श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 22, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें[ २० ] विषय पृष्ठ-संख्या १०५- मयूरेशकी बारहवीं जन्मतिथिके महोत्सवमें विष्णुभक्त ब्राह्मण विश्वदेवका वहाँ आना, पार्वतीद्वारा उनका आतिथ्य, किंतु विश्वदेवद्वारा यह कहकर उनका आतिथ्य स्वीकार नहीं करना कि वे केवल विष्णुको ही भगवान् मानते हैं अन्यको नहीं, तब मयूरेशका अपनी मायाद्वारा उनकी भेदबुद्धिको दूर करना, इस प्रसंगमें गणेशभक्त पराशरकी कथा ......................... ५२४ १०६- मयूरेशद्वारा तेरहवें वर्षमें मंगल दैत्यका वध और शिवके ललाटपर स्थित चन्द्रमाके हरणकी लीला, मयूरेशका गणोंका स्वामी होना ..................... ५२७ १०७- मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षमें मुनियोंके कहनेपर पार्वतीका इन्द्रयाग करना, मयूरेश्वरद्वारा कल तथा विकल नामक दैत्योंका वध और फिर इन्द्रयागको विध्वंस करना, रुष्ट होकर इन्द्रका मयूरेशपुरवासियों तथा मयूरेशपुरीको संतप्त करना, मयूरेश्वरका सबकी रक्षा करना एवं इन्द्रका मयूरेशकी शरण ग्रहण करना ............... ५२९ १०८- पन्द्रहवें वर्षमें मयूरेश्वरद्वारा व्याघ्ररूपी दैत्यको विकृत रूपवाला बनानेकी कथा तथा यमराजके दर्वापहरणका आख्यान .................................................... ५३२ १०९- देवर्षि नारदसे शिव-पार्वतीका मयूरेशके विवाहके लिये कन्याके अन्वेषणके लिये कहना, देवर्षि नारदद्वारा सिद्धि एवं बुद्धि नामक कन्याओंको मयूरेशके योग्य बताना, शिव-पार्वती तथा ससैन्य मयूरेशका गण्डकीनगरीकी ओर प्रस्थान, मार्गमें हेम नामक दैत्यका ससैन्य आगमन, मयूरेशकी कृपासे मुनिबालकोंद्वारा अभिमन्त्रित कुशोंसे असुर-सेनाका वध ...................................... ५३४ ११०- सिन्धु दैत्यद्वारा गण्डकीनगमें बन्दी बनाये गये देवताओंको मुक्त करनेके लिये मयूरेशका नन्दीश्वरको वहाँ प्रेषित करना ......................................... ५३६ १११- नन्दीश्वरका दैत्य सिन्धुकी सभामें प्रवेश करके मयूरेशका सन्देश सुनाना, किंतु दैत्य सिन्धुके द्वारा देवताओंको मुक्त करनेसे मना कर देना, नन्दीश्वरका वापस लौटकर मयूरेशको सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाना, मयूरेशद्वारा गणोंको युद्धकी आज्ञा देना........................... ५३८ ११२- मयूरेशका गणोंकी सेनाके साथ सिन्धुदैत्यपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान, गणोंद्वारा दैत्य सिन्धुकी सेनापर आक्रमण, पराजित हो सिन्धुसेनाका पलायन, क्रुद्ध दैत्य सिन्धुका स्वयं भी युद्धके लिये प्रस्थान ......... ५४० ११३- युद्धके लिये दैत्यराज सिन्धुकी चतुरंगिणी सेनाका प्रस्थान, मयूरेशकी सेना और दैत्यसेनाका भीषण संग्राम, सिन्धुसेनाके दो अमात्य वीर-मैत्र और कौस्तुभका वीरभद्र एवं कार्तिकेयसे