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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 656 में से

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पृष्ठ 240

२३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अस्सीवाँ अध्याय माता रेणुकाके स्मरण करनेपर परशुरामका आगमन, माताद्वारा सारा वृत्तान्त जानकर परशुरामका दुखी होना और माताद्वारा प्राप्त इक्कीस बार पृथिवीको क्षत्रियविहीन बनानेकी आज्ञाको स्वीकार करना, परशुरामद्वारा माता-पिताका और्ध्वदैहिक संस्कार करना

ब्रह्माजी बोले—राजा कार्तवीर्यके चले जानेपर मुनिपत्नी रेणुका शोकग्रस्त तथा अत्यन्त विह्वल हो उठी। इस युद्धके उपस्थित होनेपर वे मेरे पुत्र कहाँ चले गये— ऐसा वह कहने लगी॥ १॥ पतिके मृत्युप्राप्त हो जानेपर बाणोंसे आबद्ध मैं इस समय क्या करूँ? मेरा अत्यन्त क्रोधी वह प्रिय पुत्र परशुराम भी न जाने कहाँ चला गया?॥ २॥ उसे देख लेनेपर ही मेरे प्राण देवलोकको जायेंगे। तदनन्तर स्मरणमात्र करनेसे ही उस समय परशुराम माताके पास उपस्थित हो गये॥ ३॥ उन्होंने माताको बाणसमूहोंसे बँधा हुआ तथा पिताको मृत-अवस्थामें देखा, जिन्हें दुष्ट कार्तवीर्यने हृदयमें कठोर बाण मारकर आहत कर दिया था॥ ४॥ परशुराम उस समय मूर्च्छासे उसी प्रकार भूमिपर गिर पड़े, जैसे कि आँधीके द्वारा वृक्ष भूमिपर गिरा दिया जाता है। वे अत्यन्त दुखी होकर अपने माता-पिताके लिये विलाप करने लगे॥ ५॥ परशुराम बोले—आज सभी ओर मुझे अन्धकार दिखायी पड़ रहा है। आज मेरे लिये दसों दिशाएँ शून्य- सी हो गयी हैं। जिस प्रकार पृथ्‍वी सुमेरुपर्वतसे रहित हो जाती है, और जिस प्रकार अमरावतीपुरी देवराज इन्द्रसे रहित हो जाती है, वैसे ही पिताके बिना मेरे लिये आज यह आश्रम सुशोभित नहीं हो रहा है। जिस प्रकार तीनों लोक गंगाके बिना शून्य हो जाते हैं, वैसे ही यह आश्रम-मण्डली भी सूनी-सूनी-सी हो गयी है॥ ६-७॥ माता रेणुकाके बिना यह आश्रम-मण्डली शोभित नहीं हो रही है। अब देवताओंका भय दूर चला गया है और सभी मुनिगण अनाथ हो गये हैं। देवताओंको यह भय था कि ये जमदग्नि तपस्याके प्रभावसे न जाने हमारा क्या ग्रहण कर लेंगे॥ ८॥

इस प्रकारसे उन्होंने बहुत विलाप किया। वे परशुराम उसी प्रकार चेष्टाहीन हो गये, जैसे कि मछली जलके बिना हो जाती है। तदनन्तर रोते हुए वे पुनः माताके समीप चले आये और माताकी गर्दनको गोदमें रख करके उसके शरीरसे बाणोंको निकालने लगे॥ ९-१०॥ माताके दुखसे दुखित हो परशुराम पुनः रुदन करने लगे। तीनों लोकोंको भस्म कर देनेकी क्षमता रखनेवाली मेरी माता आज उस दुष्टके बाणोंसे पीड़ित होकर भूमिपर पड़ी हुई है। [हे मातः!] कुछ समय पूर्वकी बात है, मेरे खेलनेके लिये जानेपर तुम क्षणभर भी मेरा विस्मरण नहीं करती थी, आज वही तुम मुझे छोड़कर कहाँ जानेको उद्यत हो? हे शोभने! तुम मुझे दुग्ध तथा अनेकों वस्त्र, अन्न प्रदान करती थी, सुन्दर-सुन्दर फल- मूलोंको देती थी, आज वही तुम मुझे छोड़कर कहाँ जा रही हो? माता-पितासे हीन मेरे जीवनको आज धिक्कार है!॥ ११-१४॥ ब्रह्माजी बोले—पुत्रके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर माता रेणुका अत्यन्त दुःखमें भर गयीं, उन्होंने पुत्रके आँसू पोंछकर बहुत व्याकुल होते हुए कहा॥ १५॥ [हे पुत्र!] मैं तुम्हारे निकट ही रहूँगी, अतः तुम शोक न करो। अब तुम पूर्वमें घटी हुई घटनाको सुनो। कुछ समय पहलेकी बात है कि कृतवीर्यका पुत्र राजा कार्तवीर्य मध्याह्नकालमें अपनी सेनाके साथ इस आश्रम- मण्डलमें आया। तुम्हारे पिताने उसका बहुत स्वागत- सत्कार किया और सेनासहित उसे भलीभाँति भोजन कराया॥ १६-१७॥ कामधेनुके कृपा-प्रसादसे वैसी व्यवस्था देखकर भोजन करनेके अनन्तर राजाने मुनिसे कामधेनुकी याचना की। मुनिके मौन रहनेपर उसने क्रोध करके कामधेनुको बन्धनसे मुक्त कर दिया॥ १८॥

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