भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 656 में से

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पृष्ठ 235

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उ०खं०-अ०७८] * मुनि जमदग्निद्वारा ससैन्य राजा कार्तवीर्यका आतिथ्य * २३३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जायगी और संसारमें हमारा अपयश भी होगा, अतः आप जैसा ठीक समझें, वैसा करें ॥ ५०-५२ ॥ उन दोनोंके द्वारा इस प्रकार प्रार्थित की गयी कामधेनुने अपने प्रभावके द्वारा एक महान् नगरकी रचना की, जो नाना प्रकारके सुन्दर भवनोंसे सुसज्जित था। वह विविध प्रकारके रत्नमय खम्भोंसे सुशोभित था, वहाँ विविध प्रकारके सभागृह बने थे। नाना प्रकारके पुष्पों तथा लताओंसे समन्वित सुन्दर वाटिकाओं और उपवनोंसे वह सुशोभित था ॥ ५३-५४ ॥ वह नगर विविध प्रकारकी ध्वजा-पताकाओंसे मण्डित था तथा अनेक प्रकारके वाद्योंकी ध्वनियोंसे गुंजित हो रहा था। वह स्वर्णके पात्रोंकी विविध पंक्तियोंसे सुशोभित था। चारों प्रकारके व्यंजनोंसे युक्त विविध प्रकारकी पंक्तियोंसे सुसज्जित था। वह नगर विशाल तोरणद्वारोंसे सुशोभित तथा चारों ओर परिखाके घेरेसे युक्त था ॥ ५५-५६ ॥ उस नगरके रमणीय चबूतरे अनेक दास-दासियोंसे समन्वित थे। वहाँ जहाँ-तहाँ स्थित पुरवासी जन आने- जानेवाले लोगोंको इधर-उधर हटा रहे थे और कह रहे थे कि मुनि जमदग्निकी आज्ञा है कि इससे आगे कोई न जाय ॥ ५७१/२॥ वहाँ चारों ओर असंख्य पात्रोंमें भोजन परोसा गया था। वे पात्र दीपोंके प्रकाशसे प्रकाशित हो रहे थे, उनमें विविध प्रकारके व्यंजन परोसे गये थे। पात्रोंमें सूप, खीर, पक्वान्न तथा पंचामृत रखा हुआ था, वे पात्र खाद्य, लेह्य (चाटनेयोग्य), चोष्य (चूसनेयोग्य) तथा विविध प्रकारके पेय पदार्थोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित थे। सामुद्र लवणसे युक्त पका हुआ नीबू, आम, अमृत फल, बिल्व आदि पदार्थ भी उन पात्रोंमें सजाये गये थे ॥ ५८-६०॥ श्रीकामधेनुके महान् कृपाप्रसादके प्रभावसे अन्न- पात्रोंमें पक्वान्नोंके परोस दिये जानेपर कृतवीर्यके पुत्र राजा कार्तवीर्यको उसकी सेनाके साथ भोजन करानेके लिये मुनि जमदग्निजीने उस समय अपने शिष्योंको बुलवाया ॥ ६१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कार्तवीर्योपाख्यान' नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७७ ॥ अठहत्तरवाँ अध्याय मुनि जमदग्निद्वारा ससैन्य राजा कार्तवीर्यका आतिथ्य; कामधेनुका अद्भुत प्रभाव देखकर राजाका बलपूर्वक उसे ग्रहण करनेकी इच्छा करना ब्रह्माजी बोले- मुनि जमदग्निने अपने शिष्योंसे कहा—'तुम लोग नदीके तटपर निवास कर रहे राजा कार्तवीर्यको बुलानेके लिये शीघ्र ही वहाँ जाओ' ॥ १॥ उन शिष्यगणोंने राजाके समीप जाकर और उनके समक्ष उनका अभिवादन स्वीकारकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया और उनसे मुनिकी आज्ञा इस प्रकार निवेदित की-हे राजन्! आप अपनी सेनाके साथ सावधानीपूर्वक भोजनके लिये चलें। षड्रसोंसे समन्वित भोजनके असंख्य पात्र परोसे गये हैं ॥ २-३ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर उठकर उस राजाने अपने सभी सैनिकोंको बुलवाया और भलीभाँति स्नान करके राजा कार्तवीर्यने वहाँके लिये प्रस्थान किया ॥ ४ ॥ वहाँ राजाने मुनिके भवनको देखा तो वैसा दृश्य उसने न कभी सुना था और न देखा ही था। उस प्रकारका गृहका तोरण तीनों लोकोंमें उसे नहीं दिखायी दिया था ॥ ५ ॥ मुनि जमदग्निके संकेतकी अभिलाषा करनेवाले तथा हाथमें बेंत धारण करनेवाले द्वारपालोंने राजाको जब आगे जानेसे मना किया तो मुनिके शिष्यगणोंने द्वारपालोंको वैसा करनेसे रोका, तदनन्तर राजा भोजनालयमें गये ॥ ६ ॥ वहाँ जाकर भोजनालयके मध्यमें स्थित होकर राजाने मुनि जमदग्निकी सम्पदाको देखा, उस समय