे महाप्राज्ञ [ब्रह्माजी] ! इस (संकष्ट चतुर्थी) - व्रतका उद्यापन कैसे करना चाहिये ? संसारके हितकी कामनासे उसे मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे नरेन्द्र ! व्रतकी सम्पूर्णताके लिये प्रथम, पंचम अथवा सप्तम मासमें उद्यापन करना चाहिये ॥ २ ॥ भक्तिमान् मनुष्य पूर्वमें बतलाये गये विधानके अनुसार [ गणेशजीका] पूजन करे। पुष्पमण्डपिकाका निर्माणकर उसे अनेक प्रकारके रंग-बिरंगे वस्त्रोंसे सुसज्जित करे। उसमें अनेक प्रकारके रंगोंसे सर्वतोभद्र मण्डलकी रचना करके पूर्वकी भाँति वहाँ कलशके ऊपर देवेश्वर गणेशजी [-की प्रतिष्ठाकर उन]-का पूजन करे ॥ ३-४ ॥ [तदनन्तर] सावधानचित्त होकर सुगन्धित चन्दन, अनेक प्रकारके पुष्पों और नारिकेल फलसे [निम्न मन्त्रसे] अर्घ्यदान करे। तिथियोंमें उत्तम हे देवि ! हे गणेशजीकी प्रिय वल्लभा ! [इस] अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये। हे देवि ! आपको नमस्कार है ॥ ५-६ ॥ [तदनन्तर गणेशजीको निम्न मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करे-] हे मोदकप्रिय लम्बोदर गणेशजी ! आपको निरन्तर नमस्कार है। हे देव ! [इस] अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये, आपको नमस्कार है ॥ ७ ॥ [तत्पश्चात् निम्न मन्त्रसे चन्द्रदेवको अर्घ्य दे-] 'क्षीरसागर [-का मन्थन होने]-से प्रकट हुए, अत्रिगोत्रमें उत्पन्न हे चन्द्रदेव ! मेरे द्वारा दिये गये अर्घ्यको रोहिणीसहित ग्रहण करें ॥ ८ ॥ तदनन्तर गणेशजीको भोज्य, भक्ष्य, लेह्य (चाटकर खाये जानेवाले पदार्थ, यथा चटनी आदि), पेय तथा
२१८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- चोष्य (चूसकर खाये जानेवाले) पदार्थ निवेदित करे। अन्य अनेक प्रकारके बहुत-से फलोंसे भी गणनायक गणेशजीको प्रसन्न करे॥ ९॥ उसके बाद आचार्य और इक्कीस ऋत्विजोंका वहाँ वरण करे और 'गणानां त्वा०' इस मन्त्रसे अथवा मूल मन्त्रसे दस हजार, एक हजार अथवा उसकी आधी (पाँच सौ) या एक सौ आठ आहुतियोंसे हवन करे; तदनन्तर बलि प्रदान करे॥ १०-११॥ तदनन्तर पूर्णाहुति हवन करके [हवनकी अग्निमें] वसोर्धारा गिराये। हवनके शेष कृत्योंका सम्पादन करके उसके बाद ब्राह्मणोंको भोजन कराये॥ १२॥ तत्पश्चात् उन ब्राह्मणोंको यथाशक्ति वस्त्रयुगल (धोती-उत्तरीय), कलश और आसनसहित दक्षिणा प्रदान करे। इस कार्यमें वित्तशाठ्य (कंजूसी) न करे॥ १३॥ तत्पश्चात् वस्त्रों एवं अलंकरणों आदिसे आचार्यका पूजन करे। उनके भोजन कर लेनेके उपरान्त उन्हें फलसहित वायन प्रदान करे। वायनसे पूर्णतया भरे हुए सूपको लाल वस्त्रसे लपेटकर गणेशजीकी सुवर्ण प्रतिमाको दक्षिणासहित उन्हें (आचार्यको) प्रदान करे॥ १४-१५॥ तदुपरान्त व्रतकी सम्पूर्तिके लिये एक आढक (६४ मुट्ठी) तिल तथा सम्यक् रूपसे विभूषित सवत्सा कपिला गौ भी उन्हें प्रदान करे॥ १६॥ तदनन्तर ब्राह्मणोंसे क्षमा-याचनाकर 'अनेन पूजनेन भगवान् विघ्नेशः प्रीयताम्' (इस पूजनसे भगवान् गणेश प्रसन्न हों)-ऐसा कहे। इस प्रकारसे इस व्रतका उद्यापन करके (मनुष्य) अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है॥ १७॥ [कृतवीर्यके] पिता बोले-[हे पुत्र!] इस प्रकारसे ब्रह्माजीने लोकोपकारके लिये मुझे जिस व्रतका उपदेश दिया था, उसे ही मैंने इस समय तुम्हें बतलाया है। पुत्रकी प्राप्तिके लिये तुम इसे आदरपूर्वक करो॥ १८॥ इन्द्र बोले-[हे राजा शूरसेन!] जिस प्रकारसे इस महान् व्रतको करनेका पिताने उपदेश दिया था, बुद्धिमान् कृतवीर्यने वैसे ही उसे किया॥ १९॥ पण्डितोंने उस उत्तम व्रतका भलीभाँति व्याख्यान करके प्रतिपादन किया। [उस व्रताराधनके अवसरपर] स्वर्णनिर्मित तथा सिद्धि एवं बुद्धिसे युक्त गणपति- मूर्तिको महामण्डपिकाके मध्य स्थलमें स्थापित करके ब्राह्मणोंके द्वारा कहीं पुराणोंका पाठ किया जाता था, कहीं शास्त्रोंकी मीमांसा हो रही थी, कहीं नृत्य-गान हो रहा था। विविध प्रकारके वाद्योंकी ध्वनियाँ निकलकर आकाशको व्याप्त कर रहीं थीं। कहीं शास्त्रीय तात्पर्य- निर्णय लोगोंके द्वारा किया जा रहा था, जिसमें कुछ लोग निर्णायक बने थे॥ २०-२२॥ उस महाबुद्धिमान् राजा (कृतवीर्य)-ने [गणपतिके] श्रेष्ठ मन्त्रका जप किया। जप करनेके पश्चात् हवन तथा पूजन करके बहुत-से ब्राह्मणोंको भोजन भी करवाया और उन्हें [वस्त्राभूषणोंसे] अलंकृत करके अलंकारोंसे युक्त गायें भी प्रदान कीं। उसने दीन, अन्धे तथा दुखी जनोंको भोजन और उनको अनेक प्रकारके दान भी दिये॥ २३-२४॥ [भोजनादिसे] सन्तुष्ट हुए उन सभी जनोंसे उस राजाने पुत्र-प्राप्तिका आशीर्वाद ग्रहण किया। उन तपोनिष्ठ तथा सर्वदा सत्य-भाषण करनेवाले द्विजोंके आशीर्वादसे थोड़े ही समयमें रानी गर्भवती हो गयी और उसने मंगलमय मुहूर्तमें [श्रेष्ठ] लक्षणोंवाले पुत्रको जन्म दिया॥ २५-२६॥ पुत्रजन्मसे अत्यन्त हर्षित उस राजाने अनेकविध दान दिये और यथावसर उसका यज्ञोपवीत तथा विवाह भी सम्पन्न किया। ज्ञान-विज्ञानसे समन्वित उस पुत्रका राज्याभिषेक करके वह श्रेष्ठ पुत्रवाला तथा नानाविध भोगोंसे सम्पन्न राजा अन्तमें भगवान् गणेशजीके परम पदको प्राप्त हुआ॥ २७-२८॥ उस राजाके पुण्यसे वे सभी ऋत्विज्, पण्डित तथा सभी दर्शक भी उसीके साथ भगवान् गणपतिके परम धामको प्राप्त हुए॥ २९॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीव्रतोद्यापन-विधि-वर्णन' नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७१॥
बहत्तरवाँ अध्याय
उ०ख०-अ०७२ ] * कृतवीर्यकी पत्नीका अंगहीन पुत्रको जन्म देना * २१९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बहत्तरवाँ अध्याय कृतवीर्यकी पत्नीका अंगहीन पुत्रको जन्म देना, दत्तात्रेयजीका आना और कृतवीर्यपुत्रको गणेशजीके एकाक्षरमन्त्रका उपदेश देना, कृतवीर्यका पुत्रको गणपति-आराधनाके लिये वनमें भेजना
शूरसेन बोले - हे शतयज्ञकर्ता इन्द्र! व्रतकी संपूर्ति होनेपर राजा और रानीको किस प्रकारके पुत्रकी प्राप्ति हुई? हे विभो! मुझ पूछनेवालेको यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये ॥ १ ॥
इन्द्र बोले- हे राजन्! गजानन गणेशजीके प्रसन्न होनेपर क्या-क्या नहीं हो सकता? उनकी कृपासे राजा कृतवीर्यकी उस रानीने गर्भधारण किया ॥ २॥
नवम मासमें जन्म होनेपर रानीने अपने उस मंगलमय पुत्रका दर्शन किया। उसके दो कन्धे और सुन्दर मुख था, परंतु उसके भुजाएँ और हाथ नहीं थे। इसी प्रकार उसके कमल-जैसे सुन्दर नेत्र और सुन्दर नासिका थी, परंतु उसके घुटने और जंघाएँ नहीं थीं। उसे [हाथ,] जंघा और पैरोंसे रहित देखकर माता रोते हुए बोली ॥ ३-४॥
वह (रानी) बोली - हे गजानन! मुझ अभागिनको इस प्रकारका बालक क्यों हुआ? आपने मुझे हाथ- पैररहित शिशु क्यों दिया ? ॥ ५ ॥
इससे तो मेरा वन्ध्या होना ही अच्छा था। इस प्रकारके पुत्रसे पुत्रवती होनेका क्या लाभ! मेरे पूर्वजन्ममें किये गये पापोंका नाश क्यों नहीं हुआ ? ॥ ६ ॥
हे गजानन! आपकी कृपा क्यों फलीभूत नहीं हुई ? ब्राह्मणोंके [आशीर्वादात्मक] वचन मेरे लिये इस प्रकारसे निष्फल क्यों हो गये? [इस प्रकार विलाप करती हुई वह] अपने दोनों हाथोंसे अपने वक्षःस्थल और मस्तकको बार-बार पीट रही थी। उसके रुदनके कारण वहाँ जितनी भी स्त्रियाँ विद्यमान थीं, सब रोने लगीं ॥ ७-८॥
