भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 656 में से

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पृष्ठ 245

उ०ख०-अ०८२ ] * परशुरामजीको माता रेणुकाद्वारा कार्तवीर्य-विजयका उपाय बतलाना * २४३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

हवन, उसके दशांश संख्यामें तर्पण तथा उसके भी दशांश संख्यामें ब्राह्मणोंको भोजन कराया ॥ २४-२५ ॥ तब प्रसन्न होकर भगवान् गजानन प्रकट हो गये। वे चार भुजावाले थे, उनका शरीर विशाल था, वे महामायावी तथा अत्यन्त सुन्दर थे ॥ २६ ॥ उन्होंने नागका यज्ञोपवीत धारण किया था, विविध प्रकारके अलंकारोंसे वे विभूषित थे, उन्होंने मस्तकपर मुकुट तथा कानोंमें कुण्डल धारण कर रखे थे। उनका सुन्दर गण्डस्थल अत्यन्त देदीप्यमान और मुखमण्डल प्रकाशमान हो रहा था ॥ २७ ॥ मोती तथा मूँगेकी मालाओंसे उनका वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा था। उनकी अत्यन्त विशाल भुजाएँ थीं। वे अपने चारों हाथोंमें परशु, कमल, दाँत तथा मोदकोंको धारण किये हुए थे ॥ २८ ॥ वे स्वामी भगवान् गणेश अपनी सूँड़में कमल पुष्पको धारणकर स्वेच्छापूर्वक सूँड़से घुमा रहे थे। वे अपनी आभासे सभी दिशाओं तथा विदिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। परशुरामजीने जब सहसा उन्हें देखा तो उनके तेजसे अभिभूत होकर अपनी दोनों आँखें बन्द कर लीं। तदुपरान्त उन द्विज परशुरामने गणेशजीकी स्तुति करनी प्रारम्भ की ॥ २९-३० ॥ परशुरामजी बोले—हजारों सूर्योंके समान आभावाले हे जगदीश्वर ! आपको नमस्कार है। हे सभी विद्याओंके स्वामी ! आप सभी प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ ३१ ॥ विघ्नोंके स्वामी तथा विघ्नोंका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है। आप सर्वान्तर्यामीको नमस्कार है, आप सभीका प्रिय करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। भक्तोंके प्रिय तथा ज्ञानस्वरूप भगवान् गणेशको नमस्कार है। विश्वकी संरचना करनेवाले और उसका पालन करनेवाले आपको नमस्कार है। मेरी तपस्याके विनाशक महाविघ्नका आप निवारण करें ॥ ३२-३३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारकी स्तुतिको सुन करके सौम्य तेजवाले भगवान् गणेशने अपने उत्कट तेजसे व्याकुल हुए उन परशुरामजीसे कहा— ॥ ३४१/२ ॥

गणेशजी बोले—हे राम! मेरे षडक्षर मन्त्रका जप करते हुए तुम रात-दिन जिसका ध्यान करते हो, वही मैं वर देनेके लिये इस समय प्रस्तुत हुआ हूँ, तुम अपने मनमें जिस-जिस मनोरथकी इच्छा करते हो, मुझसे तुम वह वर माँग लो ॥ ३५-३६ ॥ मैं ही अनेक ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि और पालन तथा संहार करनेवाला हूँ, सभी ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनिगण और राजर्षि मेरे यथार्थ स्वरूपको नहीं जानते हैं, वही आज मैं तुम्हें दृष्टिगोचर हुआ हूँ ॥ ३७१/२ ॥ परशुराम बोले—जो अप्रमेय, सम्पूर्ण विश्वके आश्रय एवं सृष्टि तथा संहार करनेवाले हैं। जो न तो वेदोंके द्वारा, न तपस्यासे, न यज्ञोंके द्वारा, न व्रतोंके अनुष्ठानसे, न दानसे और न योग-साधनाद्वारा लोगोंको दिखायी देते हैं, उन्ही आप विघ्नविनाशकका आज मुझे दर्शन हुआ है। हे देव ! अब मुझे दूसरे वरसे क्या प्रयोजन ! आप मुझे अपनी दृढ़ भक्ति प्रदान करें ॥ ३८-४० ॥ गणेशजी बोले—हे द्विजश्रेष्ठ राम! मुझमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति होगी, मेरे द्वारा वरदानोंका प्रलोभन दिये जानेपर भी तुम्हारी बुद्धि किंचित् भी विचलित नहीं हुई। तुम मेरे इस परशुको ग्रहण करो, यह सभी शत्रुओंका विनाश करनेवाला है, आजसे तीनों लोकोंमें तुम्हारा 'परशुराम' यह नाम ख्यातिका प्राप्त करेगा ॥ ४१-४२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार उन परशुरामको वर प्रदानकर तथा अपना परशु (खड्ग) देकर भगवान् गजानन लोगोंके देखते-देखते उसी समय अन्तर्धान हो गये ॥ ४३ ॥ तदनन्तर परशुरामजीने ब्राह्मणों तथा वेद-वेदांग और शास्त्रोंके जाननेवाले विद्वानोंके द्वारा अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक भगवान् महागणपतिकी स्थापना, प्रतिष्ठा की। उन्होंने ब्राह्मणोंको भोजन कराया और विविध प्रकारके दान दिये। उन्होंने रत्नोंके खम्भोंसे समन्वित एक दृढ़ मन्दिर बनवाया। उन गजाननकी पूजा, परिक्रमा तथा प्रणाम करके वे परशुराम अत्यन्त प्रसन्न मन होकर अपने घरको गये ॥ ४४-४६ ॥