भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 656 में से

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पृष्ठ 244

२४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

माताके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर उनके चरणोंमें प्रणामकर तथा उनका आशीर्वाद ग्रहणकर परशुराम कैलासपर्वतपर चले गये ॥ ७ ॥ वहाँ उन्होंने महादेवजीका दर्शन किया, जो रत्नमय सिंहासनके ऊपर विराजमान थे। परशुरामजीने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करके उनकी स्तुति की ॥ ८ ॥ परशुराम बोले—हे देवदेवेश ! हे गौरीपति ! हे शम्भो ! आपको नमस्कार है। विश्वकी सृष्टि करनेवाले आपको नमस्कार है, विश्वका पालन-पोषण करनेवाले आपको नमस्कार है। विश्वका संहार करनेवाले आपको नमस्कार है। विश्वमूर्त्तिरूप आपको नमस्कार है, विश्वके आश्रयरूप आपको नमस्कार है। चन्द्रमाको अपने मस्तकपर धारण करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ९ ॥ निर्गुण स्वरूप तथा विशुद्ध ज्ञानके कारणरूप आपको नमस्कार है। निराकार, साकार एवं सनातन रूप आपको नमस्कार है। वेद, वेदान्त आदि शास्त्रोंके लिये भी वर्णनातीत आपको नमस्कार है, अव्यक्त-व्यक्तात्मा तथा सत्स्वरूप आपको नमस्कार है ॥ १० ॥ सत्त्वादि तीन गुणोंके बोधक एवं त्रिगुणातीत आपको नमस्कार है। प्रपंचको जाननेवाले तथा प्रपंचरहित आप शिवको नमस्कार है* ॥ ११ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे की गयी स्तुतिको सुनकर भगवान् महेश्वर अत्यन्त सन्तुष्ट हो गये और परशुरामको सम्बोधित करके बोले—'मैं तुम्हारे वचनरूपी अमृतसे संतृप्त हो गया हूँ। तुम अपने मनमें जो-जो भी कामना मुझसे रखते हो, उसके लिये मुझसे वर माँगो। हे द्विज ! मैं तुम्हें जानता हूँ, तुम महर्षि जमदग्नि और रेणुकाके पुत्र हो ॥ १२-१३ ॥ परशुराम बोले—हे प्रभो! कामधेनुको प्राप्त करनेकी इच्छा रखनेवाले दुष्ट कार्तवीर्यने क्रुद्ध होकर बिना अपराधके ही मेरे पिता जमदग्निको मार डाला, इतना ही नहीं; उसने सेनासहित [अपनेको] मेरे पिताके द्वारा भोजन प्राप्त कराये जानेपर भी इक्कीस बाणोंके द्वारा मेरी माता रेणुकाको चारों ओरसे बींध डाला ॥ १४-१५ ॥ माताने मुझे आज्ञा दी है कि उस दुष्ट राजाका वध कर डालो। मैं आपकी शरणमें आया हूँ, उसके वधका उपाय बतानेकी कृपा करें। ताकि उसी उपायके द्वारा मैं इस पृथिवीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे हीन बना सकूँ ॥ १६ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार परशुरामजीकी बातोंका रहस्य समझकर भगवान् महादेव उनसे बोले— ॥ १७ ॥ उन्होंने ध्यानपूर्वक देखकर सुखपूर्वक किया जानेवाला विजयका उपाय बताया और गणेशजीको प्रसन्न करनेवाले छः अक्षरोंवाले मन्त्रका उपदेश उन्हें दिया। साथ ही यह भी कहा कि इस षडक्षर मन्त्रका प्रयत्नपूर्वक एक लाखकी संख्यामें जप करो। उसके दशांश संख्यासे हवन करो ॥ १८-१९ ॥ हवनके दशांशसे तर्पण तथा उसके भी दशांश संख्यामें (सौ) ब्राह्मणोंको भोजन कराओ। ब्राह्मणोंकी सेवासे गणेशजी तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हो जायेंगे और देवदेव गजानन पृथ्वीपर तुम्हारे सभी कार्य पूर्ण कर देंगे। भगवान् शंकरके इन वचनोंको सुनकर उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम करके और उनकी आज्ञा प्राप्तकर वे परशुरामजी इस पृथिवीमें इधर-उधर घूमने लगे। उन्होंने कृष्णा नदीके उत्तरी क्षेत्रमें एक श्रेष्ठ स्थानको देखा ॥ २०-२२ ॥ वह अनेक प्रकारके वृक्षों एवं लतामण्डपोंसे सुशोभित हो रहा था और साधना करनेवालोंको उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाला था। उन भगवान् शंकरके द्वारा जैसा कहा गया था, उसीके अनुसार परशुरामजीने वहाँ अनुष्ठान किया ॥ २३ ॥ उन्होंने अपनी दसों इन्द्रियों तथा मनकी वृत्तिको भगवान् गजाननमें स्थिर करके पैरके एक अँगूठेमें खड़ा रहकर उस (षडक्षर) महामन्त्रका (एक लाखकी संख्यामें) जप किया। उसके दशांश संख्यामें क्रमशः

  • राम उवाच नमो देवदेवेश गौरीश शम्भो नमो विश्वकर्त्रे नमो विश्वभर्त्रे। नमो विश्वहर्त्रे नमो विश्वमूर्ते नमो विश्वधाम्ने नमश्चन्द्रधाम्ने ॥ नमो निर्गुणायामलग्यानहेतो निराकारसाकारनित्याय तेऽस्तु। नमो वेदवेदान्तशास्त्रातिगाय नमोऽव्यक्तव्यक्तात्मने सत्स्वरूप ॥ गुणत्रयप्रबोधाय गुणातीताय ते नमः। नमः प्रपञ्चविदुषे प्रपञ्चरहिताय ते ॥