उन सबका कोलाहल सुनकर राजा भी वहाँ आ गये। उनका भी रुदन सुनकर [राजाके] प्रमुख मन्त्रीगण भी वहाँ गये। तदनन्तर उन सबका भी रुदन सुनकर नगरके लोग भी वहाँ आकर रोने लगे ॥ ९१/२ ॥
राजा बोले - हे गजानन ! हे देव! दीनोंपर आपकी यह कैसी कृपा है! [इस प्रकारका हाथ-पैरसे रहित पुत्र देकर] आपने आज किस प्रकारकी मुझपर दया प्रदर्शित की है? हे निष्पाप ! आप स्मरणमात्रसे कैसे पापोंका हरण करते हैं? मेरा तो जप, तप, स्मरण, दान, पूजन, द्विजतर्पण, अनुष्ठान तथा हवन सब व्यर्थ हो गया ॥ १०-१२ ॥
इसलिये दैव ही बलवान् होता है, प्रयत्न निरर्थक है। कर्मकी गति जानी नहीं जाती कि वह कब या क्या होगी ! जैसे पहाड़ खोदनेसे चूहा प्राप्त हो, वैसे ही मेरे द्वारा जीवनभर किये गये प्रयत्नके फलके रूपमें यह पुत्र हुआ है। तब उन शोकाकुल राजा कृतवीर्यसे मन्त्रियोंने इस प्रकार कहा - ॥ १३-१४१/२ ॥
मन्त्रिप्रमुखोंने कहा- हे राजन् ! शोक न करो, भावी अन्यथा कैसे हो सकती है? राम क्या मृगके विषयमें नहीं जानते थे [कि वह सोनेका नहीं होता], फिर भी वे उसके पीछे गये। क्या धर्मराज युधिष्ठिरको 'द्यूतक्रीड़ा निषिद्ध है' ऐसा ज्ञान नहीं था, फिर भी वे द्यूतक्रीड़ाके लिये गये और सब कुछ गवाँकर वनको गये। अतः आपके इस दारुण क्रन्दनसे भी इस बालकको सर्वांगसुन्दरता नहीं प्राप्त होगी ॥ १५-१७॥
यदि इसका अदृष्ट ठीक होगा तो यह आगे सुन्दर हो जायगा। जिस प्रकारसे समय आनेपर वृक्ष पुष्पित और फलयुक्त हो जाते हैं, वैसे ही समय आनेपर यह भी सम्यक् रूपसे सुन्दर और पृथ्वीका स्वामी होगा ॥ १८१/२॥
इन्द्र बोले - मन्त्रिगणोंके इस प्रकारके वचन सुनकर राजा सावधान हो गये और उस [शोकाकुल] रानीसे कहा - 'उठो-उठो, अब तुम शोक न करो' और स्वयं स्वस्थचित्त होकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बुलवाकर गणेशपूजन और स्वस्तिवाचन कराया। तदनन्तर आभ्युदयिक श्राद्ध करके माला, अलंकार, वस्त्र, गाय और बहुत-से रत्न आदि अनेक प्रकारके दान दिये। उन्होंने अपने मित्रों, सम्बन्धियों, सेवकों, अनेक प्रकारके वाद्योंके वादनसे जीविका चलानेवालों, वन्दीजनों, चारणों,
२२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दीनों, अन्धों और असहायोंको भी उनके यथायोग्य वस्त्रों आदिका दान किया॥ १९-२३॥ उसने [नगरके] प्रत्येक घरमें ताम्बूल तथा शर्करा भिजवायी तथा ग्यारहवें दिन उस शिशुका 'कार्तवीर्य' नाम रखा। [इस अवसरपर] राजाने महान् उत्साहपूर्वक [सम्पूर्ण] नगरको भोजन कराया। इसके अनन्तर उस पुत्रका बारह वर्षका समय बीत गया, तो राजा कृतवीर्यके भवनमें दत्तात्रेयजी स्वेच्छासे आये। कृतवीर्यने उनके चरणोंमें अपना सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया॥ २४-२६॥ [तब] उन मुनिने [चरणोंमें पड़े हुए] उस श्रेष्ठ राजाको उठाकर उसका आलिंगन किया। [राजाने भी उन मुनिको] एक सुन्दर आसनपर बिठाकर उनका आदरपूर्वक पूजन किया॥ २७॥ राजाने उन्हें आसन, पाद्य, अर्घ्य, गाय, वस्त्र, उपवीत, धूप, दीप, नैवेद्य, अनेक प्रकारके फल, उद्वर्तन (उबटन) तथा रत्न और सुवर्णकी दक्षिणा दी। पादसंवाहन आदिसे परम प्रसन्न और सुखपूर्वक विराजमान महामुनि दत्तात्रेयसे राजा कृतवीर्यने कहा- 'हे मुने ! आज मेरे जन्म-जन्मान्तरके पुण्यकर्म फलित हो गये, जो मैं अपने चर्म-चक्षुओंसे आपका साक्षात् दर्शन कर रहा हूँ। हे सुव्रत ! आपके कृपा-प्रसादसे मेरा भविष्य और अधिक मंगलमय होगा; क्योंकि आप-जैसे महापुरुषोंका दर्शन पापकर्मियोंको नहीं होता' ॥ २८-३११/२॥ कृतवीर्यके वचन सुनकर दत्तात्रेयने उनसे कहा- '[हे राजन् !] मैं आपके अद्भुत पुत्रको देखनेकी इच्छासे यहाँ आया हूँ।' [मुनिके आगमनसे] हर्षित राजाने तब [अपने पुत्रकी दुरवस्थासे खिन्न होकर] उन मुनिसे पुनः कहा- ॥ ३२-३३॥ राजा बोले- [हे मुने !] मेरे द्वारा देवाराधन- सम्बन्धी किये गये अनुष्ठान, तप, दान और व्रत आदि सब व्यर्थ गये। जगदीश्वरने यह जो पुत्र मुझे दिया है, वह मेरे लिये हृदयमें काँटेके समान हो गया है। उसके अदर्शनीय होनेसे मैं भी अदर्शनीय हो गया हूँ॥ ३४१/२॥ इन्द्र बोले- [हे राजन् !] तदनन्तर राजा कृतवीर्यने उस बालकको लाकर मुनि दत्तात्रेयको दिखाया ॥ ३५ ॥ उन श्रेष्ठ मुनिने उस राजपुत्रको देखकर अपने कमलसदृश नेत्रोंको बन्द कर लिया और ध्यानके द्वारा राजाके कर्मको जानकर पुनः उनसे बोले- '[हे राजन्!] तुम्हारा यह पुत्र समस्त राजाओंको जीतकर [चक्रवर्ती होकर] राज्य करेगा। तुमने संकष्टचतुर्थीव्रतके जागरणमें जँभाई लेनेके बाद आचमन नहीं किया, इससे सम्पूर्ण संकटोंका नाश करनेवाले व्रतराजका अपमान हुआ। इसीलिये यह पुत्र अंगहीन हुआ है, उपाय करनेसे यह सर्वांगपूर्ण हो जायगा ॥ ३६-३८ ॥ राजा बोले- हे स्वामिन् ! आपने सत्य कहा है। अब आप कृपा करके मुझसे उस उपायको कहिये, जिससे मेरा पुत्र आपकी कृपासे सर्वांगपूर्ण हो जाय ॥ ३९ ॥ इन्द्र बोले-तब उन मुनिने दया करके उसके पुत्रको अंगोंसहित [गणेशजीके] एकाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया और उससे पुनः कहा कि इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक गणेशजीकी आराधना करो। हे सुव्रत ! तुम उपवास और एकभुक्ति (दिन-रात्रिके बीच मध्याह्नके बाद केवल एकबार भोजन करना)-के नियमोंका पालन करो ॥ ४०-४१ ॥ बारह वर्षतक इस प्रकार आराधन करनेपर वे तुम्हें दर्शन देंगे; उनके दृष्टिपातमात्रसे तुम दिव्य देहवाले हो जाओगे। ऐसा कहकर और राजासे अनुमति लेकर वे मुनिश्रेष्ठ अन्तर्धान हो गये। तब मुनिके चले जानेपर पैरोंसे रहित उस महामनस्वी पुत्रने [अपने पिता] कृतवीर्यसे कहा कि मुझे गहन वनमें पहुँचा दीजिए। गणेशजीकी कृपाप्राप्तिहेतु मैं अनुष्ठान करूँगा ॥ ४२-४४॥ उसके माता-पिता उसके वचनोंको सुनकर रुदन करने लगे। तदनन्तर पिता (राजा कृतवीर्य)-ने एक सुन्दर पालकीद्वारा उसे वनको भेज दिया ॥ ४५ ॥ राजाके सेवकगण उसे पर्णकुटीमें बैठाकर वापस नगरको लौट आये। उस राजपुत्रने भी वहीं रहकर तपस्या करनेका निर्णय किया ॥ ४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कृतवीर्यको पुत्रकी प्राप्तिका वर्णन' नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥
तिहत्तरवाँ अध्याय
