भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 656 में से

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पृष्ठ 234

२३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

(बायाँ स्तम्भ) सभी सैनिकोंका स्वागत-सत्कार करवाया ॥ ३० ॥ तदनन्तर आखेटसे परिश्रान्त हुए सभी सैनिकोंने विविध सरोवरोंके अत्यन्त रमणीय, शीतल तथा निर्मल जलमें डुबकी लगाते हुए स्नान किया ॥ ३१ ॥ मुनि जमदग्निके शिष्योंद्वारा निनादित की जाती हुई वेदध्वनि, शास्त्रोंके बहुत-से शब्दों तथा चारों ओर हो रहे शास्त्रार्थके वचनोंको सुनते हुए कमलनयन राजाने उन मुनिश्रेष्ठ जमदग्निसे कहा—'आज मेरे माता-पिता धन्य हो गये हैं; आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया, मेरा ज्ञान धन्य हो गया तथा मेरी तपस्या फलीभूत हो गयी ॥ ३२-३३ ॥ आज [मेरे द्वारा लगाया गया] पुण्यरूपी वृक्ष फलित हो गया, जो कि मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ। आज मेरी समस्त सम्पदा धन्य हो गयी। मेरा कुल तथा मेरी कीर्ति भी धन्य हो गयी। परब्रह्म परमात्मा जिसे कहा गया है, निश्चय ही आप वही हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। आपका इस प्रकारका आतिथ्य-सत्कार देखकर मेरा मन अत्यन्त सन्तुष्ट हो गया है' ॥ ३४-३५ ॥ इस प्रकारकी सुसंस्कृत वाणीको सुनकर वे मुनि अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गये और सब कुछ जानते हुए भी मुनिवर मुस्करा उठे और उन्होंने राजासे पूछा—आप कौन हैं? किसके पुत्र हैं? आपका क्या नाम है, और किस प्रयोजनसे आप यहाँ आये हैं? ॥ ३६१/२ ॥ राजा बोले—स्वधर्मका पालन करनेवाले राजाओंके लिये आप-जैसे महापुरुषोंके दर्शनके अतिरिक्त कोई दूसरा महान् प्रयोजन नहीं हो सकता। मैं राजा कृतवीर्यका पुत्र हूँ और कार्तवीर्य इस नामसे विख्यात हूँ। आपकी आज्ञा प्राप्तकर मैं अपने नगरकी ओर लौट जाऊँगा ॥ ३७-३८१/२ ॥ मुनि बोले—हे राजश्रेष्ठ! मैंने आपके महान् यशका श्रवण किया है। मुझे भी आपके दर्शनकी इच्छा थी, आज महान् पुण्यसे वह सफल भी हो गयी है। मेरी देह, आत्मा, तपस्या, ज्ञान तथा यह मेरा आश्रम आज सफल हो गया है। हे राजन्! आज आपके आगमनसे मेरी समस्त सम्पदाएँ सार्थक हो गयी हैं, आप कुछ भोजन

(दायाँ स्तम्भ) किये बिना कैसे जानेकी इच्छा करते हैं? ॥ ३९-४१ ॥ यद्यपि आपको कोई कमी नहीं है, फिर भी आपके द्वारा भोजन करनेसे लोकमें मेरी कीर्ति होगी। हे विभो! कुछ भोजन करनेके अनन्तर आप जायँ, हे प्रभो! आज आप मुझे सनाथ बनायें ॥ ४२ ॥ राजा बोले—निश्चित ही यह भोजन करनेका समय है, आपकी आज्ञासे कुछ भोजन अवश्य करना चाहिये। श्रोत्रिय ब्राह्मणोंके यहाँ यदि अन्नका अभाव हो तो माँगकर भी जल अवश्य पीना चाहिये। तथापि अपने इन असंख्य सैनिकोंको छोड़कर मैं जल भी नहीं पी सकता हूँ, फिर भोजन कैसे कर सकता हूँ? ॥ ४३-४४॥ हे ब्रह्मन्! मैं अनुमानसे यह जानता हूँ कि सभीको भोजन करानेकी शक्ति आपमें नहीं है। आपके दर्शनमात्रसे मैं कृतकृत्य हो गया हूँ और इस समय जाना चाहता हूँ॥ ४५ ॥ मुनि बोले—हे राजर्षे! आप चिन्ता न करें, मैं सम्पूर्ण सेनासहित आपको चार प्रकारके व्यंजनोंसे युक्त (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य तथा चोष्य) भोजन कराऊँगा। तपस्वियोंके लिये क्या असाध्य है? ॥ ४६ ॥ हे प्रभो! यहाँके अतिरिक्त घरमें भी जो आपकी सेना हो, उसे भी बुला लें। आप क्षणभर इस नदीके अत्यन्त रमणीय शुभ तटपर तबतक विश्राम करें, जबतक कि भोजन पक नहीं जाता, फिर आप आश्चर्य हुआ देखेंगे ॥ ४७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—मुनि जमदग्निके उन वचनोंको सुनकर अपने अन्तर्मनमें अत्यन्त आश्चर्यचकित होते हुए कृतवीर्यके पुत्र वे राजा कार्तवीर्य नदीके अत्यन्त सुन्दर तटपर चले गये। इधर जमदग्निजीने अपनी पत्नी रेणुकाको बुलाकर समस्त वृत्तान्त उसे सुनाया ॥ ४८-४९ ॥ उन दोनोंने कामधेनुको बुलाकर क्षणभर उसकी पूजा की और दोनोंने उससे प्रार्थना की कि हे धेनुके! हमारी लज्जाकी रक्षा करना। हे कल्याणि! हमने असंख्य सेनासे समन्वित राजाको भोजनके लिये निमन्त्रित किया है, अतः सेनासहित उस राजाकी रुचिके अनुसार भोजनकी व्यवस्था होनी चाहिये। आप क्षणभरमें ही वैसी व्यवस्था करें। अन्यथा सत्यकी मर्यादा नष्ट हो