श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 236, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंशीर्षक (Header): २३४ | * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * | [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
राजाने अपने मनमें सोचा कि ऐसी सम्पदा तो न विष्णुजीके पास है और न ही शंकरजीके पास। संसारका पालन-पोषण करनेवाले विष्णु, संहार करनेवाले भगवान् शिव तथा इस जगत्की सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजीके पास भी ऐसी समृद्धि नहीं है। तदनन्तर मुनि जमदग्निने आगे जाकर राजाकी अनुमति प्राप्तकर सभी सैनिकोंको भोजनपात्रोंके पास पंक्तिबद्ध बैठाया और जो भोजनालयसे बाहर भोजन करनेवाले थे, उनके लिये भी भोजनपात्रोंको भिजवाया॥ ७-९॥ आसनोंपर उन सभीके बैठ जानेपर मुनि जमदग्निने राजाको बैठाया। तदनन्तर वाद्यके बजनेपर उन सभीने भोजन किया। इस प्रकारके अन्नों तथा स्वादिष्ट फल- मूलोंको उनके द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया था। वे सभी आपसमें ही इस प्रकार पूछने लगे कि 'यह क्या है? यह क्या है?'॥ १०-११॥ सब लोग आश्चर्य करने लगे कि एक पहरमें ही ऐसी सब व्यवस्था मुनिने कैसे कर दी? इच्छापूर्वक सबने भोजन किया और जब वे तृप्त हो गये तो शेष भोजन उन्होंने पात्रोंमें छोड़ दिया॥ १२॥ तदनन्तर मुनिके शिष्योंने प्रत्येक भोजनपात्रके पास हाथ-मुँह धोनेके लिये प्रक्षालनपात्र भी प्रदान किया और दाँतोंमें लगे अन्नकणोंको निकालनेके लिये सुन्दर सींक (शलाका)-भी प्रदान की। शिष्योंने अवशिष्ट अन्नको हाथी, घोड़े तथा बैलोंको प्रदान किया। तदनन्तर वे सभी बिस्तर बिछाये हुए दूसरे घरमें गये, वहाँ उन्होंने ईख, दाख, आम, कटहल तथा दाडिम आदि फलोंका सेवन किया। मुनि जमदग्निद्वारा प्रदत्त इलायची, लौंग, कपूर, खैरके चूर्ण (कत्था) एवं सुपारीसे समन्वित पानके पत्तोंको ग्रहण किया॥ १३-१५१/२॥ इसके पश्चात् मुनिने अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उन सभीको यथायोग्य मूल्यवान् वस्त्र एवं आभूषण प्रदान किये। राजाको तो और भी अधिक मूल्यवान् वस्त्राभूषण प्रदान किये॥ १६१/२॥ मुनि बोले-[हे राजन्!] साक्षात् विष्णुरूपी तथा सभी प्रकारके मनोरथोंसे परिपूर्ण आप राजाके लिये
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
मुझ वनवासी मुनिके द्वारा कौन-सा भोजन देय है। मेरे वचनोंका पालन करते हुए आपने तीनों लोकोंमें मेरे यशकी अभिवृद्धि की है॥ १७-१८॥ लोकमें लोग ऐसा कहेंगे कि मुनि जमदग्निके यहाँ ससैन्य राजा कार्तवीर्यने भोजन किया। अत्यन्त पुण्यशाली व्यक्तिके लिये ही लोकमें 'साधु' शब्दका प्रयोग होता है। यदि कोई महापुरुष क्षुद्र व्यक्तिके वचनानुरोधका पालन करता है, तो वह भी साधुताको प्राप्त करता है और सभी लोकोंमें अत्यन्त उत्कर्षयुक्त विशद यशको प्राप्त करता है। मेरे वचनका परिपालन करनेसे आपका महान् अरिष्ट भी दूर हो गया है॥ १९-२०१/२॥ ब्रह्माजी बोले-महर्षि जमदग्निद्वारा कही गयी इस प्रकारकी वाणीको सुनकर राजा उस समय अपने मनमें अत्यन्त विस्मयको प्राप्त हुए और उन्होंने उनसे पूछा॥ २११/२॥ राजा बोले-हे सुव्रत! यहाँ पहले तो कुछ भी मैंने नहीं देखा था, क्या यह सब मायाके प्रभावसे हुआ है अथवा तपस्याके प्रभावसे हो सका है, इसे मुझे सच- सच बतलाइये॥ २२१/२॥ मुनि बोले-हे राजन्! मैंने कभी पहले परिहासमें भी झूठ नहीं बोला है, अतः मैं आपसे सत्य कहता हूँ कि यह सब कुछ कामधेनुके द्वारा ही किया गया है॥ २३१/२॥ ब्रह्माजी बोले-हे मुने! जिसका भाग्य विपरीत हो जाता है, उसकी बुद्धि भी विपरीत हो जाती है, दुष्ट ग्रहके द्वारा बलपूर्वक अनिष्ट उत्पन्न हो जाता है। अपनी सेना तथा वाहनोंसहित भोजनसे भलीभाँति संतृप्त हो जानेपर भी राजा कार्तवीर्यने कामधेनुको ले जानेका निश्चय किया और वे मुनिसे इस प्रकार कहने लगे॥ २४-२५१/२॥ राजा बोले-मैं समझता हूँ कि शान्त चित्तवाले, कन्दमूल तथा फलका सेवन करनेवाले, मनसे ही सृष्टि तथा संहार करनेकी क्षमता रखनेवाले, प्रत्येक प्रकारकी कामनासे रहित और इन्द्रियोंको सर्वथा जीत लेनेवाले, आप-जैसे ज्ञानीजनोंके लिये इस प्रकारकी गौका कोई प्रयोजन नहीं है॥ २६-२७॥ वनमें प्राप्त वस्तुओं, फल-मूल आदिका और