उ०ख०-अ०७३ ] * गणेशजीकी आराधनासे कार्तवीर्यको दिव्य देह और सहस्त्र भुजाओंकी प्राप्ति * २२१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिहत्तरवाँ अध्याय गणेशजीकी आराधनाके प्रभावसे कार्तवीर्यको दिव्य देह और सहस्त्र भुजाओंकी प्राप्ति इन्द्र बोले—वह राजपुत्र भगवान् गजाननका ध्यान | उसपर देवताओं तथा देवर्षियोंने भी पुष्पवर्षा की ॥ १२ ॥ करते हुए उनके प्रति दृढ़ निष्ठा रखकर गुरु (दत्तात्रेयजी)- | उन्होंने उसकी और देवाधिदेव गणेशजीकी गीत द्वारा उपदिष्ट मन्त्रका नियमपूर्वक जप करने लगा। | और वाद्यध्वनिसे स्तुति की। तदनन्तर सहस्र भुजाओंसे वायुमात्रका भक्षणकर निराहार रहते हुए वह पाषाण- | युक्त उस कार्तवीर्यने गर्जना की। उसके मेघ-गर्जनके खण्डसदृश [निश्चल] प्रतीत होता था। इस प्रकार तपस्या | समान शब्दको सुनकर समवर्ती यमराज$^१$ भी अत्यन्त करते हुए उसके बारह वर्ष व्यतीत हो गये। हस्तपादरहित | त्रस्त हो गये तो दूसरोंकी गिनती ही कहाँ? ॥ १३-१४ ॥ उस महामनस्वी बालकके स्थिर स्वरूपको देखकर बारह | पृथ्वीके समस्त राजागण उसके भयसे काँपते थे वर्षके पश्चात् गणेशजी सरोवरके मध्यभागमें मूँगेकी | कि युद्धमें यह [अपने एक हजार हाथोंसे] एक साथ मूर्तिके रूपमें प्रकट हुए और उसकी भक्तिनिष्ठासे अत्यन्त | पाँच सौ बाण छोड़ेगा। तब ब्रह्मा आदि देवता अपने- सन्तुष्ट हो उसके सम्मुख जाकर बोले— ॥ १-४ ॥ | अपने विमानोंसे उतरकर उसके पास आये और बोले— गणेशजी बोले—इस निर्जन वनमें; जो कि सिंहों | 'तुम्हारा स्मरण करनेपर देवताओंकी भी खोयी या नष्ट और व्याघ्रोंसे युक्त और बहुत-से लता-पुष्पोंसे समन्वित | हुई वस्तु प्राप्त हो जायगी' ॥ १५-१६ ॥ है, उसमें तुमने बारह वर्षोंतक रहकर तपस्या की है, | तुम सभी लोगोंके हृदयमें स्थित मानसिक व्यथाको इससे मैं तुम्हें वर दूँगा, जो अभिलाषा तुम्हारे मनमें हो, वह | नष्ट करोगे; क्योंकि 'सहस्रार्जुन' नामवाले साक्षात् माँगो। उनकी वाणीको सुनकर वह कृतवीर्यपुत्र देहभावनाममें | विष्णुरूप हो। तुम कल्पपर्यन्त तीनों लोकोंमें विख्यात स्थित हो, भगवान् गजाननको प्रणामकर विमानोंमें स्थित | रहोगे। तुम शरणागतोंका पालन करनेवाले और सज्जनोंकी सभी मुनियोंके सुनते हुए बोला— ॥ ५-७ ॥ | रक्षामें संलग्न रहोगे ॥ १७-१८ ॥ [राज-] पुत्र बोला—हे देव! मेरी निश्चल | तुम सम्पूर्ण शत्रुओंपर विजय पानेवाले और भूमण्डलके भक्ति आपके युगलचरणोंमें बनी रहे, इसके अतिरिक्त | अधिपति होगे—इस प्रकार अनेक वर देकर देवगण अन्य वर माँगनेकी मेरी इच्छा नहीं है। तथापि हे देवेश! | अन्तर्धान हो गये। सम्पूर्ण राजाओंने उसे हाथी, घोड़े, मैं अपने माता-पिताके सन्तोषके लिये सभी जनोंको | पालकियाँ, छत्र, चामर, मशालें, रथ और अन्यान्य आह्लादित करनेवाली शारीरिक सुन्दरताकी याचना करता | उपहार प्रदान किये ॥ १९-२० ॥ हूँ, उसे प्रदान करें ॥ ८-९ ॥ | तदनन्तर उस [राजा कार्तवीर्य]-ने एक भव्य इन्द्र बोले—उस राजपुत्रके वचनको सुनकर उन | मन्दिरका निर्माण करवाकर उसके मध्यमें गणेशजीकी मायापति गजाननने अणिमा [सिद्धि]-का आश्रय लेकर | मूँगेकी मूर्तिकी ब्राह्मणोंद्वारा प्रतिष्ठा करवायी। ब्राह्मणोंने प्रयत्नपूर्वक उसके उदरमें प्रवेश किया। हे राजन् ! उनके | उसका 'प्रवालगणपति' नाम रखा। [राजा ] उस स्थापित प्रविष्ट होनेपर वह पुत्र दिव्य देहवाला हो गया। तदनन्तर | मूर्तिके पूजनके लिये नियुक्त ब्राह्मणोंको ग्राम दानमें दिये। वह कृतवीर्यपुत्र सहस्र भुजाओंवाला हो गया ॥ १०-११ ॥ | तबसे वह सिद्धिप्रद क्षेत्र पृथ्वीपर 'प्रवालक्षेत्र'$^२$ नामसे वह दो पैरोंसे युक्त सीधा पर्वतकी भाँति स्थित था। | विख्यात हुआ। पृथ्वीका धारण करनेकी क्षमता प्राप्त करनेके
१-प्रत्येक प्राणीके साथ उसके कर्मके अनुसार बिना भेदभाव किये समान व्यवहार करनेके कारण यमराजको समवर्ती कहा जाता है। २-मुम्बई-भुसावल रेलवे लाइनपर पाचोरा जंक्शनसे २४ किमी० की दूरीपर महसावन्द रेलवे स्टेशन है, वहाँसे लगभग ८ किमी० दूर प्राचीन प्रवाल-क्षेत्र है, जिसे वर्तमानमें पद्मालयतीर्थ कहा जाता है। यहाँ कार्तवीर्य (सहस्रार्जुन) और शेषजीद्वारा स्थापित दो गणपतिमूर्तियाँ हैं। मन्दिरके सामने ही 'उगम' सरोवर है।
२२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
लिये शेषनागने [भी पूर्वकालमें] वहाँ अनुष्ठान किया था॥ २१-२३॥ उस अनुष्ठानके फलस्वरूप उन्होंने गणेशजीसे पृथ्वीको धारण करनेकी सामर्थ्य, सर्वज्ञता, सहस्र सिर और नौ नागकुलोंमें श्रेष्ठता आदि बहुत-से वरदान प्राप्त किये। चूँकि प्राचीन कालमें अत्यन्त प्रसन्न मनसे उन्होंने इसे स्थापित किया था, इसलिये 'धरणीधर' — यह इसका दूसरा नाम प्रसिद्ध हो गया, जो सुनने और स्मरण करनेसे भी समस्त कामनाओंको फलीभूत करनेवाला है॥ २४-२६॥ सहस्रबाहु सम्पूर्ण श्रेष्ठ द्विजोंका पूजनकर और राजाओंसे पूछकर माता-पिताको देखने अपने नगरको गया। उसे इस प्रकारका (सर्वांगपूर्ण, सुन्दर और सहस्रभुज) देखकर माता-पिता तथा नगरनिवासी अत्यन्त हर्षित हुए और उन्होंने सभी श्रेष्ठ द्विजोंको अनेक प्रकारके दान दिये ॥ २७-२८॥ इन्द्र बोले— [हे राजन्!] मैंने तुमसे संकष्टचतुर्थी [व्रत]-की अद्भुत महिमाका वर्णन किया, यह शुभ व्रत मृत्युलोकमें राजा कृतवीर्यद्वारा प्रचलित हुआ ॥ २९ ॥ देवगणों और चन्द्रसेन आदि राजाओंने भी इस
[दायाँ स्तम्भ]
व्रतकी महिमाका अनुभव किया। यह व्रत अत्यन्त पुण्य प्रदान करनेवाला और स्मरणमात्रसे भी सिद्धि देनेवाला है। इसी व्रतके प्रभावसे रावणने सर्वज्ञता प्राप्त कर ली थी। पाण्डवोंने [पूर्वकालमें] इसी व्रतके प्रभावसे पुनः राज्य प्राप्त किया था ॥ ३०-३१॥ [हे शूरसेन!] इस व्रतके अनुष्ठानका जो पुण्य है, वह यदि मेरे हाथमें दिया जाय, तभी यह विमान अमरावतीके लिये प्रस्थान कर सकेगा ॥ ३२ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यास !] शतयज्ञकर्ता इन्द्रके मुखसे इस संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमा सुनकर राजा शूरसेन स्वात्मानन्दरूपी महासागरमें अवगाहन करने लगे, तदनन्तर प्रसन्न मनवाले उन नृपश्रेष्ठ शूरसेनने [देवराज] इन्द्रके चरणकमलोंकी वन्दनाकर कहा— ॥ ३३-३४१/२ ॥ वे [राजा शूरसेन] बोले—मेरे किसी पूर्वजन्मका पुण्य उदय हुआ है, जिसके फलस्वरूप मैंने इस प्रकारके [पुण्यप्रदायक] व्रतके विषयमें सुना। तीनों लोकोंमें इससे अधिक पुण्य देनेवाला कोई कर्म नहीं है ॥ ३५१/२ ॥ [ब्रह्माजी बोले]—इन्द्रसे ऐसा कहकर वे राजा शूरसेन तबसे स्वयं व्रत करने लगे ॥ ३६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'चतुर्थीव्रतमाहात्म्य' नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७३ ॥
चौहत्तरवाँ अध्याय संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके सन्दर्भमें एक गलत्कुष्ठा चाण्डालीकी कथा
[बायाँ स्तम्भ]
व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन् ! उन राजा शूरसेनने आदरपूर्वक इन्द्रके मुखसे इतिहाससहित संकष्टचतुर्थी व्रतको सुनकर उस उत्तम व्रतको कैसे किया था ? ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यास !] तब उस राजा शूरसेनने अपने दूतोंको यह कहा कि नगरमें जाओ और किसी संकष्टचतुर्थी व्रत करनेवालेको ले आओ ॥ २ ॥ [राजाके ऐसा कहनेपर] वे दूत शीघ्रतापूर्वक नगरमें गये और घर-घर जाकर पूछने लगे। [इस प्रकार] इधर-उधर भ्रमण करते हुए उन्होंने एक सुन्दर मंगलमय विमानको देखा, जिसमें एक दुष्ट चाण्डाली बैठने जा रही थी। उसके अंग कुष्ठसे गल गये थे।
[दायाँ स्तम्भ]
उसके मुखसे [कफ और लारका] स्राव हो रहा था। उसका शरीर दुर्गन्धयुक्त और मक्खियों एवं कीड़ोंसे भरा था। उसका उदर शुष्क, बाल बड़े और दाँत, आँख एवं नासिका [भी] शुष्क थे। वह अत्यन्त मलिन और बड़े- बड़े कर्णछिद्रोंवाली थी। उसका स्वर ऐसा था, मानो बादल गरज रहे हों ॥ ३-५ ॥ ऐसे स्वरूपवाली उस भक्त चाण्डालिनीको ले जानेके लिये आये हुए गणेशदूतोंको देखकर राजदूत उन्हें प्रणामकर कहने लगे कि 'यह तो बड़ा ही आश्चर्यजनक है' ॥ ६ ॥ राजाके दूतोंने देवदेव गणेशजीके सेवकोंसे कहा—
