श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 226, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
उस [राजा] शूरसेनके नगरमें गिर पड़ा ॥ २८-३०॥ [तब] शूरसेनने वहाँ जाकर उन्हें नमस्कारकर और उनका भलीभाँति पूजनकर [उनसे] विमानके पतनका कारण और उसके [पुनः] गमनका उपाय पूछा ॥ ३१ ॥ इन्द्रके यह कहनेपर कि 'संकष्टचतुर्थीव्रत-जनित पुण्यसे ही यह विमान प्रस्थान करेगा, अतः इसके लिये प्रयत्न कीजिये' हम दूतगण राजाकी आज्ञासे संकष्टचतुर्थीव्रत करनेवालेको खोजने यहाँ आये हैं। हे देवदूतो! यदि इसने यह व्रत किया है, तो इसे भूपति शूरसेनके पास ले चलिये। जब यह चाण्डाली संकष्टीव्रत- जनित पुण्यका दान करेगी तो इसका पुण्य द्विगुणित हो जायगा और यह पुनः इस विमानसे प्रस्थान करेगी, साथ ही इन्द्रका विमान भी अपने लोकके लिये प्रस्थान कर जायगा ॥ ३२-३५ ॥ इससे आप सबका, इस चाण्डालीका, हमारा, राजा शूरसेनका और शचीपति इन्द्रका कार्य सम्पन्न हो जायगा, यदि आप सबको रुचिकर लगे तो ऐसा करें। उनका इस प्रकारका वचन सुनकर भगवान् गणेशके सेवकोंने कहा—'इसे दूसरोंको देनेकी आज्ञा गणेशजीद्वारा हमें नहीं हैं' ॥ ३६-३७ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने [जब] उस चाण्डालीको उठाकर विमानमें चढ़ाया, तभी वह दिव्य कान्तिसे सम्पन्न, दिव्य वस्त्राभूषणसे युक्त शरीरवाली हो गयी। तदनन्तर वह दिव्य वाद्योंकी ध्वनिके साथ देवदूतोंके द्वारा गजानन गणेशजीके समीप ले जायी गयी और राजाके दूत जैसे आये थे, वैसे ही राजा शूरसेनके पास लौट गये और सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे कहा ॥ ३८-३९१/२ ॥ राजाके दूत जब उस वृत्तान्तका वर्णन कर रहे थे, उसी समय दसों दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ वह विमान उस चाण्डालीको ले जाते हुए उन सबको दिखायी दिया। तभी उस चाण्डालीकी दृष्टि शचीपति इन्द्रके उस विमानपर पड़ी। उनका विमान उसके विमानकी वायुके स्पर्शसे सभी लोगों, देवताओं और ऋषियोंके आश्चर्यपूर्वक देखते-देखते ऊपरकी ओर चला गया ॥ ४०-४२ ॥ इन्द्रके अमरावतीपुरी चले जानेपर सभी अपने- अपने स्थानको चले गये। संकष्टचतुर्थीव्रतके पुण्यसे पापोंका नाशकर वह चाण्डाली भी दिव्य शरीरसे सम्पन्न होकर भगवान् गणेशजीके धामको चली गयी। इस संकष्टनाशक वृत्तान्तको जो मनुष्य सम्यक् रूपसे श्रवण करता है अथवा प्रयत्नपूर्वक दूसरेको सुनाता है, वह [अपने] सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त करता है ॥ ४३-४४॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीकी महिमाका वर्णन' नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७४ ॥
पचहत्तरवाँ अध्याय
राजा शूरसेनका संकष्टचतुर्थीव्रत करना और उसके प्रभावसे सम्पूर्ण प्रजासहित उनको ले जानेके लिये गणेशलोकसे विमान आना
ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी!] संकष्ट- चतुर्थीव्रतजनित [पुण्य]-की महिमाको सुनकर और देखकर राजा शूरसेनने उस व्रतको करनेका मन बनाकर मुनिवर वसिष्ठसे कहा— ॥ १ ॥ राजा [शूरसेन] बोले—[हे मुनिश्रेष्ठ !] संकष्ट- चतुर्थीव्रतहेतु मुहूर्त बतलाइये। मैं यहाँ (पृथ्वीलोकमें) इस सद्यः फल देनेवाले व्रतको करना चाहता हूँ ॥ २ ॥ **वसिष्ठजी बोले—**हे नृपश्रेष्ठ! माघमासके कृष्ण पक्षकी चतुर्थीको जब मंगलवार हो, तब तुम इस सर्वसिद्धिकारक और सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाले इस उत्तम व्रत (संकष्टचतुर्थी)-का अनुष्ठान करो ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यास!] तदनन्तर वसिष्ठजीद्वारा बतलाये गये शुभ दिनके शीघ्र आ जानेपर [गणेशजीके प्रति] भक्तिभावान्वित राजाने पत्नीसहित