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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 656 में से

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पृष्ठ 228

२२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] महान् भाग्य है। राजाकी यह बात सुनकर दूतोंने पुनः उनसे कहा- ॥ २७-२९ ॥ हे राजन्! हम भक्तोंकी महिमाको नहीं जानते, जिनके कारण वे निर्गुण-निराकार परमात्मा साकार होते हैं॥ ३०॥ राजा बोले-देवाधिदेव गणेशजी और आप सबके प्रसन्न होनेपर मेरी एक महती इच्छा यह है कि मैं अपनी नगरीको छोड़कर गणेशजीके पास कैसे जाऊँ? इन लोगोंके बिना तो मैंने कभी हलाहल विषका भी भक्षण नहीं किया है, तो हे निष्पाप [दूतो]! इन सबको साथ लिये बिना मैं परमानन्दका भोग कैसे कर सकता हूँ? ॥ ३१-३२ ॥ तब उन [गणपति] दूतोंने पुनः कहा कि तुम्हारी इच्छा पूरी होनी चाहिये, नहीं तो गणेशजी हम सभीको क्रोधपूर्वक दण्डित करेंगे ॥ ३३ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] हे ब्रह्मन्! तदनन्तर उन्होंने चारों वर्णोंके सभी लोगों और सभी प्राणियोंको ले जानेके लिये क्षणभरमें विमानमें बैठा लिया। वे सभी दिव्य वस्त्र धारण किये हुए थे और सभी दिव्य अलंकारोंसे सुशोभित थे। वे सब आपसमें कहने लगे कि 'यह कैसी महान् अद्भुत घटना है, हम लोगोंने तो कोई पुण्य किया नहीं, फिर यह विमान कैसे ?' ॥ ३४-३५॥ [उस विमानमें बैठे] अन्य लोग कहने लगे कि यह सब राजाके पुण्य-प्रतापसे हुआ है, जैसे पारसके

[दायाँ स्तम्भ] स्पर्शसे धातुमात्र सुवर्ण हो जाती है ॥ ३६ ॥ जैसे अत्यन्त पापी भी साधु पुरुषके वचनसे सिद्धि प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार राजाके पुण्यसे हम सबका सम्यक् उद्धार हुआ है। तदनन्तर गणेशजीके दूतोंने विमानको ऊर्ध्व गति दी, परंतु वह जड़ीभूत हो गया और पृथ्वीतलसे ऊपर नहीं उठा ॥ ३७-३८ ॥ तब तो सभी लोग इस विषयमें संशयग्रस्त हो गये कि यह कैसे अन्तरिक्षमें जायगा और वे आपसमें कहने लगे कि [हम] भाग्यहीनोंको निधि कैसे प्राप्त होगी? भिक्षापात्र महत्तर छींकेपर कैसे चढ़ सकता है? [यह कहते हुए लोगोंके] सब ओर देखनेपर कोई [महापापी] कुष्ठरोगी दिखायी पड़ा। तब किसीने राजासे कहा कि आप इस कुष्ठीका त्याग करें। इसके नीचे उतरनेपर यान ऊर्ध्व गति करेगा (उड़ान भरेगा) ॥ ३९-४१ ॥ उस कुष्ठीको त्यागनेकी इच्छावाले उन दूतोंसे शूरसेनने कहा- 'मैं पापी और त्याज्य हूँ न कि ये सब; इन्हें आप ले जायें अथवा इस कुष्ठीके पूर्वजन्ममें किये पापको कहिये। आप सब सब कुछ जाननेवाले हैं, मेरे प्रति आप सबका स्नेह है, अतः कृपा करके [विमानके उड़नेका] उपाय बतलायें ॥ ४२-४३ ॥ दूतोंने कहा- हे नृप ! आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये, हम आपको इस कुष्ठीके [पूर्व-] जन्मके पाप, दुष्कर्म तथा [विमानके उड़नेका] उपाय भी बतायेंगे ॥ ४४॥


॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शूरसेनकृत संकटचतुर्थीव्रताचरणका वर्णन' नामक पचहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७५ ॥

छिहत्तरवाँ अध्याय श्रीगणेशजीके चार अक्षरवाले 'गजानन' नाम-मन्त्रके माहात्म्यमें ब्राह्मण-पुत्र बुधका आख्यान, शापवश वैश्यकुलमें उत्पन्न बुधका कुष्ठी होना और 'गजानन' नाम-मन्त्रके श्रवणसे उसे विनायकधामकी प्राप्ति


[बायाँ स्तम्भ] दूत बोले-प्राचीनकालकी बात है, गौड़ देशके गौड़ नामक नगरमें [दूर्व नामक] एक ब्राह्मण निवास करता था। वह तपस्वी, ज्ञानी, बुद्धिमान् तथा देवता और ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाला था ॥ १ ॥ उसका ही यह पुत्र उत्पन्न हुआ था। इसकी

[दायाँ स्तम्भ] माताका नाम शाकिनी तथा पत्नीका नाम सावित्री था, जो सावित्रीके समान पतिव्रता थी ॥ २ ॥ माता-पिताका अकेला पुत्र होनेके कारण उनके स्नेहवश वह अनेक आभूषणोंसे अलंकृत रहता था। वह अत्यन्त सुन्दर था और रतिके स्वामी कामदेवके समान