श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 231, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०७६] * श्रीगणेशजीके 'गजानन' नाम-मन्त्रके माहात्म्यमें ब्राह्मण-पुत्र बुधका आख्यान * २२९ दुष्टे! मुझपर स्पष्ट रूपसे रुष्ट हुई तुम भी उसी | कोई भी व्यक्ति कहीं भी तुम्हारा नामतक नहीं लेगा ॥ ५२- गतिको प्राप्त होओगी, जो गति मेरे माता-पिताकी हुई | ५४॥ है ॥ ४३१/२ ॥ | ब्रह्माजी बोले- तब भयभीत हुआ वह बुध पुनः सावित्री बोली- जिसने अनुकूल शिक्षा देनेवाले | वेश्याके घर चला गया और वहाँ सुरापान करके कुछ तथा स्वतन्त्र अपने माता-पिताकी मर्यादाका पालन नहीं | भी चिन्ता न करते हुए उसने उसके साथ रमण किया। किया, तो फिर विपरीत बोलनेवाली मुझ स्त्रीकी रक्षा | इस प्रकारके उसके दुष्कर्मोंका मैं कैसे वर्णन करूँ; करनेवाला वह कैसे हो सकता है ? पतिव्रता स्त्रीके लिये | क्योंकि जो दूसरेके दोषोंका बखान करता है, उसके तो पतिके हाथोंसे मृत्यु प्राप्त करना भी इस लोक तथा | पुण्यका क्षय हो जाता है ॥ ५५-५६ ॥ परलोकमें कल्याणकारक है ॥ ४४-४५ ॥ | समय आनेपर वह मृत्युको प्राप्त हुआ और यमदूत ऐसा कहती हुई उस अपनी पत्नीके बालोंकी | उसको यमराजके यहाँ ले गये। यमराजने (दूतोंसे) कहा- चोटीको उसने सहसा पकड़ लिया और लकड़ी, ढेलों, | इसे यहाँ क्यों लाये हो, इसे सीधे नरकमें ले जाओ। मुष्टियों तथा पत्थरोंसे वह उसे पीटने लगा ॥ ४६ ॥ | यमराजका वचन सुनकर दूत उसी समय उसे ले गये और उस स्त्रीने पूर्वजन्मके पुण्यके प्रभावसे पतिरूपमें | प्रलयपर्यन्तके लिये उसे नरकमें डाल दिया ॥ ५७-५८ ॥ भगवान् श्रीरामका स्मरण किया और उसके द्वारा | नारकीय यातना भोग लेनेके अनन्तर उसने वैश्यके मर्मस्थानोंमें चोट किये जानेके कारण उसने सहसा | घरमें जन्म लिया और ऋषिपत्नीके शापसे वह महान् प्राणोंका परित्याग कर दिया। दिव्य देह धारणकर स्वर्गमें | कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो गया। जो पिता-माता, स्त्रीका वध जाकर उसने परम सुखका उपभोग किया। इधर उसे मरा | करनेवाला है, सुरापान करनेवाला है तथा गुरुपत्नीके जानकर उसके पतिने रात्रिमें उसके पैरोंको खींचकर दूर | साथ गमन करनेवाला है, उसका स्पर्शमात्र हो जानेपर ले जाकर फेंक दिया ॥ ४७-४८ ॥ | वस्त्रोंसहित स्नान करना चाहिये ॥ ५९-६० ॥ तब निरंकुश हो अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो, वह | ऐसे प्राणीका नाम भी नहीं लेना चाहिये; क्योंकि उस वेश्याके साथ रमण करने लगा। वह बुध उससे | इससे महान् दोष होता है। इस प्रकारके इस पापात्माको कहने लगा कि तुम्हारे लिये ही मैंने अपने माता-पिता | हम इधर छोड़ देंगे तो यह विमान ऊपरको उड़ चलेगा, और पत्नी सभीको मार डाला है ॥ ४९ ॥ | इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ६११/२ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर वह बुध कालभि | ब्रह्माजी बोले- उन देवदूतोंका इस प्रकारका नामक मुनिके घर गया। उस समय कालभिमुनिके | वचन सुनकर राजा शूरसेन अत्यन्त कम्पित हो उठे और स्नानके लिये गये हुए होनेपर उस दुष्टने मुनिकी भार्याके | उनसे बोले कि मुझे इसके दुष्कर्मोंका ज्ञान नहीं था। बालोंको पकड़ लिया ॥ ५० ॥ | तदनन्तर अत्यन्त व्याकुल हुए राजा शूरसेनने पुनः उसने अत्यन्त रमणीय मुनिपत्नीके साथ कामुक चेष्टाएँ | उठकर उन देवदूतोंको प्रणाम किया और उनसे कहा- कीं। तदनन्तर उस स्त्रीने उसे शाप दे दिया ॥ ५११/२ ॥ | 'आप मेरे ऊपर कृपा करके इस पापीके सभी दोष- सुलभा बोली- मेरे माता-पिताने मेरा यह | पापोंको दूर करनेका उपाय मुझे बतायें' ॥ ६२-६४ ॥ 'सुलभा' दुष्ट नाम क्यों रखा? हे दुष्टबुद्धि ! हे नराधम ! | दूत बोले- हे राजन् ! हे नृपश्रेष्ठ ! उठिये! मैं तुम्हारे लिये सुलभ अर्थात् सरलतासे प्राप्त हो गयी | उठिये, हम इसके पापोंके विनाशका उपाय बताते हैं, हूँ। मेरे पति कालभि नामक मुनिश्रेष्ठ जब स्नान करने | आप एकाग्रचित्त होकर उसका श्रवण करें ॥ ६५ ॥ गये हुए थे, तब तुमने मेरे साथ बलपूर्वक दुराचार किया, | गणेशजीका जो चार अक्षरवाला प्रसिद्ध नाम है, अतः जाओ, तुम कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो जाओगे, जन्मान्तरमें | उसका आप इसके कानमें जप करें, इससे सभी दोष-