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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

उ०ख०-अ०८२ ] * परशुरामजीको माता रेणुकाद्वारा कार्तवीर्य-विजयका उपाय बतलाना * २४३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

हवन, उसके दशांश संख्यामें तर्पण तथा उसके भी दशांश संख्यामें ब्राह्मणोंको भोजन कराया ॥ २४-२५ ॥ तब प्रसन्न होकर भगवान् गजानन प्रकट हो गये। वे चार भुजावाले थे, उनका शरीर विशाल था, वे महामायावी तथा अत्यन्त सुन्दर थे ॥ २६ ॥ उन्होंने नागका यज्ञोपवीत धारण किया था, विविध प्रकारके अलंकारोंसे वे विभूषित थे, उन्होंने मस्तकपर मुकुट तथा कानोंमें कुण्डल धारण कर रखे थे। उनका सुन्दर गण्डस्थल अत्यन्त देदीप्यमान और मुखमण्डल प्रकाशमान हो रहा था ॥ २७ ॥ मोती तथा मूँगेकी मालाओंसे उनका वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा था। उनकी अत्यन्त विशाल भुजाएँ थीं। वे अपने चारों हाथोंमें परशु, कमल, दाँत तथा मोदकोंको धारण किये हुए थे ॥ २८ ॥ वे स्वामी भगवान् गणेश अपनी सूँड़में कमल पुष्पको धारणकर स्वेच्छापूर्वक सूँड़से घुमा रहे थे। वे अपनी आभासे सभी दिशाओं तथा विदिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। परशुरामजीने जब सहसा उन्हें देखा तो उनके तेजसे अभिभूत होकर अपनी दोनों आँखें बन्द कर लीं। तदुपरान्त उन द्विज परशुरामने गणेशजीकी स्तुति करनी प्रारम्भ की ॥ २९-३० ॥ परशुरामजी बोले—हजारों सूर्योंके समान आभावाले हे जगदीश्वर ! आपको नमस्कार है। हे सभी विद्याओंके स्वामी ! आप सभी प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ ३१ ॥ विघ्नोंके स्वामी तथा विघ्नोंका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है। आप सर्वान्तर्यामीको नमस्कार है, आप सभीका प्रिय करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। भक्तोंके प्रिय तथा ज्ञानस्वरूप भगवान् गणेशको नमस्कार है। विश्वकी संरचना करनेवाले और उसका पालन करनेवाले आपको नमस्कार है। मेरी तपस्याके विनाशक महाविघ्नका आप निवारण करें ॥ ३२-३३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारकी स्तुतिको सुन करके सौम्य तेजवाले भगवान् गणेशने अपने उत्कट तेजसे व्याकुल हुए उन परशुरामजीसे कहा— ॥ ३४१/२ ॥

गणेशजी बोले—हे राम! मेरे षडक्षर मन्त्रका जप करते हुए तुम रात-दिन जिसका ध्यान करते हो, वही मैं वर देनेके लिये इस समय प्रस्तुत हुआ हूँ, तुम अपने मनमें जिस-जिस मनोरथकी इच्छा करते हो, मुझसे तुम वह वर माँग लो ॥ ३५-३६ ॥ मैं ही अनेक ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि और पालन तथा संहार करनेवाला हूँ, सभी ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनिगण और राजर्षि मेरे यथार्थ स्वरूपको नहीं जानते हैं, वही आज मैं तुम्हें दृष्टिगोचर हुआ हूँ ॥ ३७१/२ ॥ परशुराम बोले—जो अप्रमेय, सम्पूर्ण विश्वके आश्रय एवं सृष्टि तथा संहार करनेवाले हैं। जो न तो वेदोंके द्वारा, न तपस्यासे, न यज्ञोंके द्वारा, न व्रतोंके अनुष्ठानसे, न दानसे और न योग-साधनाद्वारा लोगोंको दिखायी देते हैं, उन्ही आप विघ्नविनाशकका आज मुझे दर्शन हुआ है। हे देव ! अब मुझे दूसरे वरसे क्या प्रयोजन ! आप मुझे अपनी दृढ़ भक्ति प्रदान करें ॥ ३८-४० ॥ गणेशजी बोले—हे द्विजश्रेष्ठ राम! मुझमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति होगी, मेरे द्वारा वरदानोंका प्रलोभन दिये जानेपर भी तुम्हारी बुद्धि किंचित् भी विचलित नहीं हुई। तुम मेरे इस परशुको ग्रहण करो, यह सभी शत्रुओंका विनाश करनेवाला है, आजसे तीनों लोकोंमें तुम्हारा 'परशुराम' यह नाम ख्यातिका प्राप्त करेगा ॥ ४१-४२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार उन परशुरामको वर प्रदानकर तथा अपना परशु (खड्ग) देकर भगवान् गजानन लोगोंके देखते-देखते उसी समय अन्तर्धान हो गये ॥ ४३ ॥ तदनन्तर परशुरामजीने ब्राह्मणों तथा वेद-वेदांग और शास्त्रोंके जाननेवाले विद्वानोंके द्वारा अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक भगवान् महागणपतिकी स्थापना, प्रतिष्ठा की। उन्होंने ब्राह्मणोंको भोजन कराया और विविध प्रकारके दान दिये। उन्होंने रत्नोंके खम्भोंसे समन्वित एक दृढ़ मन्दिर बनवाया। उन गजाननकी पूजा, परिक्रमा तथा प्रणाम करके वे परशुराम अत्यन्त प्रसन्न मन होकर अपने घरको गये ॥ ४४-४६ ॥

२४४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तदनन्तर परशुरामजीने [कार्तवीर्यके समीप जाकर] काट डाला ॥ ४७ ॥ बड़े ही उच्च स्वरमें पृथ्वीपति कार्तवीर्यको ललकारा इक्कीस बार उन्होंने इस धरतीको क्षत्रियोंसे विहीन बना दिया और यज्ञमें दक्षिणासहित सम्पूर्ण पृथ्वीका ब्राह्मणोंको दान कर दिया ॥ ४८ ॥ तदनन्तर लोगोंने अन्य सभी देवोंसे बढ़ा-चढ़ा उनका दृढ़ पराक्रम देखकर उन परशुरामजीको भगवान् विष्णु समझकर उनकी पूजा की ॥ ४९ ॥ [ व्यासजी बोले-] हे ब्रह्मन् ! हे पुत्र ! इस प्रकारसे मैंने भगवान् गणेशकी विविध महिमा संक्षेपमें तुम्हें बतायी। हे मुनीश्वर ! उनकी सम्पूर्ण महिमाका वर्णन करनेमें सहस्र मुखवाले शेष भी समर्थ नहीं हैं। इस पृथ्वीपर जो इस [गणेशपुराणके]-के उपासनाखण्डका श्रवण करता है, वह अपने समस्त मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है और अन्तमें गणेशजीके धामको प्राप्त करता है और वहाँ वह प्रलयपर्यन्त इच्छानुसार आनन्दित होता और युद्धमें उस राजा सहस्रबाहुकी हजार भुजाओंको है॥ ५०-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'परशुरामवरदानप्राप्तिवर्णन' नामक बयासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८२ ॥ तिरासीवाँ अध्याय तारकासुरका आख्यान, ब्रह्माजीसे वरप्राप्त तारकासुरका अत्याचार, देवोंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति, भगवती उमाका प्रकट होकर तारकासुरके वधका उपाय बताना, देवताओंद्वारा कामदेवका आवाहन, कामदेवका शिवको विचलित करनेके लिये प्रस्थान मुनि बोले-हे लोकेश! परशुरामजीने किस गयी, अतः वे उस मयूरेश्वर नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुए। स्थानपर परम अद्भुत तप किया था, उसे मुझे बतानेकी वहाँ परशुरामजीने गणेशजीका अनुष्ठान किया था और कृपा करें। कथा सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही उनसे 'परशु' नामक अस्त्रको प्राप्त किया था॥ ४॥ है॥ १॥ तदनन्तर वे राम 'परशुराम' इस नामसे तीनों ब्रह्माजी बोले-चारों युगोंमें मयूरेश्वर नामसे जो लोकोंमें प्रसिद्ध हुए। हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं उस इतिहासको स्थान प्रसिद्ध है और जहाँ देवेश गणपति मयूरपर आरूढ़ बताता हूँ, आप श्रवण करें ॥ ५ ॥ होकर अवतीर्ण हुए थे, वहाँ उन्होंने कमलासुर नामक तारक नामका एक दैत्य हुआ, जो महान् बल एवं महान् दैत्यका वध किया था। चूँकि वे मयूरपर आरूढ़ पराक्रमसे सम्पन्न था। उसने हजार दिव्य वर्षोंतक होकर प्रकट हुए थे, इसलिये उनका मयूरेश्वर यह नाम अत्यन्त कठोर तपस्या की ॥ ६ ॥ प्रसिद्ध हुआ ॥ २-३ ॥ हे द्विज ! तब प्रसन्न होकर ब्रह्माजीने उसे सभीसे लोकमें देवताओं तथा मुनियोंद्वारा उनकी स्तुति की अभयप्राप्तिका वरदान दिया और कहा - 'देवर्षि, यक्ष,

उ०ख०-अ०८३] * तारकासुरका आख्यान * २४५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गन्धर्व, नाग तथा राक्षस आदि किसीके भी हाथों तथा उनके शस्त्रोंसे तुम्हारी किसी प्रकार भी कहीं भी मृत्यु नहीं होगी, जब कार्तिकेय प्रकट होंगे, तब तुम्हारा मरण होगा। 'हे मुने! ब्रह्माजीका ऐसा वचन सुनकर बल तथा गर्वमें भरा हुआ वह तारकासुर तीनों लोकोंमें निवास करनेवाले लोगोंको अत्यन्त पीड़ित करने लगा ॥७-९॥ उसने वेदोंके स्वाध्यायमें परायण, तप तथा अनुष्ठान करनेवाले एवं अग्निहोत्र करनेवाले और स्वधर्माचरण करनेवाले अन्य ब्राह्मणोंको भी कारागारमें डाल दिया ॥ १० ॥ सभी राजाओं तथा नागोंको अपने अधीनकर वह स्वर्गमें चला गया। [उससे भयभीत] इन्द्र आदि सभी देवता हिमालयकी गुफाओंमें छिप गये ॥ ११॥ उसके भयसे कहीं भी यज्ञ तथा पूजा आदि कार्य नहीं होते थे। वह कहता था—'मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही देवता हूँ, मैं ही ब्राह्मण हूँ, मैं ही कुलदेवता हूँ। मैं ही नमस्कार करनेयोग्य हूँ, मेरी ही पूजा करनी चाहिये, मेरे अतिरिक्त और कोई दूसरा संसारमें (बड़ा) नहीं है। जो मेरे अलावा कहीं भी और किसी दूसरेको प्रणाम करेगा अथवा उसकी पूजा करेगा, वह मेरे द्वारा दण्डनीय और ताडनीय होगा अथवा वह यमलोक चला जायगा।' इस प्रकारकी आज्ञा उसने अपने दूतोंद्वारा लोकोंमें प्रसिद्ध करवायी ॥ १२-१४॥ तभीसे सब लोग धर्म-कर्मसे हीन तथा सज्जनोंसे रहित हो गये। वे शास्त्रोंके स्वाध्यायसे रहित, वषट्कार तथा यज्ञ एवं दानसे रहित हो गये ॥ १५॥ लोगोंके कुल-धर्म उच्छिन्न हो गये, वे अपने आचारसे हीन हो गये और दुष्ट बन गये। मुनिजन तथा सभी साधु वृत्तिवाले लोगोंने पर्वतोंकी गुफाओंमें शरण ले ली। वे सभी मुनिजन भगवान् शिवसे प्रार्थना करने लगे कि हे शम्भो! आपने इस दैत्यको इतना बढ़ावा क्यों दिया है, अब हम आपकी शरणको छोड़ और किस जगदीश्वरकी शरणमें जायँ ? ॥ १६-१७ ॥ हे विभो! आप ही जगत्की सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले हैं। वह दैत्य अभिमानमें चूर होकर हम लोगोंको उसी प्रकार जला रहा है, जैसे दावाग्नि वनको जला डालती है ॥ १८ ॥ यदि आपकी संहार करनेकी ही इच्छा है, तो स्वयं संसारका संहार कर डालें, यदि ऐसा नहीं है तो उस सर्वपीडाकारी तारकासुरका आज विनाश करें ॥ १९॥ इस प्रकारकी प्रार्थनाकर वे सभी मुनिगण दुष्कर श्रेष्ठ तप करने लगे। वे पत्तोंका भक्षण करके, वायुका सेवन करके, निराहार रहकर तथा केवल जल ही पीकर तपस्या करने लगे। इस प्रकार मुनिजन उससे अज्ञात स्थानमें छिपकर तपस्यामें निरत थे। इधर उस दैत्यराज तारकासुरने देवराज इन्द्रके ऐन्द्रपदको ग्रहण कर लिया और वह ब्रह्माजीको प्रताडित करने लगा ॥ २०-२१ ॥ हे मुने ! तदनन्तर विष्णु निद्रास्थित होनेके लिये क्षीरसागरमें चले गये। भगवान् शंकर भी कैलास पर्वतको छोड़कर किसी दूसरी गुफामें चले गये ॥ २२ ॥ दिशाओंके दिक्पालों तथा दिग्गजोंने भी विविध गुफाओंका आश्रय लिया। उन सभीके स्थानोंपर दैत्यराज तारकासुरने अपने दैत्योंको नियुक्त कर दिया ॥ २३ ॥ वह निश्चल होकर इस पृथ्वीपर प्रजाओंको शासित करने लगा। जब वह अपने स्वभाववश गर्जना करने लगता था, तब स्वर्गलोक भी काँप उठता था ॥ २४॥ तब इन्द्रादि देवता पर्वतकी गुफामें जाकर पार्वतीपति भगवान् शंकरकी प्रसन्नतापूर्वक गम्भीर वाणीमें स्तुति करने लगे ॥ २५ ॥

२४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] देवता बोले— हे प्रभो! आप पृथ्वी, आकाश, वायु, तेज, जल, सूर्य, चन्द्र तथा यजमानरूपमें स्थित हैं। हे शंकर! आप ही अपनी इच्छासे इस चराचर जगत्‌की सृष्टि करते हैं, आप ही इसका पालन-पोषण करते हैं और आप ही इस सब कुछका संहार भी करते हैं॥ २६॥ हे प्रभो! आप तो दूसरेके दुःखका निवारण करनेवाले हैं, फिर आपके लिये आज अपनी कीर्तिको दूसरेके हाथोंमें सौंपना उचित नहीं है। अतः आप तारकासुरका विनाश करें अथवा अत्यन्त दुखित चित्तवाले और आपकी सेवामें संलग्न मनवाले सभी मुनियों तथा देवोंका विनाश करें॥ २७॥ हे गिरीश! आपको छोड़कर हम अन्य किसकी शरण ग्रहण करें? हे महेश्वर! हे भगवन्! हम किसका भजन करें? पापोंका नाश करनेवाले हे पार्वतीपति! किससे हम अपनी व्यथा कहें? हे अखिलेश्वर! आपको छोड़कर कौन हमारी रक्षा करनेमें समर्थ है?॥ २८॥ ब्रह्माजी बोले— जब वे इस प्रकार स्तुति कर रहे थे, उसी बीच उन्हें यह आकाशवाणी सुनायी दी— 'हे देवो! जब शंकरजीका पुत्र होगा, तभी इस तारकासुरका विनाश होगा, इसके लिये आप लोग प्रयत्न करें।' आकाशवाणी सुनकर सभी देवता अत्यन्त हर्षमें भर गये और इन्द्र आदि वे देवता कैलासपर भगवान् शंकरजीके स्थानपर गये। किंतु वहाँ उन्होंने भगवान् शंकरको नहीं देखा। वहाँ देवताओंने अपने समक्ष मूलप्रकृतिस्वरूपा भगवती उमाका दर्शन किया। सभी देवताओंने उनसे निवेदन किया कि हे तारके! आप तारक मन्त्र प्रणवका ज्ञान प्रदान करनेवाली हैं। आप तीनों लोकोंको पीड़ा पहुँचानेवाले दुष्ट तारकासुरद्वारा अपने स्थानसे च्युत कर दिये गये मुनियों तथा देवताओंकी रक्षा करें और हे मात:! जैसे उसका विनाश हो सके, उस उपायका आप चिन्तन करें॥ २९-३३॥ हे शर्वाणि! आप तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाली हैं, आप देवमाताको हम प्रणाम करते हैं। हे त्रिपुरस्वरूपा! हे परात्परकलारूपा! आप ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा स्तुत होनेवाली हैं। आपका यथार्थ स्वरूप वेदोंद्वारा भी अज्ञेय है। हे शंकरप्रिये! आप जगत्‌का कल्याण करें। हे

[दायाँ स्तम्भ] अनघे! आप अपनी इच्छासे अपना सुन्दर स्वरूप धारण करनेवाली हैं, असुरोंका संहार करनेवाली हैं और इस विश्वकी आदिकारणभूता हैं॥ ३४॥ ब्रह्माजी बोले— इस प्रकारसे प्रार्थित वे जगन्माता भगवती पार्वती उन देवताओंसे बोलीं— 'आकाशवाणीको मैंने जान लिया है, वे शंकर निश्चित ही कल्याण करेंगे। जहाँपर वे भगवान् शंकर स्थित हैं, मेरे साथ ही आप सभी वहाँ चलें। वे भगवान् शंकर उत्तम नियमोंका पालन करते हुए परम तप कर रहे हैं'॥ ३५-३६॥ सभी देवताओंसे इस प्रकार कहकर उन पार्वतींने भिल्लिका वेश धारण किया, जिससे कि उसे देखकर वे परम योगी शिव कामके बाणोंके वशीभूत हो जायँ। उनका वह रमणीय स्वरूप देखकर उस समय कुछ देवता भी कामविह्वल हो गये। उन सर्वांगसुन्दरीको देखकर उर्वशी, मेनका, रम्भा, पूर्वचित्ति आदि अप्सराएँ तथा कामपत्नी रति भी लज्जित हो रही थीं। हे ब्रह्मन्! हे व्यासजी! तदनन्तर सभी देवता और वे गिरिपुत्री पार्वती उस समय भगवान् शिवके पास पहुँचे॥ ३७-३९॥ उन सभी देवताओंने स्थाणुभूत उन स्थाणु शिवका दर्शन किया। उनके नेत्र ध्यानावस्थामें निश्चल थे। वे मनसे परब्रह्मका ध्यान और जप कर रहे थे, वे सभी प्रकारके संग्रहोंसे रहित थे, भिल्लीका वेश धारण की हुई उन पार्वतींने भी उन त्रिलोचन शिवका दर्शन किया। तदनन्तर देवी उमाने सभी देवताओंसे सुखपूर्वक किया जानेवाला उपाय बताया॥ ४०-४१॥ [और कहा— हे देवो!] ये सदाशिव देहके भानसे रहित होकर तपस्यामें एकनिष्ठ होकर बैठे हैं, अतः इनको देहका भान करानेके लिये आपलोग कामदेवसे प्रार्थना करें। ये एकनिष्ठ सदाशिव जब उस कामके बाणसे विद्ध होंगे, तो इनका देहभाव जाग्रत् हो जायगा और तब तुम्हारा कार्य हो जायगा॥ ४२-४३॥ तदनन्तर सभी देवताओंने उत्कट कामदेवका स्मरण किया। उस कामदेवके उपस्थित हो जानेपर अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये निश्चययुक्त बुद्धिवाले देवताओंने उसे अपना प्रयोजन बतलाया। दूसरे देवताओंने अपना कार्य सम्पन्न करनेके लिये कामदेवकी प्रार्थना करते हुए कहा— ॥ ४४१/२ ॥

उ०ख०-अ०८४ ] * कामदेवद्वारा समाधिस्थ भगवान् शंकरको विचलित करना * २४७ आप इस चराचर जगत्के सभी प्राणियोंमें व्याप्त हैं। आपसे ही यह सृष्टि उत्पन्न होती है और यह सारा जगत् आपसे व्याप्त है, सभी पुरुष तथा स्त्रियाँ आपके द्वारा ही बलवान् बना दिये जाते हैं। आपके बिना यह सम्पूर्ण स्थावर-जंगमात्मक जगत् निःसार है। अतः आपको हम सभीका महान् कार्य अवश्य करना चाहिये ॥ ४५-४७ ॥ कामदेव बोला—मैं यद्यपि [इन महायोगीको विह्वल करके मानो] अग्निमें ही प्रवेश करने जा रहा हूँ, तथापि आपके अनुग्रहसे मैं देहके विनष्ट होनेतक आपलोगोंका कार्य अवश्य करूँगा ॥ ४८ ॥ हे देवो! यद्यपि पुष्प ही मेरा धनुष है, भ्रमर ही धनुषकी प्रत्यंचा है, स्त्रियोंका कटाक्ष ही बाण है और वसन्तऋतु ही मेरा सहयोगी है, तथापि मैं भगवान् शंकरसहित सभी देवताओंपर विजय प्राप्त कर लूँगा ॥ ४९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर देवताओंके कार्यको सिद्ध करनेके प्रयोजनसे तथा भगवान् शंकरको कामके वशीभूत करनेके लिये वह कामदेव वहाँ गया, जहाँ भगवान् शंकर स्थित थे ॥ ५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'तारकासुरोत्पत्तिकथन' नामक तिरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८३ ॥ चौरासीवाँ अध्याय कामदेवद्वारा समाधिस्थ भगवान् शंकरको विचलित करना, उनकी नेत्राग्निसे कामका दग्ध होना, पार्वतीद्वारा शंकरकी स्तुति तथा शिव-पार्वतीका कैलासगमन ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर कामदेव देवताओंके कार्यको सफल बनानेके लिये निकल पड़े और उन्होंने भगवान् शंकरका वह स्थान देखा, जो अनेक प्रकारके वृक्षों तथा लताओंसे सुशोभित था, सिंहों तथा शार्दूलोंसे सेवित था और पक्षियों तथा हिंसक पशुओंसे समन्वित था। तब कामदेवने उसी समय क्षणभरमें वहाँ एक मायामय उपवनकी संरचना की ॥ १-२ ॥ उस उपवनमें अनेक सरोवर थे, जो अमृतोपम जलसे परिपूर्ण थे। वहाँ अनेक वृक्ष तथा पुष्प थे, जिनकी सुगन्ध दो कोसतक व्याप्त थी। वहाँ भली-भाँति पके हुए जामुन, आम तथा बेरके फलवाले वृक्ष थे। उसी प्रकार उस उपवनमें केला, कटहल, नारियल, खर्जूर, इलायची, लौंग तथा मिरचके अनेकों प्रकारके वृक्ष थे। भगवान् शिवके द्वारा [इससे पूर्व] ग्रहण न की जानेवाली वह पुष्पोंकी सुगन्ध (कामदेवके प्रभावसे) उनके नासापुटोंमें प्रविष्ट हो गयी ॥ ३-५ ॥ उषाकाल होनेपर भगवान् शिवने कामदेवके द्वारा मायासे निर्मित उस अद्भुत उपवनको देखा, जो चन्द्रमाकी चाँदनीसे अत्यन्त मनोहर प्रतीत हो रहा था और अनेक फलों तथा पुष्पोंसे समन्वित था ॥ ६ ॥ उसी समय कामदेवने त्रिशूली भगवान् शंकरके मनको अपने कामबाणोंसे विद्ध कर डाला। [कामदेवद्वारा मायासे निर्मित उस वाटिकाको देखकर] भगवान् शिवने मन-ही-मन अपनी अशोकवाटिकाको धिक्कारा ॥ ७ ॥ उसी समय भगवान् शिवका देहभाव जाग्रत् हो गया, तब वे इसका कारण सोचने लगे कि किसने मेरी तपस्यामें विघ्न उपस्थित किया और इस सुन्दर उपवनकी रचना किसने की? क्रोधसे शिवके नेत्र लाल हो उठे,

२४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- उनकी भौंहें तन गयीं और वे बोले- 'मृत्युके समीप | शास्त्रोंका स्वाध्याय होता है और न यज्ञादिकी आहुतियाँ पहुँचे हुए किस दुष्टने अकस्मात् इस उपवनकी रचना | ही पड़ती हैं। सभी देवता अपने-अपने स्थानोंसे च्युत हो कर डाली है।' कामदेव भयसे संत्रस्त होकर छिप गया, | गये हैं। हे अनघ ! उन सभी देवताओंने आपको तपस्यामें किसीके लिये दृश्य नहीं हुआ। उसने उस समय इन्द्रादि | लीन देखकर आपको देहभावकी प्राप्ति करानेके लिये देवताओंका स्मरण किया, किंतु स्मरण किये जानेपर भी | शीघ्र ही कामदेवको बुलाकर आपके पास भेजा, किंतु वे देवता वहाँ नहीं आये ॥ ८-१० ॥ | वह आप श्रेष्ठ व्यक्तिके प्रति किये गये अपराधके कारण सभी देवता कार्यकी सफलताको देखनेके लिये अपने- | भस्म हो गया है ॥ १५-१७ ॥ अपने विमानोंमें आरूढ़ हो गये थे। उसी समय भगवान् | हे देव! इस समय आप हमारी रक्षा करें। हम सब शिवने कामदेवको देखा, जो अत्यन्त लघु एवं कृश | आपकी शरणमें आये हैं। आप शरणमें आये हुएकी रक्षा शरीरवाला हो गया था। तब उन्होंने कामदेवको भस्म करनेके | करनेवाले हैं-इस रूपमें आप तीनों लोकोंमें विख्यात लिये अपने तीसरे नेत्रको खोला। उस समय सम्पूर्ण पृथ्वी, | हैं। हे महादेव ! हे करुणाकर ! हे शंकर ! आपकी शरण स्वर्ग तथा पाताल भी कम्पित हो उठा ॥ ११-१२॥ | ग्रहण करनेकी इच्छा रखनेवाले दीन देवताओंके अपराधको 'इस कामदेवको मत मारिये' - ऐसा जबतक देवता | आप क्षमा करें ॥ १८-१९॥ कह ही रहे थे कि उनके नेत्रसे उत्पन्न अग्निने उसी बीच | ब्रह्माजी बोले- हे मुने ! अपने चरणोंमें सिर रखी कामदेवको भस्म कर डाला। अब वह केवल भस्ममात्र | हुई उन भिल्लीरूपा पार्वतीके इस प्रकारके वचनोंको ही शेष रह गया था। तदनन्तर तीनों लोकोंके कल्याणकी | सुनकर भगवान् शंकरने अपनी नेत्राग्निको शान्त कर कामनासे भिल्लीरूप धारण की हुई देवी पार्वतीने दोनों | लिया और प्रसन्नमुख होकर वे कहने लगे-उठो-उठो, हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया और बड़े ही | आज तुमने मेरे चरणोंमें गिरकर अपने वचनोंके द्वारा तथा आदरपूर्वक उनसे प्रार्थना की ॥ १३-१४॥ | अपने स्नेहके द्वारा देवताओंकी रक्षा की है ॥ २०-२१ ॥ हे शंकर ! तीनों लोकोंको जला देनेवाली इस | तदनन्तर उन भिल्लीरूपा पार्वतीका सहसा अग्निको आप शान्त करें। ब्रह्माजीसे वरदान प्राप्तकर | आलिंगनकर भगवान् शंकरने उन्हें अपनी गोदमें ले लिया दैत्य तारक अत्यन्त बलशाली हो गया है। उसने तीनों | और वे उन्हें लेकर अपने वृषभमें आरूढ़ होकर लोकोंको आक्रान्त कर डाला है। अब न तो कहीं वेदादि | कैलासकी ओर चले गये ॥ २२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कामदहन' नामक चौरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८४ ॥

पचासीवाँ अध्याय भगवान् शिव-पार्वतीका क्रीडा-विहार, देवताओंकी प्रार्थनापर अग्निदेवका भिक्षुकरूपमें उनके समीप जाकर भिक्षाकी याचना करना, माता पार्वतीका भिक्षाके रूपमें उन्हें शिवतेज प्रदान करना, अग्निदेवद्वारा उस तेजको गंगामें प्रवाहित करना, छः कृत्तिकाओंद्वारा शिवतेजका धारण और षण्मुखका प्रादुर्भाव

ब्रह्माजी बोले- भगवान् शिवके आलिंगनके | मध्यमें गयीं, किंतु वहाँ भी उन्हें शान्ति नहीं मिली। प्रभावसे भिल्लीरूपा वे पार्वती कामाग्निसे उद्दीप्त हो | स्थलपर भी उन्हें निद्रा नहीं आती थी ॥ १-२ ॥ उठीं और जैसे मछली जलरहित स्थानमें छटपटाती है, | कपूर तथा चन्दन (-जैसे शीतल पदार्थ) भी उन्हें वैसे ही उन्हें भी कहीं भी सुखकी प्राप्ति नहीं हो रही | अधिक ताप प्रदान कर रहे थे। कोई भी शीतल पदार्थ थी। अपने शरीरमें शीतल उशीरका लेप करके वे जलके | उन्हें सन्तोष नहीं प्रदान कर पा रहा था ॥ ३ ॥