उ०ख०-अ०७४] * संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके सन्दर्भमें एक गलत्कुष्ठा चाण्डालीकी कथा * २२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 यह अत्यन्त निन्दित और हीन जातिकी होकर भी कैसे स्वर्ग जा रही है? हे दूतो! यह पूर्वकालमें कौन थी? इस प्रकारकी यह कैसे हो गयी? किस पुण्यके फलस्वरूप यह आप लोगोंके द्वारा स्वर्ग ले जायी जा रही है? यदि यह सब बताना सम्भव हो, तो हमें बतलायें॥ ७-८ १/२॥ देवदूत बोले-बंगाल प्रान्तमें सारंगधर नामके एक क्षत्रिय थे, उनकी सुन्दरा नामकी सुन्दर कन्या थी। वह कोयलके समान मधुर स्वरवाली, चन्द्रमाके सदृश सुन्दर मुखवाली और अपने सौन्दर्यसे रतिकी सुन्दरताको भी जीत लेनेवाली थी। प्रसिद्ध अष्ट नायिकाएँ इसकी दासी बननेके भी योग्य नहीं थीं। वह अपनी तिर्यक् दृष्टिसे योगियोंके भी चित्तको विमोहित कर देती थी॥ ९-११॥ उसके रूप-सौन्दर्यके दर्शनमात्रसे कुछ तरुणोंके तेजकी हानि हो जाती थी। विश्वको मोह लेनेवाली वह [सुन्दरा] व्यभिचारमार्गमें प्रवृत्त हो गयी॥ १२॥ महामूल्यवान् वस्त्रों और अलंकारोंसे अलंकृत रहनेवाली और अनेक प्रकारके विषयोंका भोग करनेवाली वह निर्लज्जा बंगाल नगरमें वेश्याकी भाँति चर्चित हो गयी थी। पिताने असंख्य द्रव्य व्यय करके जिससे उसका विवाह किया था, 'चित्र' नामवाले पतिकी वह सदैव वंचना करती रहती थी॥ १३-१४॥ किसी समय शयन करते हुए उसे छोड़कर वह अर्धरात्रिमें सुन्दर वेष धारणकर जाने लगी तो उसने क्रुद्ध हो हाथसे उसे पकड़ लिया॥ १५॥ तदनन्तर चित्र नामवाले उस पतिने उसे डाँटते हुए कहा-'अरी पापाचारिणी! तुझे धिक्कार है, जो तू निरन्तर परपुरुषमें ही आसक्त रहती है'॥ १६॥ तब उसके इस प्रकारके वचनको सुनकर उस समय तो उसने [अपने] क्रोधको शान्त कर लिया, परंतु अभक्ष्य- भक्षणके कारण वह अत्यन्त कामोन्मत्त हो उठी थी। अतः जब अन्धकार घना हो गया तो उस बलशालिनीने अपने दाहिने हाथमें एक छुरी ली और उससे अपने चित्र नामवाले पतिका उदर-विदारणकर चहेते जार पुरुषके पास रमण करनेके लिये चली गयी॥ १७-१८ १/२॥ जबतक वह वहाँ रमण कर रही थी, उसी समय उसके पड़ोसमें रहनेवाले व्यक्तिने, जो जग रहा था, उसका सारा चरित जानकर राजासे निवेदन कर दिया। उस (राजा)-के दूत [उस व्यभिचारिणीके घरके निकट] अन्धकारमें स्थित हो गये और वह जैसे ही घर आयी तो राजाके वे दूत उसे पकड़कर राजाके समीप ले गये। राजाकी आज्ञासे दूतोंने उसे [नगरके] बाहर ले जाकर मार डाला॥ १९-२१॥ तदनन्तर यमराजकी आज्ञासे वह उनके दूतोंद्वारा भयंकर नरकमें ले जायी गयी। उलटी लटकी हुई वह कृमियोंद्वारा खूब डँसी गयी। वहाँ पूर्वजन्ममें किये गये दुष्कृत्योंका स्मरण करते हुए उसने अत्यन्त दुःख भोगा और कल्पके अन्तमें वह मृत्युलोकमें (पृथ्वीपर) अत्यन्त दुर्भाग्यशालिनी चाण्डाली हुई॥ २२-२३॥ एक बार वह मद्यपान करके मत्त होकर दिनमें ही सो गयी, तदनन्तर रात्रिके प्रथम प्रहरमें जगनेपर वह भूखसे बहुत पीड़ित हुई। तब वह भिक्षा माँगनेके लिये [संकष्टचतुर्थीका] व्रत करनेवालेके घर गयी। उस (व्रती)-ने उसे (चाण्डालीको) जो अन्न दिया, उसे उसने चन्द्रमाके उदय होनेके बाद खाया॥ २४-२५॥ दैवयोगसे भोजन करते समय स्वेच्छासे ही उसके मुखसे 'गणेश'-ऐसा उच्चारित हुआ, तभी [अन्तकालमें] गणाधिपति गणेशजीने [इसे लानेके लिये] यह सुन्दर विमान भेजा है॥ २६॥ ब्रह्माजी कहते हैं-[हे व्यासजी!] देवदूतोंका वचन सुनकर राजाके दूतोंने उन्हें नमस्कार करके पुनः कहा-॥ २६ १/२॥ राजदूत बोले-[हे देवदूतो!] हम कार्यकर्त्ताओंने यह अत्यन्त अद्भुत घटना देखी॥ २७॥ राजाने हमें जो आज्ञा दी है, उसे सुनिये-इन्द्र एक श्रेष्ठ विमानमें बैठकर देवताओंके साथ गृत्समदको देखनेके लिये आये थे। वहींसे वे भृशुण्डिके पास आये। उन्हें देखकर [इन्द्रने उनको] प्रणामकर भली प्रकारसे पूजन किया तथा उनसे पूजा ग्रहणकर एवं उनकी अनुमति ले वे अपनी पुरीको चल दिये। गमन करता हुआ उनका विमान कुष्ठग्रस्त [पापी] वैश्यपुत्रकी दृष्टि पड़ते ही उसी क्षण
२२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
उस [राजा] शूरसेनके नगरमें गिर पड़ा ॥ २८-३०॥ [तब] शूरसेनने वहाँ जाकर उन्हें नमस्कारकर और उनका भलीभाँति पूजनकर [उनसे] विमानके पतनका कारण और उसके [पुनः] गमनका उपाय पूछा ॥ ३१ ॥ इन्द्रके यह कहनेपर कि 'संकष्टचतुर्थीव्रत-जनित पुण्यसे ही यह विमान प्रस्थान करेगा, अतः इसके लिये प्रयत्न कीजिये' हम दूतगण राजाकी आज्ञासे संकष्टचतुर्थीव्रत करनेवालेको खोजने यहाँ आये हैं। हे देवदूतो! यदि इसने यह व्रत किया है, तो इसे भूपति शूरसेनके पास ले चलिये। जब यह चाण्डाली संकष्टीव्रत- जनित पुण्यका दान करेगी तो इसका पुण्य द्विगुणित हो जायगा और यह पुनः इस विमानसे प्रस्थान करेगी, साथ ही इन्द्रका विमान भी अपने लोकके लिये प्रस्थान कर जायगा ॥ ३२-३५ ॥ इससे आप सबका, इस चाण्डालीका, हमारा, राजा शूरसेनका और शचीपति इन्द्रका कार्य सम्पन्न हो जायगा, यदि आप सबको रुचिकर लगे तो ऐसा करें। उनका इस प्रकारका वचन सुनकर भगवान् गणेशके सेवकोंने कहा—'इसे दूसरोंको देनेकी आज्ञा गणेशजीद्वारा हमें नहीं हैं' ॥ ३६-३७ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने [जब] उस चाण्डालीको उठाकर विमानमें चढ़ाया, तभी वह दिव्य कान्तिसे सम्पन्न, दिव्य वस्त्राभूषणसे युक्त शरीरवाली हो गयी। तदनन्तर वह दिव्य वाद्योंकी ध्वनिके साथ देवदूतोंके द्वारा गजानन गणेशजीके समीप ले जायी गयी और राजाके दूत जैसे आये थे, वैसे ही राजा शूरसेनके पास लौट गये और सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे कहा ॥ ३८-३९१/२ ॥ राजाके दूत जब उस वृत्तान्तका वर्णन कर रहे थे, उसी समय दसों दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ वह विमान उस चाण्डालीको ले जाते हुए उन सबको दिखायी दिया। तभी उस चाण्डालीकी दृष्टि शचीपति इन्द्रके उस विमानपर पड़ी। उनका विमान उसके विमानकी वायुके स्पर्शसे सभी लोगों, देवताओं और ऋषियोंके आश्चर्यपूर्वक देखते-देखते ऊपरकी ओर चला गया ॥ ४०-४२ ॥ इन्द्रके अमरावतीपुरी चले जानेपर सभी अपने- अपने स्थानको चले गये। संकष्टचतुर्थीव्रतके पुण्यसे पापोंका नाशकर वह चाण्डाली भी दिव्य शरीरसे सम्पन्न होकर भगवान् गणेशजीके धामको चली गयी। इस संकष्टनाशक वृत्तान्तको जो मनुष्य सम्यक् रूपसे श्रवण करता है अथवा प्रयत्नपूर्वक दूसरेको सुनाता है, वह [अपने] सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त करता है ॥ ४३-४४॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीकी महिमाका वर्णन' नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७४ ॥
पचहत्तरवाँ अध्याय
राजा शूरसेनका संकष्टचतुर्थीव्रत करना और उसके प्रभावसे सम्पूर्ण प्रजासहित उनको ले जानेके लिये गणेशलोकसे विमान आना
ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी!] संकष्ट- चतुर्थीव्रतजनित [पुण्य]-की महिमाको सुनकर और देखकर राजा शूरसेनने उस व्रतको करनेका मन बनाकर मुनिवर वसिष्ठसे कहा— ॥ १ ॥ राजा [शूरसेन] बोले—[हे मुनिश्रेष्ठ !] संकष्ट- चतुर्थीव्रतहेतु मुहूर्त बतलाइये। मैं यहाँ (पृथ्वीलोकमें) इस सद्यः फल देनेवाले व्रतको करना चाहता हूँ ॥ २ ॥ **वसिष्ठजी बोले—**हे नृपश्रेष्ठ! माघमासके कृष्ण पक्षकी चतुर्थीको जब मंगलवार हो, तब तुम इस सर्वसिद्धिकारक और सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाले इस उत्तम व्रत (संकष्टचतुर्थी)-का अनुष्ठान करो ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यास!] तदनन्तर वसिष्ठजीद्वारा बतलाये गये शुभ दिनके शीघ्र आ जानेपर [गणेशजीके प्रति] भक्तिभावान्वित राजाने पत्नीसहित
उ०ख०-अ०७५ ] * राजा शूरसेनका संकटचतुर्थीव्रत करना * २२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] व्रतहेतु समस्त आवश्यक सामग्रीका संग्रह किया और उत्तम चतुर्थी व्रतको करनेकी इच्छासे प्रातः स्नानकर नित्यकर्मका समापन किया ॥ ४-५ ॥ तत्पश्चात गणेशजीका पूजन और स्वस्तिवाचन करके, श्रेष्ठ द्विजों और वसिष्ठजीका पूजनकर और उनकी अनुज्ञा लेकर गणेशजीको मनमें धारण करके उनके नाम-जपमें तत्पर हो गये और वे पैरके एक अँगूठेपर तबतक स्थित रहे, जबतक कि सूर्य अस्त [नहीं] हुआ ॥ ६-७ ॥ तदनन्तर पुनः स्नानके बाद [राजाने] सायं सन्ध्योपासना की और वसिष्ठजीके सहित [गणेशजीका] पूजन करना प्रारम्भ किया ॥ ८ ॥ [राजाने] केलेके खम्भोंसे सुसज्जित एक विशाल मण्डपिकाका निर्माण कराकर उसे अनेक प्रकारके वस्त्रों और अलंकारोंसे समन्वित तथा छत्र एवं चामरसे सुशोभित कराया। वह महामण्डपिका पुष्पमालाओंसे विभूषित अनेक प्रकाशमान मणियोंसे युक्त, दीपावलियोंसे सुशोभित और दर्पणोंकी पंक्तिके कारण मनोहर लग रही थी ॥ ९-१० ॥ उस महामण्डपिकाके मध्यभागमें सोनेके कलशपर गजानन गणेशजीकी सर्वांगसुन्दर सुवर्णनिर्मित सुन्दर प्रतिमा स्थापित करके उसे अनेक अलंकारोंसे सुसज्जित और अनेक रत्नोंसे विभूषित किया। उस समय श्रेष्ठ द्विजगण [वेद-] पाठ कर रहे थे और गायक [भगवान् गणपतिका] गुणगान कर रहे थे ॥ ११-१२ ॥ राजाने तुरही आदि सभी प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि और नर्तकोंके नृत्यके मध्य वैदिक एवं पौराणिक मन्त्रोंसे उस मूर्तिका सम्यक् प्रकारसे पूजन किया ॥ १३ ॥ उन्होंने पंचामृतसे उस गणेशमूर्तिको स्नान कराते हुए षोडशोपचार पूजन किया। मोदक, पुआ, लड्डू, शर्करायुक्त खीर, पंचामृतसहित अनेक प्रकारके व्यंजनोंसे सुशोभित नैवेद्य एवं सुगन्धयुक्त जलको उस गजाननमूर्तिके सम्मुख रखकर गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये राजाने उन्हें समर्पित किया। तदनन्तर उन्होंने अनेक प्रकारके फल, सुपारीयुक्त पान, रत्न और स्वर्णकी दक्षिणा तथा
[दायाँ स्तम्भ] दूर्वा अर्पित करके आरती की और नाना प्रकारके पुष्पोंसे मन्त्रपुष्पांजलि दी। तत्पश्चात् चतुर्थी तिथि, गणेशजी और चन्द्रमाके लिये अर्घ्य प्रदान किया ॥ १४-१७ ॥ तदनन्तर उन्होंने आदरपूर्वक ब्राह्मणोंका पूजन किया और उन्हें भोजन कराया तथा उन्हें वस्त्र, अलंकार और दक्षिणासहित दस हजार गायें प्रदान कीं ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् सुहृज्जनों और बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वयं राजाने भोजन किया। रात्रिमें उन्होंने गणेशजीसे सम्बन्धित कथाओं और वाद्य-ध्वनिके साथ उनके गुणगानका श्रवण करते हुए जागरण किया ॥ १९ ॥ प्रभातकालमें निर्मल जलमें स्नानकर राजाने पहलेकी भाँति पुनः सम्यक् प्रकारसे पूजनकर गणेशजीकी उस मूर्तिको दक्षिणा एवं उपस्करोंसहित वसिष्ठजीको प्रदान किया। इससे गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने सभी प्रकारकी सम्पत्तियोंसे युक्त विमान भेज दिया ॥ २०-२१ ॥ गजाननके स्वरूपवाले गणेशजीके दूतोंने वहाँ ले जाकर उस विमानको स्थापित किया। वह विमान देखनेवाले सभी लोगोंके मनको आनन्दित कर रहा था ॥ २२ ॥ राजा जब गणेशचतुर्थीव्रतके पुण्यप्रभावसे देव- लोकके लिये जाने लगे, उस समय अनेक प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित और सिरपर मुकुट धारण किये हुए गणेशजीके स्वरूपवाले देवदूतोंने उनसे कहा कि [आपके द्वारा किये गये इस व्रतसे] गणेशजी प्रसन्न हुए हैं, उन्होंने आपके दर्शनकी उत्सुकताके कारण यह विमान भेजा है, तभी हम लोग यहाँ आये हैं, उनके इस प्रकारके वचन सुनकर राजा [गणेशजीकी कृपाका स्मरणकर] अश्रुपात करने लगे ॥ २३-२५ ॥ उस समय उनका गला भर आया और शरीर रोमांचित हो उठा। तदनन्तर राजा शूरसेनने आश्चर्यचकित होते हुए उनसे कहा- ॥ २६ ॥ हे दूतो ! अव्यक्त, अप्रमेय, नित्य, वाणी और मनसे भी अगोचर जगदीश्वरको मेरे दर्शनका कोई हेतु नहीं है। जिनका निरूपण करनेमें वेद और शास्त्र भी समर्थ नहीं हैं, ब्रह्मा और शंकर आदि देवगण जिनका निरन्तर स्मरण करते हैं। उन्होंने मेरा स्मरण किया-यह मेरा
२२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] महान् भाग्य है। राजाकी यह बात सुनकर दूतोंने पुनः उनसे कहा- ॥ २७-२९ ॥ हे राजन्! हम भक्तोंकी महिमाको नहीं जानते, जिनके कारण वे निर्गुण-निराकार परमात्मा साकार होते हैं॥ ३०॥ राजा बोले-देवाधिदेव गणेशजी और आप सबके प्रसन्न होनेपर मेरी एक महती इच्छा यह है कि मैं अपनी नगरीको छोड़कर गणेशजीके पास कैसे जाऊँ? इन लोगोंके बिना तो मैंने कभी हलाहल विषका भी भक्षण नहीं किया है, तो हे निष्पाप [दूतो]! इन सबको साथ लिये बिना मैं परमानन्दका भोग कैसे कर सकता हूँ? ॥ ३१-३२ ॥ तब उन [गणपति] दूतोंने पुनः कहा कि तुम्हारी इच्छा पूरी होनी चाहिये, नहीं तो गणेशजी हम सभीको क्रोधपूर्वक दण्डित करेंगे ॥ ३३ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] हे ब्रह्मन्! तदनन्तर उन्होंने चारों वर्णोंके सभी लोगों और सभी प्राणियोंको ले जानेके लिये क्षणभरमें विमानमें बैठा लिया। वे सभी दिव्य वस्त्र धारण किये हुए थे और सभी दिव्य अलंकारोंसे सुशोभित थे। वे सब आपसमें कहने लगे कि 'यह कैसी महान् अद्भुत घटना है, हम लोगोंने तो कोई पुण्य किया नहीं, फिर यह विमान कैसे ?' ॥ ३४-३५॥ [उस विमानमें बैठे] अन्य लोग कहने लगे कि यह सब राजाके पुण्य-प्रतापसे हुआ है, जैसे पारसके
[दायाँ स्तम्भ] स्पर्शसे धातुमात्र सुवर्ण हो जाती है ॥ ३६ ॥ जैसे अत्यन्त पापी भी साधु पुरुषके वचनसे सिद्धि प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार राजाके पुण्यसे हम सबका सम्यक् उद्धार हुआ है। तदनन्तर गणेशजीके दूतोंने विमानको ऊर्ध्व गति दी, परंतु वह जड़ीभूत हो गया और पृथ्वीतलसे ऊपर नहीं उठा ॥ ३७-३८ ॥ तब तो सभी लोग इस विषयमें संशयग्रस्त हो गये कि यह कैसे अन्तरिक्षमें जायगा और वे आपसमें कहने लगे कि [हम] भाग्यहीनोंको निधि कैसे प्राप्त होगी? भिक्षापात्र महत्तर छींकेपर कैसे चढ़ सकता है? [यह कहते हुए लोगोंके] सब ओर देखनेपर कोई [महापापी] कुष्ठरोगी दिखायी पड़ा। तब किसीने राजासे कहा कि आप इस कुष्ठीका त्याग करें। इसके नीचे उतरनेपर यान ऊर्ध्व गति करेगा (उड़ान भरेगा) ॥ ३९-४१ ॥ उस कुष्ठीको त्यागनेकी इच्छावाले उन दूतोंसे शूरसेनने कहा- 'मैं पापी और त्याज्य हूँ न कि ये सब; इन्हें आप ले जायें अथवा इस कुष्ठीके पूर्वजन्ममें किये पापको कहिये। आप सब सब कुछ जाननेवाले हैं, मेरे प्रति आप सबका स्नेह है, अतः कृपा करके [विमानके उड़नेका] उपाय बतलायें ॥ ४२-४३ ॥ दूतोंने कहा- हे नृप ! आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये, हम आपको इस कुष्ठीके [पूर्व-] जन्मके पाप, दुष्कर्म तथा [विमानके उड़नेका] उपाय भी बतायेंगे ॥ ४४॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शूरसेनकृत संकटचतुर्थीव्रताचरणका वर्णन' नामक पचहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७५ ॥
