श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- पिताके द्वारा प्राण त्याग दिये जानेपर वह 'हर- ईश्वर' ऐसा कहने लगा। [अपनी इच्छापूर्तिमें पिताको कण्टकरूप माननेके कारण] वह पुत्र प्रसन्न हो गया। पाँवोंमें रस्सी बाँधकर उसने उसे दूर फेंक दिया ॥ २४ ॥ मदिरापान करके पुनः उसने उस वेश्याके साथ यथेच्छ रमण किया। प्रातःकाल होनेपर वह अपने घर गया और तब माताने उसे देखा ॥ २५ ॥ उसने हर्षपूर्वक पुत्रको अपने हृदयसे लगाया और स्नेहवश उसके स्तनोंसे दूध निकलने लगा। वह बोली- 'तुम कहाँ चले गये थे, कहाँ ठहरे हुए थे, वहाँ तुमने क्या किया? हे वत्स! यह सब तुम मुझे विस्तारसे बतलाओ, तुम्हारे पिता अत्यन्त दुखी हैं। मैं भी निराहार और निर्जल होकर रातभर जागती रही हूँ ॥ २६-२७॥ हे वत्स ! मैं यहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी और तुम्हारे पिता तुम्हें खोजनेके लिये बहुत समयसे गये हुए हैं, अब तुम अपने पिताको खोजनेके लिये जाओ'- ऐसा वह बार-बार कहने लगी। इसके द्वारा मुझे आज्ञा दी जा रही है-ऐसा समझकर वह पुत्र क्रुद्ध हो उठा और उसने एक सूखी लकड़ीसे उसके सिरपर प्रहार किया, जिससे वह भूमिपर गिर पड़ी ॥ २८-२९ ॥ उसको चेतनाशून्य जानकर उसने उसके [भी] पाँवोंमें रस्सी बाँधकर उसे घरसे बाहर फेंक दिया और स्वयं वेश्याके घरमें जाकर अत्यन्त प्रसन्न होकर काम- क्रीड़ामें निरत हो गया ॥ ३० ॥ सज्जन पुरुषोंने अपने-अपने घरसे काष्ठ ले जाकर उस ब्राह्मण-दम्पतीका दाह-संस्कार किया। दण्डनीय होनेपर भी ब्राह्मण होनेके कारण राजाने उस द्विजाधमको दण्डित नहीं किया। पुनः घरमें आये हुए उससे उसकी पत्नी धीरे-धीरे बोली ॥ ३१ १/२ ॥ सावित्री बोली- हे प्राणनाथ! हे महामते! मैं एक बात कहती हूँ, उसे आप सुनें ॥ ३२ ॥ आपका जन्म अत्यन्त प्रसिद्ध तथा अत्यन्त पवित्र ब्राह्मणकुलमें हुआ है, किंतु आपका आचरण सर्वथा उसके विरुद्ध दिखायी देता है, अतः उस दुराचारका आपको विवेकपूर्वक परित्याग कर देना चाहिये ॥ ३३ ॥ इस लोकमें वही कार्य करना चाहिये, जिससे परलोकमें सुख प्राप्त हो। [वृद्धावस्थासे] पूर्वकी अवस्था अर्थात् युवावस्थामें ऐसा करना चाहिये, जिससे कि वृद्धावस्थामें सुख प्राप्त हो ॥ ३४ ॥ [वर्षभरमें] आठ मासतक वह कर्म करना चाहिये, जिससे कि वर्षाकालमें सुख प्राप्त हो और दिनमें वही कार्य करना चाहिये, जिससे रातमें सुख प्राप्त हो सके। पिताके प्रिय होने तथा ब्राह्मण होनेके कारण राजा भी आपको क्षमा कर दे रहे हैं; सर्वाङ्गसम्पूर्ण, अत्यन्त सुन्दर तथा आपके मनके अनुसार चलनेवाली मुझ धर्मपत्नीको छोड़कर आप क्यों उस वेश्यामें आसक्त हैं? लोकमें सर्वत्र आपकी निन्दा हो रही है, किंतु आपके भयसे आपको कोई कुछ नहीं कहता ॥ ३५-३७ ॥ वे सभी लोग मुझसे कहते हैं, हे शुभे ! तुम्हारा पति कैसा है? तब लज्जाके मारे मुँह नीचे करके मैं उसी क्षण अपना प्राण त्याग करना चाहती हूँ ॥ ३८ ॥ हे स्वामिन्! यदि आप अहर्निश मेरे साथ यथेष्ट रमण करें तो आपसे कोई कुछ भी नहीं कहेगा और आपको महान् पाप भी नहीं लगेगा ॥ ३९ ॥ यदि आप इसमें हित समझें तो विवेकपूर्वक उस वेश्याका परित्यागकर मेरे वचनका पालन करें। विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि वह अज्ञानमें किये गये अथवा प्रमादवश किये गये कर्मका सर्वथा परित्याग कर दे ॥ ४० ॥ [मनुष्यको] निश्चय करना चाहिये कि यह जो [प्रिय अथवा अप्रिय परिणाम उपस्थित] है, वह मेरे ही कर्मका परिणाम है। यदि मैंने अपना इष्टसाधन नहीं किया, तो मेरा अनिष्ट होना सर्वथा निश्चित है, इसलिये जो इष्ट न हो, वैसे परिणामका जनक कार्य नहीं करना चाहिये ॥ ४१ ॥ इसके विपरीत कर्म करनेपर पुरुषको न तो इस लोकमें सुख मिलता है और न परलोकमें ही। अपनी स्त्रीके द्वारा कहे गये इस प्रकारके वचनरूपी बाणोंसे विद्ध हुए मर्मस्थलवाला महान् क्रूर वह बुध अत्यन्त रोषमें भर गया और जलता हुआ-सा बोला ॥ ४२ १/२ ॥ बुध बोला- अरी निर्लज्ज ! निष्ठुर ! प्रगल्भ !