युद्ध तथा दोनों अमात्य वीरोंके वधका वर्णन ........................... ५४२ विषय पृष्ठ-संख्या ११४- दैत्यराज सिन्धुकी सेनाका मयूरेशकी सेनाके साथ भीषण संग्राम और सिन्धुसेनाकी पराजय .............. ५४५ ११५- दैत्यराज सिन्धुका सुसज्जित होकर रणभूमिके लिये प्रस्थान, सिन्धुका मयूरेशकी सेनाके वीरोंको पराजितकर मयूरेशके साथ घोर संग्राम, मयूरेशका सर्वत्र चतुर्भुजरूप दिखाना, मोहित होकर सिन्धुदैत्यका अपने भवनमें वापस आना.. ५४७ ११६- देव मयूरेशद्वारा सिन्धुदैत्यपर विजयप्राप्ति करनेपर मुनिगणों तथा देवी पार्वती एवं शिवका उनके दर्शनके लिये आना, युद्धमें मृत देवगणोंको खोजनेके लिये मयूरेश तथा मुनिगणोंका जाना, देव मयूरेशद्वारा मृत देवोंको अपने शरीरकी वायुके स्पर्शसे जीवित करना .. ५५० ११७- पराजित होकर दैत्यराज सिन्धुका अपने भवनमें आकर अत्यन्त चिन्ताग्रस्त होना, उसकी पत्नी दुर्गाका वहाँ उपस्थित होना, दुर्गाके पूछनेपर दैत्यराज सिन्धुका अपनी चिन्ताका कारण बतलाना, दुर्गाका उसे समझाना तथा मयूरेशसे सन्धि करनेके लिये कहना, किंतु सिन्धुका उसके प्रस्तावको अस्वीकृतकर पुनः युद्धके लिये सुसज्जित होना................................... ५५२ ११८- कल तथा विकल नामक दैत्योंका चतुरंगिणी सेना लेकर युद्धके लिये प्रस्थान, देवसेनामेंसे सेना लेकर पुष्पदन्त तथा वृषका उन दोनोंके साथ भयंकर संग्राम, वीरभद्र और षडाननद्वारा दोनों दैत्योंका वध, दैत्य सैनिकोंद्वारा युद्धका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना............. ५५४ ११९- दैत्यराज सिन्धुका पराजित होकर चिन्ताग्रस्त होना, उसके दो पुत्र धर्म तथा अधर्मका पिताको आश्वस्त करना तथा युद्धके लिये आज्ञा माँगना, सेना लेकर दोनोंका युद्धार्थ प्रस्थान, वीरभद्र, कार्तिकेय, हिरण्यगर्भ तथा भूतराजकी सेनाओंका दैत्यसेनाके साथ भीषण संग्राम, कार्तिकेयका धर्म एवं अधर्मका वध करना तथा सम्पूर्ण समाचार शिव-पार्वतीको निवेदित करना ..... ५५७ १२०- दूतोंका धर्म एवं अधर्मकी मृत्युका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना, सिन्धुद्वारा शोक प्रकट करना, सखियोंद्वारा समाचार मिलनेपर सिन्धुपत्नी दुर्गांका राजसभामें उपस्थित हो पुत्रोंके लिये विलाप करना, सखियोंद्वारा उसे आश्वस्त करना, क्रुद्ध दैत्यराज सिन्धुका चतुरंगिणी सेना लेकर युद्धके लिये प्रस्थान, उसी समय पिता चक्रपाणिका प्रकट होकर पुत्र सिन्धुको मैत्रीका उपदेश देना, किंतु सिन्धुका उसे अस्वीकृत कर देना ........ ५५९ १२१- राक्षसराज सिन्धुकी सेनाके साथ कार्तिकेय, वीरभद्र आदि देववीरोंकी सेनाओंका भयंकर संग्राम, सिन्धुसेनाकी पराजय, दैत्यराज सिन्धुका स्वयं युद्धके लिये प्रस्थान, मयूरेशके परशुसे उत्पन्न कालपुरुषद्वारा दैत्य सैनिकोंका भक्षण किया जाना, चिन्तित होकर दैत्य सिन्धुका घरमें आकर छिपकर रहना ... ५६२