छिहत्तरवाँ अध्याय श्रीगणेशजीके चार अक्षरवाले 'गजानन' नाम-मन्त्रके माहात्म्यमें ब्राह्मण-पुत्र बुधका आख्यान, शापवश वैश्यकुलमें उत्पन्न बुधका कुष्ठी होना और 'गजानन' नाम-मन्त्रके श्रवणसे उसे विनायकधामकी प्राप्ति
[बायाँ स्तम्भ] दूत बोले-प्राचीनकालकी बात है, गौड़ देशके गौड़ नामक नगरमें [दूर्व नामक] एक ब्राह्मण निवास करता था। वह तपस्वी, ज्ञानी, बुद्धिमान् तथा देवता और ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाला था ॥ १ ॥ उसका ही यह पुत्र उत्पन्न हुआ था। इसकी
[दायाँ स्तम्भ] माताका नाम शाकिनी तथा पत्नीका नाम सावित्री था, जो सावित्रीके समान पतिव्रता थी ॥ २ ॥ माता-पिताका अकेला पुत्र होनेके कारण उनके स्नेहवश वह अनेक आभूषणोंसे अलंकृत रहता था। वह अत्यन्त सुन्दर था और रतिके स्वामी कामदेवके समान
उ०ख०-अ०७६] * श्रीगणेशजीके 'गजानन' नाम-मन्त्रके माहात्म्यमें ब्राह्मण-पुत्र बुधका आख्यान * २२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सुशोभित होता था॥ ३॥ उसके माता-पिता एक क्षणके लिये भी उसका वियोग नहीं चाहते थे। जब वह युवावस्थाको प्राप्त हुआ तो अपनी उस भार्याका परित्यागकर वह नित्य ही परायी स्त्रीमें निरत रहने लगा। वह दूसरेकी निन्दामें परायण, पापकर्ममें निरत तथा पिता-माताकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाला हो गया॥ ४-५॥ एक दिनकी बात है, उस गौड़नगरमें पुरुषोंको मोहित करनेवाली एक वेश्या आयी। उस वेश्याके प्रति आसक्त मनवाले उसने जो किया, उसे तुम सुनो॥ ६॥ उसने अपने माता-पिताके समक्ष ही अपने आभूषणोंको बलपूर्वक उतारकर एक पेटिकामें रखा और फिर छिपकर उन आभूषणोंको उस वेश्याको प्रदानकर उसने बहुत समयतक उसके साथ रमण किया। वह सुगन्धित द्रव्योंका अनुलेपनकर सभी ऐन्द्रिय विषयोंका परित्यागकर केवल उसीमें उसी प्रकार निष्ठावान् हो गया, जैसे कि एक योगी ब्रह्मपरायण हो जाता है। वह कामाग्निसे उसी प्रकार विह्वल हो गया, जैसे मद्यपानके प्रभावसे व्यक्ति मतवाला हो जाता है॥ ७-९॥ अत्यन्त दुखी तथा भूख-प्यासकी परवाह किये बिना उसका पिता नगरके प्रत्येक घरमें अपने पुत्रको खोजने लगा॥ १०॥ पुत्रके कहीं नहीं दिखायी पड़नेपर उसका पिता लम्बी-लम्बी साँस लेता हुआ आधी रातमें घर पहुँचा और अपनी पत्नीसे बोला- 'हमारा पुत्र बुध न जाने कहाँ चला गया। उस पुत्रके बिना हमारा घर वैसे ही व्यर्थ हो गया है जैसे दीपकके बिना रात्रि, जलके बिना बावड़ी और सन्तानके बिना स्त्री निरर्थक हो जाती है। हमारे प्राणोंकी रक्षा करनेवाले उसका दर्शन अब हमें कब होगा?'॥ ११-१२१/२॥ शाकिनी बोली- मैं भूख तथा प्याससे अत्यन्त व्याकुल और चिन्ता तथा शोकसे ग्रस्त हो गयी हूँ, हे नाथ! न जाने हमारा वह प्रिय पुत्र कहाँ चला गया है, यदि मुझे उसका दर्शन हो जाय, तभी मैं जीवित रहूँगी अन्यथा मैं मृत्युको प्राप्त हो जाऊँगी॥ १३-१४॥ [तब] वह दूर्व नामक ब्राह्मण हाथमें लाठी लेकर पुनः अपने पुत्रको ढूँढ़ने निकल पड़ा। रास्तेमें जिस- जिसको वह देखता, उस-उससे अपने पुत्रके विषयमें पूछता जाता था॥ १५॥ जब वह अत्यन्त थक गया और भूखसे व्याकुल हो उठा तो उसे चक्कर आने लगा, उसी समय उसे अन्त्यवर्णमें उत्पन्न एक अत्यन्त वृद्ध तथा महाभयंकर भीम नामवाला पुरुष दिखायी पड़ा, उसने [जब] उससे [भी] अपने पुत्रके विषयमें पूछा तो उसने अत्यन्त स्पष्ट शब्दोंमें उत्तर दिया॥ १६॥ भीम बोला- बुध नामक तुम्हारा वह बुद्धिमान् पुत्र वेश्याके घरमें है और वह कामासक्त होकर सुखपूर्वक क्रीड़ा कर रहा है। इस संसारमें कौन किसका पुत्र है, कौन माता है तथा कौन पिता है? अर्थात् कोई किसीका नहीं है। हे द्विजश्रेष्ठ! तुम व्यर्थ ही कष्ट उठा रहे हो॥ १७॥ दूर्व बोला- मेरा पुत्र बुध कैसे वेश्यामें आसक्त हो गया? तब वह शीघ्र ही उस वेश्याके घर गया, और वहाँ उसने अपने उस पुत्रको देखा॥ १८॥ वह अत्यन्त मदोन्मत्त था, मदिराका सेवन करनेसे उसकी आँखें लाल-लाल थीं और वह नशेमें चूर था, पिताने हाथ पकड़कर उसे उठाया तथा क्रुद्ध होकर उस पुत्रको डाँटा- 'अरे दुष्ट! तुमसे तो यह काँटेवाला वृक्ष अच्छा है अथवा यह पत्थर अच्छा है, तुम प्राणोंका परित्याग क्यों नहीं कर देते ? तुम्हारे जीवित रहनेसे क्या लाभ?' ॥ १९-२०॥ ब्रह्माजी बोले- पिताका वचन सुनकर वह बुध नामक पुत्र क्रोधाविष्ट हो गया और उसने पिताके मुखपर चाँटा मार दिया॥ २१॥ उसने कहा- 'अरे नराधम ! कृमि-कीट आदि भी जिसमें मनुष्योंके समान ही सुख मानते हैं, उस रति- क्रीड़ाके समय तुमने मेरे सुखमें बाधा क्यों पहुँचायी? अथवा मेरे ऊपर अकस्मात् कौएकी विष्ठा कैसे गिर पड़ी?' - ऐसा कहकर उसने पुनः पितापर लातसे प्रहार किया और उसके प्राणोंको हर लिया॥ २२-२३॥
२२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- पिताके द्वारा प्राण त्याग दिये जानेपर वह 'हर- ईश्वर' ऐसा कहने लगा। [अपनी इच्छापूर्तिमें पिताको कण्टकरूप माननेके कारण] वह पुत्र प्रसन्न हो गया। पाँवोंमें रस्सी बाँधकर उसने उसे दूर फेंक दिया ॥ २४ ॥ मदिरापान करके पुनः उसने उस वेश्याके साथ यथेच्छ रमण किया। प्रातःकाल होनेपर वह अपने घर गया और तब माताने उसे देखा ॥ २५ ॥ उसने हर्षपूर्वक पुत्रको अपने हृदयसे लगाया और स्नेहवश उसके स्तनोंसे दूध निकलने लगा। वह बोली- 'तुम कहाँ चले गये थे, कहाँ ठहरे हुए थे, वहाँ तुमने क्या किया? हे वत्स! यह सब तुम मुझे विस्तारसे बतलाओ, तुम्हारे पिता अत्यन्त दुखी हैं। मैं भी निराहार और निर्जल होकर रातभर जागती रही हूँ ॥ २६-२७॥ हे वत्स ! मैं यहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी और तुम्हारे पिता तुम्हें खोजनेके लिये बहुत समयसे गये हुए हैं, अब तुम अपने पिताको खोजनेके लिये जाओ'- ऐसा वह बार-बार कहने लगी। इसके द्वारा मुझे आज्ञा दी जा रही है-ऐसा समझकर वह पुत्र क्रुद्ध हो उठा और उसने एक सूखी लकड़ीसे उसके सिरपर प्रहार किया, जिससे वह भूमिपर गिर पड़ी ॥ २८-२९ ॥ उसको चेतनाशून्य जानकर उसने उसके [भी] पाँवोंमें रस्सी बाँधकर उसे घरसे बाहर फेंक दिया और स्वयं वेश्याके घरमें जाकर अत्यन्त प्रसन्न होकर काम- क्रीड़ामें निरत हो गया ॥ ३० ॥ सज्जन पुरुषोंने अपने-अपने घरसे काष्ठ ले जाकर उस ब्राह्मण-दम्पतीका दाह-संस्कार किया। दण्डनीय होनेपर भी ब्राह्मण होनेके कारण राजाने उस द्विजाधमको दण्डित नहीं किया। पुनः घरमें आये हुए उससे उसकी पत्नी धीरे-धीरे बोली ॥ ३१ १/२ ॥ सावित्री बोली- हे प्राणनाथ! हे महामते! मैं एक बात कहती हूँ, उसे आप सुनें ॥ ३२ ॥ आपका जन्म अत्यन्त प्रसिद्ध तथा अत्यन्त पवित्र ब्राह्मणकुलमें हुआ है, किंतु आपका आचरण सर्वथा उसके विरुद्ध दिखायी देता है, अतः उस दुराचारका आपको विवेकपूर्वक परित्याग कर देना चाहिये ॥ ३३ ॥ इस लोकमें वही कार्य करना चाहिये, जिससे परलोकमें सुख प्राप्त हो। [वृद्धावस्थासे] पूर्वकी अवस्था अर्थात् युवावस्थामें ऐसा करना चाहिये, जिससे कि वृद्धावस्थामें सुख प्राप्त हो ॥ ३४ ॥ [वर्षभरमें] आठ मासतक वह कर्म करना चाहिये, जिससे कि वर्षाकालमें सुख प्राप्त हो और दिनमें वही कार्य करना चाहिये, जिससे रातमें सुख प्राप्त हो सके। पिताके प्रिय होने तथा ब्राह्मण होनेके कारण राजा भी आपको क्षमा कर दे रहे हैं; सर्वाङ्गसम्पूर्ण, अत्यन्त सुन्दर तथा आपके मनके अनुसार चलनेवाली मुझ धर्मपत्नीको छोड़कर आप क्यों उस वेश्यामें आसक्त हैं? लोकमें सर्वत्र आपकी निन्दा हो रही है, किंतु आपके भयसे आपको कोई कुछ नहीं कहता ॥ ३५-३७ ॥ वे सभी लोग मुझसे कहते हैं, हे शुभे ! तुम्हारा पति कैसा है? तब लज्जाके मारे मुँह नीचे करके मैं उसी क्षण अपना प्राण त्याग करना चाहती हूँ ॥ ३८ ॥ हे स्वामिन्! यदि आप अहर्निश मेरे साथ यथेष्ट रमण करें तो आपसे कोई कुछ भी नहीं कहेगा और आपको महान् पाप भी नहीं लगेगा ॥ ३९ ॥ यदि आप इसमें हित समझें तो विवेकपूर्वक उस वेश्याका परित्यागकर मेरे वचनका पालन करें। विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि वह अज्ञानमें किये गये अथवा प्रमादवश किये गये कर्मका सर्वथा परित्याग कर दे ॥ ४० ॥ [मनुष्यको] निश्चय करना चाहिये कि यह जो [प्रिय अथवा अप्रिय परिणाम उपस्थित] है, वह मेरे ही कर्मका परिणाम है। यदि मैंने अपना इष्टसाधन नहीं किया, तो मेरा अनिष्ट होना सर्वथा निश्चित है, इसलिये जो इष्ट न हो, वैसे परिणामका जनक कार्य नहीं करना चाहिये ॥ ४१ ॥ इसके विपरीत कर्म करनेपर पुरुषको न तो इस लोकमें सुख मिलता है और न परलोकमें ही। अपनी स्त्रीके द्वारा कहे गये इस प्रकारके वचनरूपी बाणोंसे विद्ध हुए मर्मस्थलवाला महान् क्रूर वह बुध अत्यन्त रोषमें भर गया और जलता हुआ-सा बोला ॥ ४२ १/२ ॥ बुध बोला- अरी निर्लज्ज ! निष्ठुर ! प्रगल्भ !
उ०ख०-अ०७६] * श्रीगणेशजीके 'गजानन' नाम-मन्त्रके माहात्म्यमें ब्राह्मण-पुत्र बुधका आख्यान * २२९ दुष्टे! मुझपर स्पष्ट रूपसे रुष्ट हुई तुम भी उसी | कोई भी व्यक्ति कहीं भी तुम्हारा नामतक नहीं लेगा ॥ ५२- गतिको प्राप्त होओगी, जो गति मेरे माता-पिताकी हुई | ५४॥ है ॥ ४३१/२ ॥ | ब्रह्माजी बोले- तब भयभीत हुआ वह बुध पुनः सावित्री बोली- जिसने अनुकूल शिक्षा देनेवाले | वेश्याके घर चला गया और वहाँ सुरापान करके कुछ तथा स्वतन्त्र अपने माता-पिताकी मर्यादाका पालन नहीं | भी चिन्ता न करते हुए उसने उसके साथ रमण किया। किया, तो फिर विपरीत बोलनेवाली मुझ स्त्रीकी रक्षा | इस प्रकारके उसके दुष्कर्मोंका मैं कैसे वर्णन करूँ; करनेवाला वह कैसे हो सकता है ? पतिव्रता स्त्रीके लिये | क्योंकि जो दूसरेके दोषोंका बखान करता है, उसके तो पतिके हाथोंसे मृत्यु प्राप्त करना भी इस लोक तथा | पुण्यका क्षय हो जाता है ॥ ५५-५६ ॥ परलोकमें कल्याणकारक है ॥ ४४-४५ ॥ | समय आनेपर वह मृत्युको प्राप्त हुआ और यमदूत ऐसा कहती हुई उस अपनी पत्नीके बालोंकी | उसको यमराजके यहाँ ले गये। यमराजने (दूतोंसे) कहा- चोटीको उसने सहसा पकड़ लिया और लकड़ी, ढेलों, | इसे यहाँ क्यों लाये हो, इसे सीधे नरकमें ले जाओ। मुष्टियों तथा पत्थरोंसे वह उसे पीटने लगा ॥ ४६ ॥ | यमराजका वचन सुनकर दूत उसी समय उसे ले गये और उस स्त्रीने पूर्वजन्मके पुण्यके प्रभावसे पतिरूपमें | प्रलयपर्यन्तके लिये उसे नरकमें डाल दिया ॥ ५७-५८ ॥ भगवान् श्रीरामका स्मरण किया और उसके द्वारा | नारकीय यातना भोग लेनेके अनन्तर उसने वैश्यके मर्मस्थानोंमें चोट किये जानेके कारण उसने सहसा | घरमें जन्म लिया और ऋषिपत्नीके शापसे वह महान् प्राणोंका परित्याग कर दिया। दिव्य देह धारणकर स्वर्गमें | कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो गया। जो पिता-माता, स्त्रीका वध जाकर उसने परम सुखका उपभोग किया। इधर उसे मरा | करनेवाला है, सुरापान करनेवाला है तथा गुरुपत्नीके जानकर उसके पतिने रात्रिमें उसके पैरोंको खींचकर दूर | साथ गमन करनेवाला है, उसका स्पर्शमात्र हो जानेपर ले जाकर फेंक दिया ॥ ४७-४८ ॥ | वस्त्रोंसहित स्नान करना चाहिये ॥ ५९-६० ॥ तब निरंकुश हो अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो, वह | ऐसे प्राणीका नाम भी नहीं लेना चाहिये; क्योंकि उस वेश्याके साथ रमण करने लगा। वह बुध उससे | इससे महान् दोष होता है। इस प्रकारके इस पापात्माको कहने लगा कि तुम्हारे लिये ही मैंने अपने माता-पिता | हम इधर छोड़ देंगे तो यह विमान ऊपरको उड़ चलेगा, और पत्नी सभीको मार डाला है ॥ ४९ ॥ | इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ६११/२ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर वह बुध कालभि | ब्रह्माजी बोले- उन देवदूतोंका इस प्रकारका नामक मुनिके घर गया। उस समय कालभिमुनिके | वचन सुनकर राजा शूरसेन अत्यन्त कम्पित हो उठे और स्नानके लिये गये हुए होनेपर उस दुष्टने मुनिकी भार्याके | उनसे बोले कि मुझे इसके दुष्कर्मोंका ज्ञान नहीं था। बालोंको पकड़ लिया ॥ ५० ॥ | तदनन्तर अत्यन्त व्याकुल हुए राजा शूरसेनने पुनः उसने अत्यन्त रमणीय मुनिपत्नीके साथ कामुक चेष्टाएँ | उठकर उन देवदूतोंको प्रणाम किया और उनसे कहा- कीं। तदनन्तर उस स्त्रीने उसे शाप दे दिया ॥ ५११/२ ॥ | 'आप मेरे ऊपर कृपा करके इस पापीके सभी दोष- सुलभा बोली- मेरे माता-पिताने मेरा यह | पापोंको दूर करनेका उपाय मुझे बतायें' ॥ ६२-६४ ॥ 'सुलभा' दुष्ट नाम क्यों रखा? हे दुष्टबुद्धि ! हे नराधम ! | दूत बोले- हे राजन् ! हे नृपश्रेष्ठ ! उठिये! मैं तुम्हारे लिये सुलभ अर्थात् सरलतासे प्राप्त हो गयी | उठिये, हम इसके पापोंके विनाशका उपाय बताते हैं, हूँ। मेरे पति कालभि नामक मुनिश्रेष्ठ जब स्नान करने | आप एकाग्रचित्त होकर उसका श्रवण करें ॥ ६५ ॥ गये हुए थे, तब तुमने मेरे साथ बलपूर्वक दुराचार किया, | गणेशजीका जो चार अक्षरवाला प्रसिद्ध नाम है, अतः जाओ, तुम कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो जाओगे, जन्मान्तरमें | उसका आप इसके कानमें जप करें, इससे सभी दोष-
