भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 656 में से

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पृष्ठ 243

उ०ख०-अ०८२] * परशुरामजीको माता रेणुकाद्वारा कार्तवीर्य-विजयका उपाय बतलाना * २४१

पुत्रस्नेहके वशीभूत होकर आ गयीं। यदि परशुरामजीके द्वारा द्वादशाहके बाद अर्थात् सपिण्डीकरणके बाद उनका आवाहन किया गया होता, तो वे सम्पूर्ण अवयवोंसे सुशोभित होकर उपस्थित होतीं। माता उनसे बोलीं—हे वत्स! मुझे किस कारणसे बुलाया, प्रयोजन बतलाओ ? पुत्रस्नेहके वशीभूत हो उनके स्तनोंसे दूध टपकने लगा। उन्होंने उन्हें गले लगाया ॥ २४-२५१/२॥ छठे दिन मुनि दत्तात्रेयजी पुनः वहाँ आये और उन्होंने उस अवस्थामें अर्थात् अपूर्ण गात्रवाली उन रेणुकाको देखा तो वे परशुरामसे बोले—'तुमने दशगात्रके बीचमें ही अपनी माताको क्यों बुलाया, ये असम्पूर्ण गात्रवाली होकर आ गयी हैं ॥ २६-२७ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! यदि सपिण्डीकरण श्राद्ध अर्थात् द्वादशाहके बाद बुलाया होता तो तुम्हारे स्नेहके वशीभूत हो ये रेणुका पूर्ण शरीरवाली होकर आतीं' ॥ २८ ॥ परशुराम बोले—हे ब्रह्मन्! मैंने भयभीत होकर बालभावसे स्वभाववश 'हे मातः' इस प्रकारसे पुकारा था, तब हे मुनिश्रेष्ठ ! मैंने इन्हें इस अवस्थामें देखा ॥ २९ ॥ परशुरामजीने एकादशाहके दिन वृषोत्सर्ग किया तथा बारहवें दिन माता-पिता दोनोंका सपिण्डीकरण श्राद्ध किया। तदनन्तर दूसरे दिन अर्थात् त्रयोदशाह श्राद्धको पाथेय अर्थात् वर्षाशन प्रदानकर ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याहवाचन कराया और ब्राह्मणोंको यथायोग्य अनेक प्रकारके दान प्रदान किये ॥ ३०-३१ ॥ उनके पिता जमदग्नि (श्राद्धसे संतृप्त होकर) दिव्य देह धारणकर ब्रह्मलोकको गये और माता रेणुका उसी रूपमें पृथ्वीपर अनेक स्थानोंपर स्थित हो गयीं ॥ ३२ ॥ जो लोग श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करते हैं, वे उन लोगोंके सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण कर देती हैं। हे मुनिश्रेष्ठ ! इन रेणुकाजीका विशेष माहात्म्य स्कन्दपुराणमें विस्तारपूर्वक कहा गया है। अत्यन्त विस्तारके भयसे उसे मैंने यहाँ नहीं बतलाया ॥ ३३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें रामोपाख्यानमें इक्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८१ ॥


बयासीवाँ अध्याय

परशुरामजीद्वारा पूछे जानेपर माता रेणुकाद्वारा उन्हें कार्तवीर्य-विजयका उपाय बतलाना, परशुरामद्वारा महादेवजीकी आराधनासे उन्हें गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश प्राप्त होना, मन्त्रजपसे गणेशजीका उन्हें दर्शन देना, गणेशजीका उन्हें अपना परशु प्रदान करना और परशुराम नामकी प्रसिद्धि, परशुरामद्वारा कार्तवीर्यका वध तथा इक्कीस बार पृथिवीको क्षत्रियविहीन बनाना

व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन्!] परशुरामजीने बालक होते हुए भी हजार हाथोंवाले तथा बहुत विशाल सेनावाले कृतवीर्यके पुत्र कार्तवीर्यके साथ अकेले ही कैसे युद्ध किया और उस महापराक्रमशालीपर कैसे विजय प्राप्त की, उसे आप मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये ॥ १ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—एक दिनकी बात है, परशुरामजीने अपनी माता रेणुकासे पूछा—॥ २ ॥ परशुराम बोले—हे मातः! जिस कार्तवीर्यके डरसे इन्द्र आदि देवता भी भयभीत होकर काँप उठते हैं, जिसके पास असंख्य मात्रामें चतुरंगिणी सेना है, उसपर मैं किस प्रकार विजय प्राप्त कर सकूँगा, आप मुझे वह उपाय विस्तारपूर्वक बतलाइये। मैं किस प्रकार इक्कीस बार इस धराको क्षत्रियहीन बना सकूँगा, उसे भी बतलाइये। आपके कृपा-प्रसादसे निश्चित ही मेरी विजय होगी और सभी लोकोंमें मेरी अतुलनीय कीर्तिका विस्तार होगा ॥ ३-५ ॥ माता बोली—हे पुत्र! तुम्हारी विजय अवश्य होगी, तुम भगवान् शंकरकी आराधना करो। उन महादेवजीके सन्तुष्ट हो जानेपर सभी मनोकामनाओंकी पूर्ति हो जायगी ॥ ६ ॥