श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०७७] * श्रीपरशुरामजीके आविर्भावके प्रसंगमें महर्षि जमदग्निका आख्यान * २३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जमदग्निके द्वारा इन परशुरामका प्रादुर्भाव हुआ, जो साक्षात् योगेश्वर विष्णुके समान हैं॥ ९॥ वे अत्यन्त सुन्दर शरीरवाले तथा साक्षात् कामदेवके मनको भी मथ देनेवाले थे। वे माता-पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले थे, उनका बल-पराक्रम अत्यन्त विख्यात था। वे देवता, ब्राह्मण, गुरु, विद्वान्, गौ आदिके पूजनमें निरत रहते थे। वेदों, वेदांगों (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द तथा ज्योतिष) तथा स्मृतियोंका स्वाध्याय वे सदा किया करते थे ॥ १०-११ ॥ वे बोलनेमें बृहस्पतिके समान, क्षमामें पृथ्वीके समान, गाम्भीर्यमें समुद्रके समान थे और माता-पिताकी आज्ञाका पालन करनेमें तत्पर रहते थे। अनेक विद्याओंके अध्ययनके लिये अत्यन्त दृढमति होकर माता-पिताकी आज्ञा लेकर वे नैमिषारण्यमें चले आये ॥ १२-१३ ॥ उनके नैमिषारण्यमें चले जानेपर उस समय कृतवीर्यके पुत्र महान् बलशाली राजा कार्तवीर्य वहाँ आये। उनके तेजके प्रभावसे समस्त भूमण्डल सदाके लिये उनके वशीभूत हो गया था ॥ १४ ॥ भगवान् विष्णुके अंशावतार तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले उन राजा कार्तवीर्यके पास लक्ष्मी स्थिर रूपसे निवास करती थी। वे युद्धमें शत्रुओंका विनाश करनेवाले पाँच सौ बाणोंको एक साथ छोड़ते थे ॥ १५ ॥ उनका बल तथा पौरुष अत्यन्त विख्यात था। इन्द्रादि देवता उनकी सेवामें उपस्थित रहते थे। उनके पास असंख्य हाथी, रथ, घोड़े तथा पैदल सैनिक थे। युद्धके लिये प्रस्थान करते समय उनकी सेनाके द्वारा समस्त पृथ्वीमण्डल उसी प्रकार आच्छादित हो जाता था, जिस प्रकार कि वर्षाकालमें मेघमण्डलकी धाराओंद्वारा समस्त नभमण्डल आच्छादित हो जाता है ॥ १६-१७ ॥ उनके शंखनादका श्रवणकर शत्रु उसी प्रकार दसों दिशाओंमें भाग जाते, जैसे कि सिंहनादको सुनकर करोड़ों मदोन्मत्त हाथी भाग जाते हैं ॥ १८ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! जब वे राजा (अपने हजार हाथोंसे) स्वेच्छापूर्वक पाँच सौ ताली बजाते, तो उसके निनादसे घोषपूर्ण समस्त ब्रह्माण्ड काँप उठता ॥ १९ ॥ एकबार वे राजा स्वेच्छापूर्वक अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर [वन-विहारको] निकले। उस समय वे नीले रंगके वस्त्र धारण किये हुए थे, उनका छत्र भी नीले रंगका था तथा उनके सैनिक भी उन्हींकी भाँति नीले वस्त्र धारण किये थे। वे वनों, नदियों, पर्वतोंको रौंदते हुए, विविध प्रकारके मृगगणोंको देखते हुए तथा कुछका शिकार करते हुए जा रहे थे। तदनन्तर सह्याद्रिके शिखरपर उन्होंने एक श्रेष्ठ आश्रमको देखा। वह आश्रम उसी प्रकारका था, जैसे कि कैलासशिखरपर भगवान् शंकरका आवास- स्थान हो। राजाने अपने सेवकोंसे पूछा- 'यह उत्तम स्थान किसका है?' ॥ २०-२२ १/२ ॥ सेवक बोला- हे महाभाग! यहाँ प्रसिद्ध जमदग्नि मुनि निवास करते हैं। वे साक्षात् सूर्यके समान [तेजस्वी] हैं तथा शाप और कृपा करनेमें समर्थ हैं। उनके दर्शनसे करोड़ों पापराशियाँ विनष्ट हो जाती हैं। यदि आपकी इच्छा है तो वहाँ जाना चाहिये, आपको अवश्य दर्शन होंगे। आपकी कृपासे हम सभीका भी कल्याण हो जायगा ॥ २३-२४ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- सेवकका इस प्रकारका वचन सुनकर राजा वहाँ जानेके लिये उद्यत हो गये, उन्होंने अपनी सम्पूर्ण सेनाको मना कर दिया और [चार] श्रेष्ठजनोंको साथ लेकर वे तत्क्षण ही तपोनिधि मुनिश्रेष्ठ जमदग्निके आश्रमके लिये गये ॥ २५-२६ ॥ राजाने कुशके आसनपर विराजमान उन मुनिको देखा, जो प्रज्वलित अग्निकी भाँति दिखायी दे रहे थे। राजाने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया तथा साथमें आये सभी सैनिकों आदिने भी उन्हें प्रणाम किया ॥ २७ ॥ अनेक विशाल पर्णशालाओं, लताकुंजों तथा वृक्षोंकी छायामें वे सैनिक बैठ गये और राजा मुनिके समक्ष स्थित हो गये। कृतवीर्यके पुत्र महान् पराक्रमी राजा कार्तवीर्य चार [श्रेष्ठजनों]-से घिरे मुनिवर जमदग्निद्वारा निर्दिष्ट आसनपर बैठ गये ॥ २८-२९ ॥ मुनि जमदग्निने पाद्य, अर्घ्य तथा विष्टर (आसनके प्रतीकरूपमें कुशमुष्टि) प्रदानकर उन सभीका सत्कार किया और गायें भी प्रदान कीं तथा शिष्योंद्वारा अन्य