भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 656 में से

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२२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दीनों, अन्धों और असहायोंको भी उनके यथायोग्य वस्त्रों आदिका दान किया॥ १९-२३॥ उसने [नगरके] प्रत्येक घरमें ताम्बूल तथा शर्करा भिजवायी तथा ग्यारहवें दिन उस शिशुका 'कार्तवीर्य' नाम रखा। [इस अवसरपर] राजाने महान् उत्साहपूर्वक [सम्पूर्ण] नगरको भोजन कराया। इसके अनन्तर उस पुत्रका बारह वर्षका समय बीत गया, तो राजा कृतवीर्यके भवनमें दत्तात्रेयजी स्वेच्छासे आये। कृतवीर्यने उनके चरणोंमें अपना सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया॥ २४-२६॥ [तब] उन मुनिने [चरणोंमें पड़े हुए] उस श्रेष्ठ राजाको उठाकर उसका आलिंगन किया। [राजाने भी उन मुनिको] एक सुन्दर आसनपर बिठाकर उनका आदरपूर्वक पूजन किया॥ २७॥ राजाने उन्हें आसन, पाद्य, अर्घ्य, गाय, वस्त्र, उपवीत, धूप, दीप, नैवेद्य, अनेक प्रकारके फल, उद्वर्तन (उबटन) तथा रत्न और सुवर्णकी दक्षिणा दी। पादसंवाहन आदिसे परम प्रसन्न और सुखपूर्वक विराजमान महामुनि दत्तात्रेयसे राजा कृतवीर्यने कहा- 'हे मुने ! आज मेरे जन्म-जन्मान्तरके पुण्यकर्म फलित हो गये, जो मैं अपने चर्म-चक्षुओंसे आपका साक्षात् दर्शन कर रहा हूँ। हे सुव्रत ! आपके कृपा-प्रसादसे मेरा भविष्य और अधिक मंगलमय होगा; क्योंकि आप-जैसे महापुरुषोंका दर्शन पापकर्मियोंको नहीं होता' ॥ २८-३११/२॥ कृतवीर्यके वचन सुनकर दत्तात्रेयने उनसे कहा- '[हे राजन् !] मैं आपके अद्भुत पुत्रको देखनेकी इच्छासे यहाँ आया हूँ।' [मुनिके आगमनसे] हर्षित राजाने तब [अपने पुत्रकी दुरवस्थासे खिन्न होकर] उन मुनिसे पुनः कहा- ॥ ३२-३३॥ राजा बोले- [हे मुने !] मेरे द्वारा देवाराधन- सम्बन्धी किये गये अनुष्ठान, तप, दान और व्रत आदि सब व्यर्थ गये। जगदीश्वरने यह जो पुत्र मुझे दिया है, वह मेरे लिये हृदयमें काँटेके समान हो गया है। उसके अदर्शनीय होनेसे मैं भी अदर्शनीय हो गया हूँ॥ ३४१/२॥ इन्द्र बोले- [हे राजन् !] तदनन्तर राजा कृतवीर्यने उस बालकको लाकर मुनि दत्तात्रेयको दिखाया ॥ ३५ ॥ उन श्रेष्ठ मुनिने उस राजपुत्रको देखकर अपने कमलसदृश नेत्रोंको बन्द कर लिया और ध्यानके द्वारा राजाके कर्मको जानकर पुनः उनसे बोले- '[हे राजन्!] तुम्हारा यह पुत्र समस्त राजाओंको जीतकर [चक्रवर्ती होकर] राज्य करेगा। तुमने संकष्टचतुर्थीव्रतके जागरणमें जँभाई लेनेके बाद आचमन नहीं किया, इससे सम्पूर्ण संकटोंका नाश करनेवाले व्रतराजका अपमान हुआ। इसीलिये यह पुत्र अंगहीन हुआ है, उपाय करनेसे यह सर्वांगपूर्ण हो जायगा ॥ ३६-३८ ॥ राजा बोले- हे स्वामिन् ! आपने सत्य कहा है। अब आप कृपा करके मुझसे उस उपायको कहिये, जिससे मेरा पुत्र आपकी कृपासे सर्वांगपूर्ण हो जाय ॥ ३९ ॥ इन्द्र बोले-तब उन मुनिने दया करके उसके पुत्रको अंगोंसहित [गणेशजीके] एकाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया और उससे पुनः कहा कि इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक गणेशजीकी आराधना करो। हे सुव्रत ! तुम उपवास और एकभुक्ति (दिन-रात्रिके बीच मध्याह्नके बाद केवल एकबार भोजन करना)-के नियमोंका पालन करो ॥ ४०-४१ ॥ बारह वर्षतक इस प्रकार आराधन करनेपर वे तुम्हें दर्शन देंगे; उनके दृष्टिपातमात्रसे तुम दिव्य देहवाले हो जाओगे। ऐसा कहकर और राजासे अनुमति लेकर वे मुनिश्रेष्ठ अन्तर्धान हो गये। तब मुनिके चले जानेपर पैरोंसे रहित उस महामनस्वी पुत्रने [अपने पिता] कृतवीर्यसे कहा कि मुझे गहन वनमें पहुँचा दीजिए। गणेशजीकी कृपाप्राप्तिहेतु मैं अनुष्ठान करूँगा ॥ ४२-४४॥ उसके माता-पिता उसके वचनोंको सुनकर रुदन करने लगे। तदनन्तर पिता (राजा कृतवीर्य)-ने एक सुन्दर पालकीद्वारा उसे वनको भेज दिया ॥ ४५ ॥ राजाके सेवकगण उसे पर्णकुटीमें बैठाकर वापस नगरको लौट आये। उस राजपुत्रने भी वहीं रहकर तपस्या करनेका निर्णय किया ॥ ४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कृतवीर्यको पुत्रकी प्राप्तिका वर्णन' नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