श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 23, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें[ २१ ] [ स्तम्भ १ ] विषय | पृष्ठ-संख्या १२२- गौतम आदि महर्षियों तथा भगवान् शिवद्वारा मयूरेशकी महिमा एवं पराक्रमका वर्णन, षडानन आदिका देवर्षि नारदके साथ संवाद, देव मयूरेशका दैत्य सिन्धुसे युद्धके लिये सन्नद्ध होना, किंतु नन्दी, भृंगी आदिका उन्हें रोककर स्वयं युद्धके लिये प्रस्थान करना, वीरभद्र तथा भूतराजका भी साथमें जाना, दैत्य सिन्धुके साथ उनका युद्ध और दैत्यसेनाका पराजित होना.......... ५६६ १२३- देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम, मयूरेशका विराट्रूप धारण करना, पुनः लघुरूपमें होकर मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित परशुद्वारा सिन्धुका वध करना, शिव-पार्वती तथा देवोंका उपस्थित होना और मयूरेशस्तोत्रद्वारा स्तुति करना ............................... ५६९ १२४- सिन्धु-वधके अनन्तर माता-पिता तथा पत्नीका करुण विलाप, पत्नी दुर्गाका सती होना, पिता चक्रपाणिके द्वारा मयूरेशकी स्तुति और उनसे गण्डकीनगमें चलनेके लिये प्रार्थना करना, शिव-पार्वती तथा गणों एवं मुनियोंसहित मयूरेशका गण्डकीनगरके लिये प्रस्थान .. ५७२ १२५- कारागारसे मुक्त हुए देवताओंका मयूरेशकी महिमाका गान करना, चक्रपाणिद्वारा मयूरेशकी प्रथम पूजा करनेसे इन्द्रका रुष्ट होना, महान् ध्वनिके साथ मयूरेशका प्रकट होना और पुनः पंचदेवोंके रूपमें अवतरित होना, ब्रह्माजीद्वारा सिद्धि-बुद्धि नामक कन्याओंका मयूरेशके साथ विवाह करना ......... ५७५ १२६- विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान, मयूरेशपुरीका वर्णन, भाद्रपदमासके गणेशव्रतकी विधि तथा उसकी महिमा, मयूरेशका द्वापरयुगमें सिन्दूरवधके लिये पुनः अवतरित होनेका आश्वासन देकर अन्तर्धान होना, ब्रह्माजीद्वारा एक सुन्दर प्रासादको निर्मितकर उसमें गजाननप्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना, मयूरेशचरित्र-श्रवणकी महिमा ............................................... ५७९ १२७- गजानन-अवतारके प्रसंगमें ब्रह्माजीकी जँभाईसे सिन्दूरकी उत्पत्ति, ब्रह्माजीद्वारा उसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, वरदानोंकी परीक्षाके लिये सिन्दूरका ब्रह्माजीको ही लक्ष्य बनाना और ब्रह्माजीका भयभीत होकर वैकुण्ठ जाना.................. ५८२ १२८- ब्रह्माजीका नारायणको सिन्दूरदैत्यके विषयमें बताना, उसी समय सिन्दूरका वहाँ आना, भगवान् विष्णुके कहनेपर सिन्दूरका भगवान् शिवसे युद्ध करने कैलासपर जाना, शिवको ध्यानस्थ देखकर सिन्दूरका पार्वतीका हरण करना, मयूरेशका द्विज्रूपसे उपस्थित होकर सिन्दूरको समझाना, सिन्दूरका वापस लौट जाना, मयूरेशद्वारा माता पार्वतीको अपने गजानन-अवतारका स्मरण दिलाना .............. ५८४ १२९- सिन्दूरके अत्याचारसे पीड़ित देवताओं तथा ऋषियोंद्वारा विनायककी स्तुति, दुःखप्रशमनस्तोत्र और उसका माहात्म्य, विनायकद्वारा सिन्दूरके वधका आश्वासन दिया जाना, माता पार्वतीके गर्भमें तेजःपुंजका प्रकट होना, उस तेजसे सन्तप्त पार्वतीका भगवान् शिव तथा गणोंके साथ पर्थली नामक वनमें जाना और वहाँ सखियोंके साथ निवास करना .............................. ५८८ [ स्तम्भ २ ] विषय | पृष्ठ-संख्या १३०- पार्वतीजीके गर्भसे गजाननका आविर्भाव तथा उनके विलक्षण स्वरूपको देखकर विस्मित पार्वतीको शिवजीके द्वारा प्रबोधित किया जाना................................... ५९१ १३१- भगवान् शंकरकी आज्ञासे नन्दीका शिशु गजाननको वरेण्यपत्नीके पास ले जाना.................................. ५९३ १३२- सिन्दूरका गजाननको ले जाकर नर्मदा में फेंकना, गजाननके रक्तसे रंजित शिलाओंकी 'नार्मद गणेश' संज्ञा, उमामहेश्वरका कैलास-गमन ................... ५९४ १३३- राजा वरेण्यके द्वारा गजमुखाकृति शिशुका भयभीत होकर वनमें परित्याग और पराशर मुनिके द्वारा शिशु गजाननका पालन ............................................... ५९६ १३४- पराशराश्रममें मूषकका प्रबल उपद्रव और गजाननका उसे दमितकर अपना वाहन बनाना........................ ५९८ १३५- गजाननके वाहन मूषकके पूर्वजन्मका वर्णन.......... ६०० १३६- गजाननका सिन्दूरके साथ युद्धार्थ प्रस्थान, सिन्दूरके दूतोंसे गजाननका संवाद एवं सिन्दूरका युद्धहेतु आगमन............................................................. ६०२ १३७- युद्धभूमिमें गजाननका सिन्दूरको मारकर उसके रक्तका अपने शरीरमें लेपन करना और देवताओं, ऋषियों तथा राजाओंका वहाँ आकर पूजन-स्तवनादि करना......... ६०४ १३८- सूत-शौनक-संवादमें गणेशगीताका उपक्रम ............ ६०७ १३९- कर्मयोग.......................................................... ६१० १४०- ज्ञानयोग ......................................................... ६१२ १४१- संन्यासयोग ................................................... ६१४ १४२- योगावृत्तिकी प्रशंसा........................................... ६१६ १४३- श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने तात्त्विक स्वरूपका परिचय देना .................................................... ६१७ १४४- श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यसे उपासना-योगका वर्णन करना ............................................................ ६१८ १४५- श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने विराट्रूपका दर्शन कराना .................................................... ६१९ १४६- सगुणोपासनाकी श्रेष्ठता; क्षेत्र, ज्ञान तथा ज्ञेयका वर्णन.. ६२१ १४७- दैवी, आसुरी और राक्षसी प्रकृति....................... ६२२ १४८- तप, दान, ज्ञान, कर्म, कर्ता, सुख-दुःख, ब्रह्म एवं वर्णानुसार कर्मोंके भेद तथा गणेशगीताकी महिमा .. ६२३ १४९- ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान, कलियुगवर्णन एवं कलियुगके अन्तमें गणपति का अवतीर्ण होकर धर्म-संस्थापन ........................................... ६२५ १५०- व्यासमुनिको गणपतिदेवका साक्षात्कार और उनसे वरकी प्राप्ति ..................................................... ६२८ १५१- गणेशपुराणके श्रवणसे राजाकी रोगनिवृत्ति और गणपतिके द्वारा प्रेषित विमानपर आरूढ़ होकर परमधामगमन .... ६२९ १५२- अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना और उसी प्रसंगमें राजा सोमकान्तके ऊपर हुए गणपति-अनुग्रह आदिका वर्णन करना ............................................................ ६३१