२३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- पापोंका उसी प्रकार विनाश हो जायगा, जिस प्रकार | विनष्ट हो जानेपर वह सभी दिशाओं तथा देशोंको कि भगवान् सूर्यके उदय हो जानेपर सम्पूर्ण अन्धकार | प्रकाशित करते हुए विमानमें आरूढ़ हो गया ॥ ७० ॥ विनष्ट हो जाता है। नाम-जपके अतिरिक्त किसी | तदनन्तर विघ्नराज गणेशजीकी आज्ञा पाकर उनके अन्य उपायमें इसका अधिकार नहीं है, अतः [यह] | दूतोंने सभी लोगोंसे समन्वित उस विमानको क्षणभरमें ही नामका ही जप [तथा श्रवण] करे ॥ ६६-६७ ॥ | गणेशजीके धाममें पहुँचा दिया ॥ ७१ ॥ ब्रह्माजी बोले-देवदूतोंके कथनानुसार राजा शूरसेनने | हे निष्पाप ! जो-जो आपने पूछा, वह सब मैंने बता 'जय' शब्दका उच्चारण करते हुए उस कुष्ठी वैश्यके | दिया है। यह श्रेष्ठ संकटचतुर्थीव्रत अत्यन्त पुण्यप्रद, कानमें गणेशजीका जो चार अक्षरवाला नाम (गजानन) | धर्मकी प्राप्ति करानेवाला और यश तथा आयुष्यको है, उसका तीन बार जप किया ॥ ६८ ॥ | प्रदान करनेवाला है। इसके माहात्म्यका श्रवण सभी 'गजानन' इस नाममन्त्रको सुनते ही वह कुष्ठी | प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त करानेवाला है। यह व्रत सभी दिव्य देहवाला हो गया। वह अपने तेजसे उसी प्रकार | पीड़ाओंको दूर करनेवाला तथा सभी प्रकारके विघ्नोंका सर्वत्र प्रकाश कर रहा था, जैसे कि भगवान् सूर्य अपने | विनाशक है। मैंने दूर्वाके माहात्म्य तथा गणेशजीके तेजसे समस्त लोकको प्रकाशित करते हैं ॥ ६९ ॥ | नामका प्रभाव भी तुम्हें बतलाया, अब आगे और क्या नामके सुननेमात्रसे ही सभी प्रकारके पापोंके | सुनना चाहते हो ? ॥ ७२-७३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वा-नाममहिमावर्णन' नामक छिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥ सतहत्तरवाँ अध्याय श्रीपरशुरामजीके आविर्भावके प्रसंगमें महर्षि जमदग्निका आख्यान, कार्तवीर्यार्जुनका महर्षि जमदग्निके आश्रममें आना और महर्षिद्वारा कामधेनुके प्रभावसे ससैन्य राजाका सत्कार करना व्यासजी बोले-[हे ब्रह्मन् !] अन्य किसके | भयभीत रहते थे ॥ ३-४ ॥ द्वारा इस व्रतको किया गया था, उसे बताइये, इस | उनकी पत्नी रेणुका नामसे विख्यात थीं। जिनके विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो रहा है ॥ १ १/२ ॥ | गुंजा (घुँघुची)-के बराबर लावण्यकी भी तुलना कामदेवकी ब्रह्माजी बोले-प्राचीनकालकी बात है, महर्षि | पत्नी रतिके लावण्यसे नहीं हो सकती ॥ ५ ॥ जमदग्निके पुत्र परशुरामने इस व्रतको किया था, उन्हें | इसी कारणसे वे रेणुका लोकोंमें 'रति' इस नामसे भी इस व्रतके करनेसे यश, विजय, ज्ञान तथा दीर्घ | विख्यात थीं। जो अपनी सुन्दरतासे सबको मोहित कर आयुकी प्राप्ति हुई थी ॥ १ १/२ ॥ | देनेवाली थीं; ऐसी उन रेणुकाका वर्णन करनेमें कौन व्यासजी बोले-हे पितामह ! उन परशुरामजीका | समर्थ है ? ॥ ६ ॥ आविर्भाव कैसे हुआ था और वे किसके द्वारा किससे | जिनके नेत्रोंकी शोभाको प्राप्त करनेके लिये चकोर उत्पन्न हुए थे ? मेरे पूछनेपर आप यह सब विस्तारपूर्वक | पक्षी जलमें निवास करते हुए और हरिण स्वच्छन्दतापूर्वक मुझे बतलाइये ॥ २ १/२ ॥ | तृणोंका भक्षणकर वनमें रहते हुए तपस्या करते हैं ॥ ७ ॥ ब्रह्माजी बोले-अत्यन्त विख्यात श्वेतद्वीपमें | जिनके मुखमण्डलकी शोभाको प्राप्त करनेके लिये महामुनि जमदग्निजी निवास करते थे। वे त्रिकालज्ञ मुनि | चन्द्रमा भी भगवान् शिवकी सेवा करते हैं। वे देवी आदि अपनी मानसिक शक्तिसे सृष्टि, संहार, निग्रह तथा | और अन्तसे रहित तथा मूलप्रकृतिरूपा ईश्वरी हैं ॥ ८ ॥ अनुग्रह करनेमें समर्थ थे। इसी कारण देवता भी उनसे | उन्हीं रेणुकादेवीसे साक्षात् शिवस्वरूप महाभाग
उ०ख०-अ०७७] * श्रीपरशुरामजीके आविर्भावके प्रसंगमें महर्षि जमदग्निका आख्यान * २३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जमदग्निके द्वारा इन परशुरामका प्रादुर्भाव हुआ, जो साक्षात् योगेश्वर विष्णुके समान हैं॥ ९॥ वे अत्यन्त सुन्दर शरीरवाले तथा साक्षात् कामदेवके मनको भी मथ देनेवाले थे। वे माता-पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले थे, उनका बल-पराक्रम अत्यन्त विख्यात था। वे देवता, ब्राह्मण, गुरु, विद्वान्, गौ आदिके पूजनमें निरत रहते थे। वेदों, वेदांगों (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द तथा ज्योतिष) तथा स्मृतियोंका स्वाध्याय वे सदा किया करते थे ॥ १०-११ ॥ वे बोलनेमें बृहस्पतिके समान, क्षमामें पृथ्वीके समान, गाम्भीर्यमें समुद्रके समान थे और माता-पिताकी आज्ञाका पालन करनेमें तत्पर रहते थे। अनेक विद्याओंके अध्ययनके लिये अत्यन्त दृढमति होकर माता-पिताकी आज्ञा लेकर वे नैमिषारण्यमें चले आये ॥ १२-१३ ॥ उनके नैमिषारण्यमें चले जानेपर उस समय कृतवीर्यके पुत्र महान् बलशाली राजा कार्तवीर्य वहाँ आये। उनके तेजके प्रभावसे समस्त भूमण्डल सदाके लिये उनके वशीभूत हो गया था ॥ १४ ॥ भगवान् विष्णुके अंशावतार तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले उन राजा कार्तवीर्यके पास लक्ष्मी स्थिर रूपसे निवास करती थी। वे युद्धमें शत्रुओंका विनाश करनेवाले पाँच सौ बाणोंको एक साथ छोड़ते थे ॥ १५ ॥ उनका बल तथा पौरुष अत्यन्त विख्यात था। इन्द्रादि देवता उनकी सेवामें उपस्थित रहते थे। उनके पास असंख्य हाथी, रथ, घोड़े तथा पैदल सैनिक थे। युद्धके लिये प्रस्थान करते समय उनकी सेनाके द्वारा समस्त पृथ्वीमण्डल उसी प्रकार आच्छादित हो जाता था, जिस प्रकार कि वर्षाकालमें मेघमण्डलकी धाराओंद्वारा समस्त नभमण्डल आच्छादित हो जाता है ॥ १६-१७ ॥ उनके शंखनादका श्रवणकर शत्रु उसी प्रकार दसों दिशाओंमें भाग जाते, जैसे कि सिंहनादको सुनकर करोड़ों मदोन्मत्त हाथी भाग जाते हैं ॥ १८ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! जब वे राजा (अपने हजार हाथोंसे) स्वेच्छापूर्वक पाँच सौ ताली बजाते, तो उसके निनादसे घोषपूर्ण समस्त ब्रह्माण्ड काँप उठता ॥ १९ ॥ एकबार वे राजा स्वेच्छापूर्वक अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर [वन-विहारको] निकले। उस समय वे नीले रंगके वस्त्र धारण किये हुए थे, उनका छत्र भी नीले रंगका था तथा उनके सैनिक भी उन्हींकी भाँति नीले वस्त्र धारण किये थे। वे वनों, नदियों, पर्वतोंको रौंदते हुए, विविध प्रकारके मृगगणोंको देखते हुए तथा कुछका शिकार करते हुए जा रहे थे। तदनन्तर सह्याद्रिके शिखरपर उन्होंने एक श्रेष्ठ आश्रमको देखा। वह आश्रम उसी प्रकारका था, जैसे कि कैलासशिखरपर भगवान् शंकरका आवास- स्थान हो। राजाने अपने सेवकोंसे पूछा- 'यह उत्तम स्थान किसका है?' ॥ २०-२२ १/२ ॥ सेवक बोला- हे महाभाग! यहाँ प्रसिद्ध जमदग्नि मुनि निवास करते हैं। वे साक्षात् सूर्यके समान [तेजस्वी] हैं तथा शाप और कृपा करनेमें समर्थ हैं। उनके दर्शनसे करोड़ों पापराशियाँ विनष्ट हो जाती हैं। यदि आपकी इच्छा है तो वहाँ जाना चाहिये, आपको अवश्य दर्शन होंगे। आपकी कृपासे हम सभीका भी कल्याण हो जायगा ॥ २३-२४ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- सेवकका इस प्रकारका वचन सुनकर राजा वहाँ जानेके लिये उद्यत हो गये, उन्होंने अपनी सम्पूर्ण सेनाको मना कर दिया और [चार] श्रेष्ठजनोंको साथ लेकर वे तत्क्षण ही तपोनिधि मुनिश्रेष्ठ जमदग्निके आश्रमके लिये गये ॥ २५-२६ ॥ राजाने कुशके आसनपर विराजमान उन मुनिको देखा, जो प्रज्वलित अग्निकी भाँति दिखायी दे रहे थे। राजाने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया तथा साथमें आये सभी सैनिकों आदिने भी उन्हें प्रणाम किया ॥ २७ ॥ अनेक विशाल पर्णशालाओं, लताकुंजों तथा वृक्षोंकी छायामें वे सैनिक बैठ गये और राजा मुनिके समक्ष स्थित हो गये। कृतवीर्यके पुत्र महान् पराक्रमी राजा कार्तवीर्य चार [श्रेष्ठजनों]-से घिरे मुनिवर जमदग्निद्वारा निर्दिष्ट आसनपर बैठ गये ॥ २८-२९ ॥ मुनि जमदग्निने पाद्य, अर्घ्य तथा विष्टर (आसनके प्रतीकरूपमें कुशमुष्टि) प्रदानकर उन सभीका सत्कार किया और गायें भी प्रदान कीं तथा शिष्योंद्वारा अन्य