श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 227, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०७५ ] * राजा शूरसेनका संकटचतुर्थीव्रत करना * २२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] व्रतहेतु समस्त आवश्यक सामग्रीका संग्रह किया और उत्तम चतुर्थी व्रतको करनेकी इच्छासे प्रातः स्नानकर नित्यकर्मका समापन किया ॥ ४-५ ॥ तत्पश्चात गणेशजीका पूजन और स्वस्तिवाचन करके, श्रेष्ठ द्विजों और वसिष्ठजीका पूजनकर और उनकी अनुज्ञा लेकर गणेशजीको मनमें धारण करके उनके नाम-जपमें तत्पर हो गये और वे पैरके एक अँगूठेपर तबतक स्थित रहे, जबतक कि सूर्य अस्त [नहीं] हुआ ॥ ६-७ ॥ तदनन्तर पुनः स्नानके बाद [राजाने] सायं सन्ध्योपासना की और वसिष्ठजीके सहित [गणेशजीका] पूजन करना प्रारम्भ किया ॥ ८ ॥ [राजाने] केलेके खम्भोंसे सुसज्जित एक विशाल मण्डपिकाका निर्माण कराकर उसे अनेक प्रकारके वस्त्रों और अलंकारोंसे समन्वित तथा छत्र एवं चामरसे सुशोभित कराया। वह महामण्डपिका पुष्पमालाओंसे विभूषित अनेक प्रकाशमान मणियोंसे युक्त, दीपावलियोंसे सुशोभित और दर्पणोंकी पंक्तिके कारण मनोहर लग रही थी ॥ ९-१० ॥ उस महामण्डपिकाके मध्यभागमें सोनेके कलशपर गजानन गणेशजीकी सर्वांगसुन्दर सुवर्णनिर्मित सुन्दर प्रतिमा स्थापित करके उसे अनेक अलंकारोंसे सुसज्जित और अनेक रत्नोंसे विभूषित किया। उस समय श्रेष्ठ द्विजगण [वेद-] पाठ कर रहे थे और गायक [भगवान् गणपतिका] गुणगान कर रहे थे ॥ ११-१२ ॥ राजाने तुरही आदि सभी प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि और नर्तकोंके नृत्यके मध्य वैदिक एवं पौराणिक मन्त्रोंसे उस मूर्तिका सम्यक् प्रकारसे पूजन किया ॥ १३ ॥ उन्होंने पंचामृतसे उस गणेशमूर्तिको स्नान कराते हुए षोडशोपचार पूजन किया। मोदक, पुआ, लड्डू, शर्करायुक्त खीर, पंचामृतसहित अनेक प्रकारके व्यंजनोंसे सुशोभित नैवेद्य एवं सुगन्धयुक्त जलको उस गजाननमूर्तिके सम्मुख रखकर गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये राजाने उन्हें समर्पित किया। तदनन्तर उन्होंने अनेक प्रकारके फल, सुपारीयुक्त पान, रत्न और स्वर्णकी दक्षिणा तथा
[दायाँ स्तम्भ] दूर्वा अर्पित करके आरती की और नाना प्रकारके पुष्पोंसे मन्त्रपुष्पांजलि दी। तत्पश्चात् चतुर्थी तिथि, गणेशजी और चन्द्रमाके लिये अर्घ्य प्रदान किया ॥ १४-१७ ॥ तदनन्तर उन्होंने आदरपूर्वक ब्राह्मणोंका पूजन किया और उन्हें भोजन कराया तथा उन्हें वस्त्र, अलंकार और दक्षिणासहित दस हजार गायें प्रदान कीं ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् सुहृज्जनों और बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वयं राजाने भोजन किया। रात्रिमें उन्होंने गणेशजीसे सम्बन्धित कथाओं और वाद्य-ध्वनिके साथ उनके गुणगानका श्रवण करते हुए जागरण किया ॥ १९ ॥ प्रभातकालमें निर्मल जलमें स्नानकर राजाने पहलेकी भाँति पुनः सम्यक् प्रकारसे पूजनकर गणेशजीकी उस मूर्तिको दक्षिणा एवं उपस्करोंसहित वसिष्ठजीको प्रदान किया। इससे गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने सभी प्रकारकी सम्पत्तियोंसे युक्त विमान भेज दिया ॥ २०-२१ ॥ गजाननके स्वरूपवाले गणेशजीके दूतोंने वहाँ ले जाकर उस विमानको स्थापित किया। वह विमान देखनेवाले सभी लोगोंके मनको आनन्दित कर रहा था ॥ २२ ॥ राजा जब गणेशचतुर्थीव्रतके पुण्यप्रभावसे देव- लोकके लिये जाने लगे, उस समय अनेक प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित और सिरपर मुकुट धारण किये हुए गणेशजीके स्वरूपवाले देवदूतोंने उनसे कहा कि [आपके द्वारा किये गये इस व्रतसे] गणेशजी प्रसन्न हुए हैं, उन्होंने आपके दर्शनकी उत्सुकताके कारण यह विमान भेजा है, तभी हम लोग यहाँ आये हैं, उनके इस प्रकारके वचन सुनकर राजा [गणेशजीकी कृपाका स्मरणकर] अश्रुपात करने लगे ॥ २३-२५ ॥ उस समय उनका गला भर आया और शरीर रोमांचित हो उठा। तदनन्तर राजा शूरसेनने आश्चर्यचकित होते हुए उनसे कहा- ॥ २६ ॥ हे दूतो ! अव्यक्त, अप्रमेय, नित्य, वाणी और मनसे भी अगोचर जगदीश्वरको मेरे दर्शनका कोई हेतु नहीं है। जिनका निरूपण करनेमें वेद और शास्त्र भी समर्थ नहीं हैं, ब्रह्मा और शंकर आदि देवगण जिनका निरन्तर स्मरण करते हैं। उन्होंने मेरा स्मरण किया-यह मेरा