श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 229, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०७६] * श्रीगणेशजीके 'गजानन' नाम-मन्त्रके माहात्म्यमें ब्राह्मण-पुत्र बुधका आख्यान * २२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सुशोभित होता था॥ ३॥ उसके माता-पिता एक क्षणके लिये भी उसका वियोग नहीं चाहते थे। जब वह युवावस्थाको प्राप्त हुआ तो अपनी उस भार्याका परित्यागकर वह नित्य ही परायी स्त्रीमें निरत रहने लगा। वह दूसरेकी निन्दामें परायण, पापकर्ममें निरत तथा पिता-माताकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाला हो गया॥ ४-५॥ एक दिनकी बात है, उस गौड़नगरमें पुरुषोंको मोहित करनेवाली एक वेश्या आयी। उस वेश्याके प्रति आसक्त मनवाले उसने जो किया, उसे तुम सुनो॥ ६॥ उसने अपने माता-पिताके समक्ष ही अपने आभूषणोंको बलपूर्वक उतारकर एक पेटिकामें रखा और फिर छिपकर उन आभूषणोंको उस वेश्याको प्रदानकर उसने बहुत समयतक उसके साथ रमण किया। वह सुगन्धित द्रव्योंका अनुलेपनकर सभी ऐन्द्रिय विषयोंका परित्यागकर केवल उसीमें उसी प्रकार निष्ठावान् हो गया, जैसे कि एक योगी ब्रह्मपरायण हो जाता है। वह कामाग्निसे उसी प्रकार विह्वल हो गया, जैसे मद्यपानके प्रभावसे व्यक्ति मतवाला हो जाता है॥ ७-९॥ अत्यन्त दुखी तथा भूख-प्यासकी परवाह किये बिना उसका पिता नगरके प्रत्येक घरमें अपने पुत्रको खोजने लगा॥ १०॥ पुत्रके कहीं नहीं दिखायी पड़नेपर उसका पिता लम्बी-लम्बी साँस लेता हुआ आधी रातमें घर पहुँचा और अपनी पत्नीसे बोला- 'हमारा पुत्र बुध न जाने कहाँ चला गया। उस पुत्रके बिना हमारा घर वैसे ही व्यर्थ हो गया है जैसे दीपकके बिना रात्रि, जलके बिना बावड़ी और सन्तानके बिना स्त्री निरर्थक हो जाती है। हमारे प्राणोंकी रक्षा करनेवाले उसका दर्शन अब हमें कब होगा?'॥ ११-१२१/२॥ शाकिनी बोली- मैं भूख तथा प्याससे अत्यन्त व्याकुल और चिन्ता तथा शोकसे ग्रस्त हो गयी हूँ, हे नाथ! न जाने हमारा वह प्रिय पुत्र कहाँ चला गया है, यदि मुझे उसका दर्शन हो जाय, तभी मैं जीवित रहूँगी अन्यथा मैं मृत्युको प्राप्त हो जाऊँगी॥ १३-१४॥ [तब] वह दूर्व नामक ब्राह्मण हाथमें लाठी लेकर पुनः अपने पुत्रको ढूँढ़ने निकल पड़ा। रास्तेमें जिस- जिसको वह देखता, उस-उससे अपने पुत्रके विषयमें पूछता जाता था॥ १५॥ जब वह अत्यन्त थक गया और भूखसे व्याकुल हो उठा तो उसे चक्कर आने लगा, उसी समय उसे अन्त्यवर्णमें उत्पन्न एक अत्यन्त वृद्ध तथा महाभयंकर भीम नामवाला पुरुष दिखायी पड़ा, उसने [जब] उससे [भी] अपने पुत्रके विषयमें पूछा तो उसने अत्यन्त स्पष्ट शब्दोंमें उत्तर दिया॥ १६॥ भीम बोला- बुध नामक तुम्हारा वह बुद्धिमान् पुत्र वेश्याके घरमें है और वह कामासक्त होकर सुखपूर्वक क्रीड़ा कर रहा है। इस संसारमें कौन किसका पुत्र है, कौन माता है तथा कौन पिता है? अर्थात् कोई किसीका नहीं है। हे द्विजश्रेष्ठ! तुम व्यर्थ ही कष्ट उठा रहे हो॥ १७॥ दूर्व बोला- मेरा पुत्र बुध कैसे वेश्यामें आसक्त हो गया? तब वह शीघ्र ही उस वेश्याके घर गया, और वहाँ उसने अपने उस पुत्रको देखा॥ १८॥ वह अत्यन्त मदोन्मत्त था, मदिराका सेवन करनेसे उसकी आँखें लाल-लाल थीं और वह नशेमें चूर था, पिताने हाथ पकड़कर उसे उठाया तथा क्रुद्ध होकर उस पुत्रको डाँटा- 'अरे दुष्ट! तुमसे तो यह काँटेवाला वृक्ष अच्छा है अथवा यह पत्थर अच्छा है, तुम प्राणोंका परित्याग क्यों नहीं कर देते ? तुम्हारे जीवित रहनेसे क्या लाभ?' ॥ १९-२०॥ ब्रह्माजी बोले- पिताका वचन सुनकर वह बुध नामक पुत्र क्रोधाविष्ट हो गया और उसने पिताके मुखपर चाँटा मार दिया॥ २१॥ उसने कहा- 'अरे नराधम ! कृमि-कीट आदि भी जिसमें मनुष्योंके समान ही सुख मानते हैं, उस रति- क्रीड़ाके समय तुमने मेरे सुखमें बाधा क्यों पहुँचायी? अथवा मेरे ऊपर अकस्मात् कौएकी विष्ठा कैसे गिर पड़ी?' - ऐसा कहकर उसने पुनः पितापर लातसे प्रहार किया और उसके प्राणोंको हर लिया॥ २२-२३॥