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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 656 में से

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पृष्ठ 237

उ०ख०-अ०७९ ] * जमदग्निद्वारा कामधेनुको देनेसे मना करना * २३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

वायुमात्रका सेवन करनेवाले, मोक्षकी साधना करनेवाले और निरन्तर वेदके स्वाध्यायमें परायण रहनेवालोंको सम्पत्तिसे क्या प्रयोजन ? शास्त्रोंके अध्यापनमें निरत, धर्मशास्त्रके तत्त्वको जाननेवाले और योगाभ्यासपरायण जनोंका कामधेनुसे क्या प्रयोजन है ? ॥ २८-२९ ॥ महान् पुरुषोंको प्राप्त महान् वस्तु महान् कार्यको सम्पन्न करनेके लिये ही होती है, आप-जैसे अरण्यवासीके पास यह महान् रत्नरूपी गौका विद्यमान रहना उचित नहीं प्रतीत होता ॥ ३० ॥ इसलिये हे ब्रह्मन् ! आप इस कामधेनुको प्रसन्नतापूर्वक मुझे प्रदान कर दें। आप मनमें यह निश्चय कर लीजिये कि मेरे पास रहनेपर भी यह गौ आपकी ही होगी ॥ ३१ ॥ अतः ब्रह्मन् ! मेरी उस मर्यादाकी रक्षा कीजिये, जो मैंने आपके समक्ष रखी है। अन्यथा बलशाली राजाओंके लिये संसारमें ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो दुर्लभ है। अपना राष्ट्र हो अथवा पराया राष्ट्र हो, राजा अपनी चतुरंगिणी सेनाके साथ अपनी मनोभिलषित वस्तु प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३२१/२ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे द्विज ! उस दुर्मति राजा कार्तवीर्यके इन वचनोंको सुनकर महामुनि जमदग्नि क्रोधसे उसी प्रकार अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे, जैसे कि अत्यधिक घीकी आहुति पड़नेपर अग्नि देदीप्यमान हो उठती है। लाल- लाल आँखोंवाले वे ब्राह्मण जमदग्नि उन राजाको अनुशासित करते हुए इस प्रकार बोले - ॥ ३३-३४१/२ ॥ मुनि बोले- हे राजन् ! मैंने तुम्हें सदाचारी, शुद्धचित्त एवं राजा होनेके कारण आदरणीय समझकर ही भोजनके लिये आमन्त्रित किया था, किंतु तुम्हारे हृदयमें बगुलेके समान जो कुटिलता व्याप्त थी, उसे मैं जान न सका। जैसे कोयल छल करके अपने बच्चेका पालन कौवेसे करवाती है, किंतु अन्तमें वह कोयलका बच्चा कौआ होकर भक्ष्य तथा अभक्ष्य सब कुछ खानेमें अनुरक्त हो जाता है, इसी प्रकार मैं भी भूलमें पड़ गया था, जो कि मैंने इस प्रकारके राजाके साथ मित्रता की। ऐसी मैत्री लोकमें न देखी गयी है, 'न सुनी गयी है और न किसीके द्वारा अनुभूत ही की गयी है ॥ ३५-३७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कार्तवीर्योपाख्यान' नामक अठहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७८ ॥

उन्यासीवाँ अध्याय जमदग्निद्वारा कामधेनुको देनेसे मना करनेपर कार्तवीर्यका क्रुद्ध होकर अपने सैनिकोंको युद्धका आदेश देना, इधर कामधेनुद्वारा अनेक वीरोंका प्रादुर्भाव और उनके द्वारा कार्तवीर्यकी सेनाका पराभव, क्रुद्ध कार्तवीर्यद्वारा महर्षि जमदग्निका वध, रेणुकाका कार्तवीर्यको शाप देना

मुनि बोले- [हे राजन् ! ] पहले तो तुमने सज्जनोंके आचरणका अनुपालन करते हुए उपकारका भाव दिखाया, किंतु अब तुम अपने विनाशको बुलाकर कामधेनुको प्राप्त करनेकी इच्छा कर रहे हो ॥ १ ॥ हे नृप ! तुम निश्चित ही भ्रममें हो; क्योंकि जो वस्तु अप्राप्य है, उसकी तुम अभिलाषा कर रहे हो। निश्चित ही तीनों लोकोंको विनष्ट करनेसे जो पाप होता है, वह तुम्हारे सिर लगेगा ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारके वचनरूपी बाणोंसे विद्ध वह राजा प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित हो उठा, और क्रुद्ध होकर अपने मुखसे आग उगलता हुआ परम क्रुद्ध होकर उस समय मुनि जमदग्निसे कहने लगा ॥ ३१/२ ॥ राजा बोला- हे शठ ! किसीके भी मुखसे मैं कटु- वचन नहीं सुन सकता। क्या करूँ, तुम ब्राह्मण हो- ऐसा विचार करके मैं कटु वचनोंको सहन कर रहा हूँ ॥ ४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर उठकर उस राजाने अपने दूतोंको शीघ्र ही आज्ञा देते कहा- 'तुम लोग खूँटेसे बँधी हुई कामधेनुको छुड़ाकर शीघ्र ही मेरे

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