श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ
पृष्ठ 223, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 223
उ०ख०-अ०७३ ] * गणेशजीकी आराधनासे कार्तवीर्यको दिव्य देह और सहस्त्र भुजाओंकी प्राप्ति * २२१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिहत्तरवाँ अध्याय गणेशजीकी आराधनाके प्रभावसे कार्तवीर्यको दिव्य देह और सहस्त्र भुजाओंकी प्राप्ति इन्द्र बोले—वह राजपुत्र भगवान् गजाननका ध्यान | उसपर देवताओं तथा देवर्षियोंने भी पुष्पवर्षा की ॥ १२ ॥ करते हुए उनके प्रति दृढ़ निष्ठा रखकर गुरु (दत्तात्रेयजी)- | उन्होंने उसकी और देवाधिदेव गणेशजीकी गीत द्वारा उपदिष्ट मन्त्रका नियमपूर्वक जप करने लगा। | और वाद्यध्वनिसे स्तुति की। तदनन्तर सहस्र भुजाओंसे वायुमात्रका भक्षणकर निराहार रहते हुए वह पाषाण- | युक्त उस कार्तवीर्यने गर्जना की। उसके मेघ-गर्जनके खण्डसदृश [निश्चल] प्रतीत होता था। इस प्रकार तपस्या | समान शब्दको सुनकर समवर्ती यमराज$^१$ भी अत्यन्त करते हुए उसके बारह वर्ष व्यतीत हो गये। हस्तपादरहित | त्रस्त हो गये तो दूसरोंकी गिनती ही कहाँ? ॥ १३-१४ ॥ उस महामनस्वी बालकके स्थिर स्वरूपको देखकर बारह | पृथ्वीके समस्त राजागण उसके भयसे काँपते थे वर्षके पश्चात् गणेशजी सरोवरके मध्यभागमें मूँगेकी | कि युद्धमें यह [अपने एक हजार हाथोंसे] एक साथ मूर्तिके रूपमें प्रकट हुए और उसकी भक्तिनिष्ठासे अत्यन्त | पाँच सौ बाण छोड़ेगा। तब ब्रह्मा आदि देवता अपने- सन्तुष्ट हो उसके सम्मुख जाकर बोले— ॥ १-४ ॥ | अपने विमानोंसे उतरकर उसके पास आये और बोले— गणेशजी बोले—इस निर्जन वनमें; जो कि सिंहों | 'तुम्हारा स्मरण करनेपर देवताओंकी भी खोयी या नष्ट और व्याघ्रोंसे युक्त और बहुत-से लता-पुष्पोंसे समन्वित | हुई वस्तु प्राप्त हो जायगी' ॥ १५-१६ ॥ है, उसमें तुमने बारह वर्षोंतक रहकर तपस्या की है, | तुम सभी लोगोंके हृदयमें स्थित मानसिक व्यथाको इससे मैं तुम्हें वर दूँगा, जो अभिलाषा तुम्हारे मनमें हो, वह | नष्ट करोगे; क्योंकि 'सहस्रार्जुन' नामवाले साक्षात् माँगो। उनकी वाणीको सुनकर वह कृतवीर्यपुत्र देहभावनाममें | विष्णुरूप हो। तुम कल्पपर्यन्त तीनों लोकोंमें विख्यात स्थित हो, भगवान् गजाननको प्रणामकर विमानोंमें स्थित | रहोगे। तुम शरणागतोंका पालन करनेवाले और सज्जनोंकी सभी मुनियोंके सुनते हुए बोला— ॥ ५-७ ॥ | रक्षामें संलग्न रहोगे ॥ १७-१८ ॥ [राज-] पुत्र बोला—हे देव! मेरी निश्चल | तुम सम्पूर्ण शत्रुओंपर विजय पानेवाले और भूमण्डलके भक्ति आपके युगलचरणोंमें बनी रहे, इसके अतिरिक्त | अधिपति होगे—इस प्रकार अनेक वर देकर देवगण अन्य वर माँगनेकी मेरी इच्छा नहीं है। तथापि हे देवेश! | अन्तर्धान हो गये। सम्पूर्ण राजाओंने उसे हाथी, घोड़े, मैं अपने माता-पिताके सन्तोषके लिये सभी जनोंको | पालकियाँ, छत्र, चामर, मशालें, रथ और अन्यान्य आह्लादित करनेवाली शारीरिक सुन्दरताकी याचना करता | उपहार प्रदान किये ॥ १९-२० ॥ हूँ, उसे प्रदान करें ॥ ८-९ ॥ | तदनन्तर उस [राजा कार्तवीर्य]-ने एक भव्य इन्द्र बोले—उस राजपुत्रके वचनको सुनकर उन | मन्दिरका निर्माण करवाकर उसके मध्यमें गणेशजीकी मायापति गजाननने अणिमा [सिद्धि]-का आश्रय लेकर | मूँगेकी मूर्तिकी ब्राह्मणोंद्वारा प्रतिष्ठा करवायी। ब्राह्मणोंने प्रयत्नपूर्वक उसके उदरमें प्रवेश किया। हे राजन् ! उनके | उसका 'प्रवालगणपति' नाम रखा। [राजा ] उस स्थापित प्रविष्ट होनेपर वह पुत्र दिव्य देहवाला हो गया। तदनन्तर | मूर्तिके पूजनके लिये नियुक्त ब्राह्मणोंको ग्राम दानमें दिये। वह कृतवीर्यपुत्र सहस्र भुजाओंवाला हो गया ॥ १०-११ ॥ | तबसे वह सिद्धिप्रद क्षेत्र पृथ्वीपर 'प्रवालक्षेत्र'$^२$ नामसे वह दो पैरोंसे युक्त सीधा पर्वतकी भाँति स्थित था। | विख्यात हुआ। पृथ्वीका धारण करनेकी क्षमता प्राप्त करनेके
१-प्रत्येक प्राणीके साथ उसके कर्मके अनुसार बिना भेदभाव किये समान व्यवहार करनेके कारण यमराजको समवर्ती कहा जाता है। २-मुम्बई-भुसावल रेलवे लाइनपर पाचोरा जंक्शनसे २४ किमी० की दूरीपर महसावन्द रेलवे स्टेशन है, वहाँसे लगभग ८ किमी० दूर प्राचीन प्रवाल-क्षेत्र है, जिसे वर्तमानमें पद्मालयतीर्थ कहा जाता है। यहाँ कार्तवीर्य (सहस्रार्जुन) और शेषजीद्वारा स्थापित दो गणपतिमूर्तियाँ हैं। मन्दिरके सामने ही 'उगम' सरोवर है।