श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 221, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०७२ ] * कृतवीर्यकी पत्नीका अंगहीन पुत्रको जन्म देना * २१९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बहत्तरवाँ अध्याय कृतवीर्यकी पत्नीका अंगहीन पुत्रको जन्म देना, दत्तात्रेयजीका आना और कृतवीर्यपुत्रको गणेशजीके एकाक्षरमन्त्रका उपदेश देना, कृतवीर्यका पुत्रको गणपति-आराधनाके लिये वनमें भेजना
शूरसेन बोले - हे शतयज्ञकर्ता इन्द्र! व्रतकी संपूर्ति होनेपर राजा और रानीको किस प्रकारके पुत्रकी प्राप्ति हुई? हे विभो! मुझ पूछनेवालेको यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये ॥ १ ॥
इन्द्र बोले- हे राजन्! गजानन गणेशजीके प्रसन्न होनेपर क्या-क्या नहीं हो सकता? उनकी कृपासे राजा कृतवीर्यकी उस रानीने गर्भधारण किया ॥ २॥
नवम मासमें जन्म होनेपर रानीने अपने उस मंगलमय पुत्रका दर्शन किया। उसके दो कन्धे और सुन्दर मुख था, परंतु उसके भुजाएँ और हाथ नहीं थे। इसी प्रकार उसके कमल-जैसे सुन्दर नेत्र और सुन्दर नासिका थी, परंतु उसके घुटने और जंघाएँ नहीं थीं। उसे [हाथ,] जंघा और पैरोंसे रहित देखकर माता रोते हुए बोली ॥ ३-४॥
वह (रानी) बोली - हे गजानन! मुझ अभागिनको इस प्रकारका बालक क्यों हुआ? आपने मुझे हाथ- पैररहित शिशु क्यों दिया ? ॥ ५ ॥
इससे तो मेरा वन्ध्या होना ही अच्छा था। इस प्रकारके पुत्रसे पुत्रवती होनेका क्या लाभ! मेरे पूर्वजन्ममें किये गये पापोंका नाश क्यों नहीं हुआ ? ॥ ६ ॥
हे गजानन! आपकी कृपा क्यों फलीभूत नहीं हुई ? ब्राह्मणोंके [आशीर्वादात्मक] वचन मेरे लिये इस प्रकारसे निष्फल क्यों हो गये? [इस प्रकार विलाप करती हुई वह] अपने दोनों हाथोंसे अपने वक्षःस्थल और मस्तकको बार-बार पीट रही थी। उसके रुदनके कारण वहाँ जितनी भी स्त्रियाँ विद्यमान थीं, सब रोने लगीं ॥ ७-८॥
उन सबका कोलाहल सुनकर राजा भी वहाँ आ गये। उनका भी रुदन सुनकर [राजाके] प्रमुख मन्त्रीगण भी वहाँ गये। तदनन्तर उन सबका भी रुदन सुनकर नगरके लोग भी वहाँ आकर रोने लगे ॥ ९१/२ ॥
राजा बोले - हे गजानन ! हे देव! दीनोंपर आपकी यह कैसी कृपा है! [इस प्रकारका हाथ-पैरसे रहित पुत्र देकर] आपने आज किस प्रकारकी मुझपर दया प्रदर्शित की है? हे निष्पाप ! आप स्मरणमात्रसे कैसे पापोंका हरण करते हैं? मेरा तो जप, तप, स्मरण, दान, पूजन, द्विजतर्पण, अनुष्ठान तथा हवन सब व्यर्थ हो गया ॥ १०-१२ ॥
इसलिये दैव ही बलवान् होता है, प्रयत्न निरर्थक है। कर्मकी गति जानी नहीं जाती कि वह कब या क्या होगी ! जैसे पहाड़ खोदनेसे चूहा प्राप्त हो, वैसे ही मेरे द्वारा जीवनभर किये गये प्रयत्नके फलके रूपमें यह पुत्र हुआ है। तब उन शोकाकुल राजा कृतवीर्यसे मन्त्रियोंने इस प्रकार कहा - ॥ १३-१४१/२ ॥
मन्त्रिप्रमुखोंने कहा- हे राजन् ! शोक न करो, भावी अन्यथा कैसे हो सकती है? राम क्या मृगके विषयमें नहीं जानते थे [कि वह सोनेका नहीं होता], फिर भी वे उसके पीछे गये। क्या धर्मराज युधिष्ठिरको 'द्यूतक्रीड़ा निषिद्ध है' ऐसा ज्ञान नहीं था, फिर भी वे द्यूतक्रीड़ाके लिये गये और सब कुछ गवाँकर वनको गये। अतः आपके इस दारुण क्रन्दनसे भी इस बालकको सर्वांगसुन्दरता नहीं प्राप्त होगी ॥ १५-१७॥
यदि इसका अदृष्ट ठीक होगा तो यह आगे सुन्दर हो जायगा। जिस प्रकारसे समय आनेपर वृक्ष पुष्पित और फलयुक्त हो जाते हैं, वैसे ही समय आनेपर यह भी सम्यक् रूपसे सुन्दर और पृथ्वीका स्वामी होगा ॥ १८१/२॥
इन्द्र बोले - मन्त्रिगणोंके इस प्रकारके वचन सुनकर राजा सावधान हो गये और उस [शोकाकुल] रानीसे कहा - 'उठो-उठो, अब तुम शोक न करो' और स्वयं स्वस्थचित्त होकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बुलवाकर गणेशपूजन और स्वस्तिवाचन कराया। तदनन्तर आभ्युदयिक श्राद्ध करके माला, अलंकार, वस्त्र, गाय और बहुत-से रत्न आदि अनेक प्रकारके दान दिये। उन्होंने अपने मित्रों, सम्बन्धियों, सेवकों, अनेक प्रकारके वाद्योंके वादनसे जीविका चलानेवालों, वन्दीजनों, चारणों,