भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 656 में से

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पृष्ठ 225

उ०ख०-अ०७४] * संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके सन्दर्भमें एक गलत्कुष्ठा चाण्डालीकी कथा * २२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 यह अत्यन्त निन्दित और हीन जातिकी होकर भी कैसे स्वर्ग जा रही है? हे दूतो! यह पूर्वकालमें कौन थी? इस प्रकारकी यह कैसे हो गयी? किस पुण्यके फलस्वरूप यह आप लोगोंके द्वारा स्वर्ग ले जायी जा रही है? यदि यह सब बताना सम्भव हो, तो हमें बतलायें॥ ७-८ १/२॥ देवदूत बोले-बंगाल प्रान्तमें सारंगधर नामके एक क्षत्रिय थे, उनकी सुन्दरा नामकी सुन्दर कन्या थी। वह कोयलके समान मधुर स्वरवाली, चन्द्रमाके सदृश सुन्दर मुखवाली और अपने सौन्दर्यसे रतिकी सुन्दरताको भी जीत लेनेवाली थी। प्रसिद्ध अष्ट नायिकाएँ इसकी दासी बननेके भी योग्य नहीं थीं। वह अपनी तिर्यक् दृष्टिसे योगियोंके भी चित्तको विमोहित कर देती थी॥ ९-११॥ उसके रूप-सौन्दर्यके दर्शनमात्रसे कुछ तरुणोंके तेजकी हानि हो जाती थी। विश्वको मोह लेनेवाली वह [सुन्दरा] व्यभिचारमार्गमें प्रवृत्त हो गयी॥ १२॥ महामूल्यवान् वस्त्रों और अलंकारोंसे अलंकृत रहनेवाली और अनेक प्रकारके विषयोंका भोग करनेवाली वह निर्लज्जा बंगाल नगरमें वेश्याकी भाँति चर्चित हो गयी थी। पिताने असंख्य द्रव्य व्यय करके जिससे उसका विवाह किया था, 'चित्र' नामवाले पतिकी वह सदैव वंचना करती रहती थी॥ १३-१४॥ किसी समय शयन करते हुए उसे छोड़कर वह अर्धरात्रिमें सुन्दर वेष धारणकर जाने लगी तो उसने क्रुद्ध हो हाथसे उसे पकड़ लिया॥ १५॥ तदनन्तर चित्र नामवाले उस पतिने उसे डाँटते हुए कहा-'अरी पापाचारिणी! तुझे धिक्कार है, जो तू निरन्तर परपुरुषमें ही आसक्त रहती है'॥ १६॥ तब उसके इस प्रकारके वचनको सुनकर उस समय तो उसने [अपने] क्रोधको शान्त कर लिया, परंतु अभक्ष्य- भक्षणके कारण वह अत्यन्त कामोन्मत्त हो उठी थी। अतः जब अन्धकार घना हो गया तो उस बलशालिनीने अपने दाहिने हाथमें एक छुरी ली और उससे अपने चित्र नामवाले पतिका उदर-विदारणकर चहेते जार पुरुषके पास रमण करनेके लिये चली गयी॥ १७-१८ १/२॥ जबतक वह वहाँ रमण कर रही थी, उसी समय उसके पड़ोसमें रहनेवाले व्यक्तिने, जो जग रहा था, उसका सारा चरित जानकर राजासे निवेदन कर दिया। उस (राजा)-के दूत [उस व्यभिचारिणीके घरके निकट] अन्धकारमें स्थित हो गये और वह जैसे ही घर आयी तो राजाके वे दूत उसे पकड़कर राजाके समीप ले गये। राजाकी आज्ञासे दूतोंने उसे [नगरके] बाहर ले जाकर मार डाला॥ १९-२१॥ तदनन्तर यमराजकी आज्ञासे वह उनके दूतोंद्वारा भयंकर नरकमें ले जायी गयी। उलटी लटकी हुई वह कृमियोंद्वारा खूब डँसी गयी। वहाँ पूर्वजन्ममें किये गये दुष्कृत्योंका स्मरण करते हुए उसने अत्यन्त दुःख भोगा और कल्पके अन्तमें वह मृत्युलोकमें (पृथ्वीपर) अत्यन्त दुर्भाग्यशालिनी चाण्डाली हुई॥ २२-२३॥ एक बार वह मद्यपान करके मत्त होकर दिनमें ही सो गयी, तदनन्तर रात्रिके प्रथम प्रहरमें जगनेपर वह भूखसे बहुत पीड़ित हुई। तब वह भिक्षा माँगनेके लिये [संकष्टचतुर्थीका] व्रत करनेवालेके घर गयी। उस (व्रती)-ने उसे (चाण्डालीको) जो अन्न दिया, उसे उसने चन्द्रमाके उदय होनेके बाद खाया॥ २४-२५॥ दैवयोगसे भोजन करते समय स्वेच्छासे ही उसके मुखसे 'गणेश'-ऐसा उच्चारित हुआ, तभी [अन्तकालमें] गणाधिपति गणेशजीने [इसे लानेके लिये] यह सुन्दर विमान भेजा है॥ २६॥ ब्रह्माजी कहते हैं-[हे व्यासजी!] देवदूतोंका वचन सुनकर राजाके दूतोंने उन्हें नमस्कार करके पुनः कहा-॥ २६ १/२॥ राजदूत बोले-[हे देवदूतो!] हम कार्यकर्त्ताओंने यह अत्यन्त अद्भुत घटना देखी॥ २७॥ राजाने हमें जो आज्ञा दी है, उसे सुनिये-इन्द्र एक श्रेष्ठ विमानमें बैठकर देवताओंके साथ गृत्समदको देखनेके लिये आये थे। वहींसे वे भृशुण्डिके पास आये। उन्हें देखकर [इन्द्रने उनको] प्रणामकर भली प्रकारसे पूजन किया तथा उनसे पूजा ग्रहणकर एवं उनकी अनुमति ले वे अपनी पुरीको चल दिये। गमन करता हुआ उनका विमान कुष्ठग्रस्त [पापी] वैश्यपुत्रकी दृष्टि पड़ते ही उसी क्षण