श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] पास ले आओ। उसकी आज्ञासे दूतोंने उस समय [चित्र] कामधेनुको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ५-६ ॥ [परंतु] कामधेनुकी फूत्कारमात्रसे वे दूत अपने प्राण गवाँकर स्वर्ग चले गये। अन्य राजदूतोंको उसने अपनी क्रोधाग्निसे भस्म कर डाला। दूसरे वीर उसकी श्वासरूपी वायुके तीव्र वेगसे आकाशमें उड़ गये। उस समय उनके द्वारा सूर्यमण्डल आच्छादित हो जानेके कारण कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा था ॥ ७-८ ॥ सभी दिशाएँ अन्धकारसे व्याप्त हो गयीं, आकाश भी नहीं दिखायी पड़ रहा था। पृथ्वी हिलने-डुलने लगी, प्रकम्पित होकर वृक्ष गिरने लगे ॥ ९ ॥ सभी सैनिक भयभीत होकर दशों दिशाओंमें भाग उठे। किसीने दूर स्थित होकर चाबुकके आघातसे उस कामधेनुको प्रताड़ित किया। तब वह गौ उड़-उड़कर उस सेनाके पीछे उसी प्रकार दौड़ पड़ी, जैसे कि हाथियोंके समूहपर सिंह और सर्पोंपर गरुड़ टूट पड़ता है ॥ १०-११ ॥ भागते हुए उन वीरोंमें महान् हाहाकार मच गया। तब महान् बलशाली कार्तवीर्यने उनसे कहा—'तुम लोगोंको भयभीत नहीं होना चाहिये। प्रसन्नतापूर्वक मेरे द्वारा शंखध्वनि किये जानेपर वह कामधेनु भयभीत
[दायाँ स्तम्भ] होकर अपने घर वापस लौट जायगी। उसकी सामर्थ्य ही क्या है? तुम लोग मेरे कौतुकको देखो ॥ १२-१३ ॥ तदनन्तर उसने अपना महान् शंख बजाया, जिसके नादसे त्रैलोक्य गूँज उठा। किंतु तब भी वह कामधेनु भयभीत नहीं हुई, तदनन्तर उन सभी राजसेवकोंने लाठियों, लोहेके डण्डोंसे बड़े वेगसे उसे पीटना प्रारम्भ किया। उसके शरीरपर जहाँ-जहाँ प्रहार हुआ उस-उस स्थलसे अनेक वीर उत्पन्न हुए, जो सभी प्रकारके शस्त्रोंसे समन्वित थे और युद्धके लिये सन्नद्ध थे। उस कामधेनुके केशोंसे शक और बर्बर प्रादुर्भूत हो गये ॥ १४-१६ ॥ इसी प्रकार उसके पैरोंसे पटच्चर जातिवाले सैनिक, विविध जातिके यवन तथा अन्य भी सभी वीर उत्पन्न हुए। ऐसे ही कामधेनुसे घोड़े, हाथी तथा रथोंपर सवार अनेक वीरोंके समूह उत्पन्न हुए, उन्होंने भी कार्तवीर्यके सैनिकोंके साथ युद्ध किया ॥ १७-१८ ॥ उनके प्रहारसे राजा कार्तवीर्यके सैनिक भूमिपर गिरने लगे। उसके अन्य सैनिक जैसे रात्रिमें पक्षी वृक्षमें छिप जाते हैं, वैसे ही कामधेनुके सैनिकोंमें मिलकर छिप गये। परस्पर आघातसे सैकड़ों पुरुष घायल होकर गिर पड़े। शस्त्रोंके द्वारा शस्त्रोंके काट दिये जानेपर कुछ वीर मल्लयुद्ध करने लगे ॥ १९-२० ॥ इस प्रकारका भीषण युद्ध छिड़ जानेपर तथा शस्त्रोंके गिर जानेपर यह नहीं पता चल पा रहा था कि कौन अपने पक्षका है और कौन पराये पक्षका ॥ २१ ॥ धूलके द्वारा सूर्यके आच्छादित हो जानेसे वे सैनिक परस्परमें ही एक-दूसरेको मारने लगे। 'मारो-मारो'- ऐसा कहते हुए महान् कोलाहल व्याप्त हो गया ॥ २२ ॥ घोड़ोंकी हिनहिनाहट, हाथियोंके चिंघाड़, सैनिकोंके निनाद, रथोंके नेमिकी ध्वनि, मृदंग, ताल, वेणु और भेरीके शब्दोंसे अत्यधिक कोलाहल हो उठा ॥ २३ ॥ इस प्रकार उस कामधेनुसे आविर्भूत वीरों तथा कार्तवीर्यके रथारोही, अश्वारोही, गजारोही और पैदल सैनिकोंके मध्य अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ, जो भूतों तथा राक्षसोंको भी भय प्रदान करनेवाला था ॥ २४ ॥
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