भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 656 में से

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उ०ख०-अ०८१ ] * परशुरामका माता-पिताका दाह-संस्कार करना * २३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सैनिकोंद्वारा स्पर्श हो जानेमात्रसे उस धेनुने अत्यन्त | करना चाहिये। चूँकि उसने मेरी देहमें इक्कीस बाण बलशाली चतुरंगिणी सेनाको उत्पन्न किया। तदनन्तर | मारे हैं, अतः तुम भी इक्कीस बार इस पृथ्वीको राजाके सैनिकोंके साथ कामधेनुके द्वारा उत्पन्न सैनिकोंका | क्षत्रियोंसे विहीन बना दो। हे पुत्र! तुमको मैं एक महान् युद्ध छिड़ गया ॥ १९ ॥ | बात और कहती हूँ, तुम मेरी आज्ञाका पालन करते घायल होकर राजाके वे सैनिक जब भाग उठे तो | हुए अवश्य करो ॥ २३-२४ ॥ स्वयं राजा कार्तवीर्य युद्धके लिये आ डटा। उसने पाँच- | तुम ऐसे स्थानपर हम दोनोंका और्ध्वदैहिक संस्कार पाँच सौ बाणोंको कई बार छोड़ा ॥ २० ॥ | करो, जहाँपर किसीका दाहसंस्कार न हुआ हो। उसके जब वह भी पराजित हो गया तो वह घरकी | बाद तुम सर्वज्ञ मुनिश्रेष्ठ दत्तात्रेयजीको बुलाकर उनसे ओर लौट चला। कामधेनु भी स्वर्गको चली गयी। | त्रयोदशाहपर्यन्त हम दोनोंके और्ध्वदैहिक कर्म कराओ। पुनः आकर उस दुष्टने एक बाणसे तुम्हारे पिताके | उन दत्तात्रेयमुनिके समान कोई वक्ता नहीं है, तभी हम वक्षःस्थलपर प्रहार करके उन्हें मार डाला और इक्कीस | दोनों सद्गतिको प्राप्त करेंगे ॥ २५-२६ ॥ बाणोंद्वारा मुझ निरपराधको विद्ध करके वह दुष्ट | इतना कहकर रेणुका अपने शरीरको छोड़कर दुर्गम वापस चला गया ॥ २१-२२ ॥ | [परम] धामको प्राप्त हुईं। तब महामना परशुरामने इसलिये आज तुम्हें उस दुष्टका शीघ्र ही विनाश | माताकी आज्ञाके अनुसार ही सभी कर्मोंको किया ॥ २७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'परशुरामोपाख्यानमें' अस्सीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८० ॥ इक्यासीवाँ अध्याय परशुरामका माता-पिताका दाह-संस्कार करके महर्षि दत्तात्रेयजीको आमन्त्रित करने उनके आश्रमपर जाना और अपने आगमनका प्रयोजन बताना, तदनन्तर दोनोंका वापस आश्रमपर आना, दत्तात्रेयजीके निर्देशानुसार परशुरामद्वारा त्रयोदशाहपर्यन्त अपने माता-पिताका और्ध्वदैहिक संस्कार सम्पन्न करना और पिता-माताकी सद्गति ब्रह्माजी बोले-परशुरामजीने मुण्डन कराकर | परशुरामजीने उन मुनिश्रेष्ठके पास जाकर उन्हें प्रणाम भलीभाँति विधि-विधानसे स्नान किया, तदनन्तर उन्होंने | किया। परशुरामजी आधे पहरतक हाथ जोड़े हुए उनके ब्राह्मणोंके कथनानुसार उत्थान श्राद्ध* (मृतिस्थानपर किया | समक्ष स्थित रहे। सर्वज्ञ मुनि दत्तात्रेयने उनके आगमनके जानेवाला श्राद्ध) किया। तत्पश्चात् विश्रामस्थानपर किये | प्रयोजनको भलीभाँति जान लेनेपर भी परशुरामजीको जानेवाले श्राद्धसे लेकर चितादाहतकके सभी श्राद्धोंको | अपने समीप बुलाकर कहा- 'यद्यपि मैं तुम्हारे आगमनका किया और मन्त्रपूर्वक दोनोंको मुखाग्नि दी। तदनन्तर शीघ्र | प्रयोजन जान चुका हूँ, तथापि मैं पूछता हूँ, कि तुम किस ही वे दत्तात्रेयमुनिके पास गये ॥ १-२ ॥ | कारणसे यहाँ आये हो ?' ॥ ३-५ ॥ ध्यानपूर्वक उन्होंने देखा कि दत्तात्रेयजी कुत्सित | ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर परशुरामजीने प्रारम्भसे वेश धारण करके शिष्योंके साथ बैठे हैं, उन्होंने हाथमें | लेकर अन्ततकका सम्पूर्ण वृत्तान्त उन्हें स्पष्टरूपसे बता कुत्तेको पकड़ रखा है, वे मलिन तथा कृशकाय हैं, तब | दिया ॥ ५ १/२ ॥

  • 'मृतस्योत्क्रान्तिसमयात् षट्पिण्डान् क्रमशो ददेत्'-पिण्डदानके छः स्थान इस प्रकार हैं-१-मृतस्थान, २-द्वारदेश, ३-चत्वर (चौराहा), ४- विश्रामस्थान, ५-काष्ठचयन तथा ६-अस्थिसंचयन। मृतस्थाने तथा द्वारे चत्वरे तार्क्ष्य कारणात् ॥ विश्रामे काष्ठचयने तथा सञ्चयने च षट् । (ग० पु०, प्रेतखण्ड १५ । ३०-३१)