श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 239, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०७९ ] * जमदग्निद्वारा कामधेनुको देनेसे मना करना * २३७ वह युद्ध चील, कौवे आदि पक्षियोंके लिये सुख प्रदान करनेवाला और वीरोंकी पत्नियोंको भय प्रदान करनेवाला था। युद्धमें किसीकी जाँघें टूट गयीं और किसीके सिर कट गये। उस युद्धमें टूटे हुए खड्ग, खेटक, भाले, बाण तथा धनुषों और वीरों एवं रथारूढ़ोंकी तो गिनती ही नहीं की जा सकती थी ॥ २५-२६ ॥ उस समय राजा कार्तवीर्यके जो बचे हुए सैनिक थे, वे भागने लगे और कामधेनु गौके सैनिकोंने हँसकर उन्हें दौड़ाया, किंतु मारा नहीं। उन सैनिकोंने कार्तवीर्यके सैनिकोंकी निन्दा की और कहा- 'मुनि जमदग्निने तुम सबका क्या अनिष्ट किया था? [लगता है,] किसी जन्मान्तरीय दोषके कारण उस समय राजा कार्तवीर्यको दुर्बुद्धि पैदा हो गयी थी' ॥ २७-२८ ॥ इस प्रकार अपनी सम्पूर्ण सेनाके विनष्ट हो जानेपर कृतवीर्यका पुत्र वह राजा कार्तवीर्य युद्धके लिये उठ खड़ा हुआ। उसने अपने हाथोंमें पाँच सौ धनुष तथा पाँच सौ बाण धारण कर लिये ॥ २९ ॥ महान् भुजाओंवाले उस कार्तवीर्यने भूमिपर बायाँ घुटना टेककर बड़े वेगसे धनुषोंकी प्रत्यंचाओंको खींचकर कामधेनुसे उत्पन्न सेनाओंपर बाणोंकी वर्षा की ॥ ३० ॥ किंतु राजाद्वारा की गयी वह बाणोंकी वर्षा उसी प्रकार निष्फल हो गयी, जैसे कि नीतिरहित व्यक्तिका उद्यम विफल हो जाता है और जैसे वन्ध्या स्त्रीका सहवास विफल हो जाता है। उस समय उस राजश्रेष्ठ कार्तवीर्यने बार-बार उतने ही बाणोंको छोड़ा, किंतु कामधेनुसे उत्पन्न एक वीर भी घायल नहीं हुआ ॥ ३१-३२ ॥ अपने बाणोंके विफल हो जानेपर उस समय राजा अत्यन्त संतप्त हो उठा, 'मेरा सामर्थ्य कहाँ चला गया' इस प्रकार चिन्ता करता हुआ वह व्याकुल हो गया ॥ ३३ ॥ 'व्याकुल व्यक्तिपर प्रहार नहीं करना चाहिये'- ऐसा समझकर वे सभी सैनिक स्वर्गलोकको चले गये और कामधेनु भी प्रसन्न हो गयी तथा सोचने लगी कि तुच्छ व्यक्तिके साथ युद्ध करनेसे क्या लाभ? ॥ ३४ ॥ कामधेनुके स्वर्ग चले जानेपर वह राजा कार्तवीर्य मुनि जमदग्निके समीप गया और क्रुद्ध होकर उनसे बोला- 'हे ब्रह्मन्! मैंने तुम्हारा कपट भाव जान लिया है, जिसके हृदयमें छल-कपट हो, उसे ब्राह्मण नहीं समझना चाहिये।' ऐसा कहकर उसने एक बाणके द्वारा मुनिश्रेष्ठ जमदग्निको विद्ध कर डाला ॥ ३५-३६ ॥ उस महान् बाणके हृदयमें लगते ही मुनिने प्राण त्याग दिया। तब मुनिपत्नी रेणुकाने उस राजासे कहा- 'तुमने व्यर्थमें ही ब्रह्महत्या की है' ॥ ३७ ॥ आँखें लाल किये हुए वह राजा क्रोधके आवेशमें होकर उस रेणुकासे बोला- 'अरे मुनिकी प्रिय पत्नी! चुपचाप खड़ी रहो, नहीं तो मैं तुम्हें भी मार डालूँगा' ॥ ३८ ॥ तदनन्तर उस दुष्ट राजा कार्तवीर्यने क्रोध करते हुए इक्कीस बाणोंसे रेणुकापर भी प्रहार किया। उस समय मुनिपत्नीने अपने मनमें मुनि जमदग्निका स्मरण किया ॥ ३९ ॥ तदनन्तर रेणुकाने उस राजासे कहा- 'अरे दुष्ट चाण्डाल! तुमने यह क्या कर डाला? बिना अपराधके हम दोनोंको तुमने क्यों मारा है? तुम्हारा और तुम्हारी भुजाओंका विनाश हो जायगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है' ॥ ४० १/२ ॥ रेणुकाका ऐसा वचन सुनकर वह राजा वापस चला गया। वह अपने थोड़े-से बचे हुए सैनिकोंको लेकर चिन्तामग्न होते हुए अपने नगरको लौट गया। उस समय वह अपने मनमें अपनी ही निन्दा कर रहा था और मरे हुए सैनिकोंके लिये शोक कर रहा था। उत्साहहीन तथा निश्चेष्ट होकर उसने अपने भवनमें प्रवेश किया ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कार्तवीर्योपाख्यानमें' उन्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७९ ॥
Kalyana Visheshank 2021_Section_9_2_Front