उ०ख०-अ०८५ ] * भगवान् शिव-पार्वतीका क्रीडा-विहार * २४९ इसी प्रकार बहुत समय बीत जानेपर वे अस्थि और चर्ममात्र शरीरवाली हो गयी थीं। तदनन्तर भगवान् शंकरके पास जाकर गिरिजाने यह वचन कहा- ॥४॥ हे देव! आप मेरे विषयमें कुछ भी नहीं सोच रहे हैं कि मैं किस अवस्थाको प्राप्त हो गयी हूँ। अहो! बड़े आश्चर्यकी बात है कि दग्ध हुआ भी वह कामदेव मुझे अत्यन्त पीड़ा पहुँचा रहा है ॥ ५ ॥ मैंने उसे शान्त करनेके नानाविध उपाय किये, किंतु वह शान्त नहीं हुआ। हे मेरे स्वामिन् ! जिस उपायके द्वारा शान्ति प्राप्त हो, आप वह उपाय करें ॥ ६॥ अपनी प्रियाका हित करनेवाले भगवान् शंकरने इस प्रकारके वचनोंको सुनकर एकान्त स्थानमें उनका हाथ पकड़कर उन्हें शय्यापर बैठाया। कामदेवके द्वारा वशीभूत किये गये शंकरने उनके साथ यथेष्ट रमण किया। कामदेवने मृत्युको प्राप्त करके भी देवताओंके द्वारा कहे गये महान् कार्यको सम्पादित कर दिया ॥ ७-८॥ [ऐसा करके उसने] 'कामदेव अतुलनीय धनुर्धर है' इस प्रसिद्धिको पा लिया। क्रीडाविलासमें निमग्न उन उमा-महेश्वरके साठ हजार वर्ष व्यतीत हो गये ॥ ९ ॥ अपने-अपने स्थानोंसे च्युत हुए देवता तथा मुनिगण कामदेवके ऐसे प्रयत्नको सुनकर पुनः कैलासपर्वतपर आये और वहाँ भगवान् शिवको क्रीडामें निमग्न जानकर वे चिन्ताके कारण व्याकुल चित्तवाले हो गये एवं मौन होकर वहाँ स्थित हो गये। तारकासुरसे भयभीत होकर वे पुनः गुफामें चले गये ॥ १०-११ ॥ इस तारकासुरका वध कब होगा, कब हम अपने स्थानोंमें जायँगे और कब भगवान् शंकर हमारे दुःखका विनाश करेंगे- इसी चिन्तासागरमें जब वे ब्रह्मा आदि देवता निमग्न थे, उसी समय देवगुरु बृहस्पतिजी उनसे बोले- 'हे अनघो! आप लोग मेरे वचनको सुनें ॥ १२-१३ ॥ आप लोग अग्निदेवको अन्य रूप धारण कराकर शिवके पास भेजें, वे शीघ्र ही शंकरको प्रबोधित करेंगे, इससे आपका कार्य बन जायगा। तब देवताओंने अग्निदेवको बुलाया और विविध प्रकारकी स्तुतियोंसे उनका स्तवन किया ॥ १४१/२ ॥ देवता बोले- हे ब्रह्मन् ! आपसे ही समस्त यज्ञक्रियाएँ और सभी संस्कार सम्पन्न होते हैं। आप ही जलके कारणभूत हैं, आप देवताओंके मुख हैं, आप गार्हपत्य आदि नामोंसे अग्निहोत्रके प्रणेता हैं। हे ईश! आप ही नित्यप्रति [बड़वानलरूपसे] समुद्रकी महान् जलराशिका पान किया करते हैं। आप ही मनुष्योंके जठरदेशमें जठराग्नि नामसे षड्रसोंका पाचन करते हैं॥ १५-१७॥ आप ही सभी जीवोंकी हड्डियोंके प्रत्येक जोड़ोंमें स्थित होकर उन्हें संचालित करते हैं, आपसे रहित होनेपर जीव 'प्रेत' इस संज्ञाको प्राप्त करता है और आपके द्वारा ही मृत शरीरका दाह किया जाता है ॥ १८ ॥ हे देवेश ! प्रत्येक प्राणियोंके प्राण धारण करनेमें आप ही हेतुभूत हैं। आप अग्निके बिना तथा जलके बिना कहीं भी अन्नको पकाया नहीं जा सकता ॥ १९ ॥ आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही रुद्र हैं और आप ही अनेक रूप धारण करनेवाले सूर्यदेवके रूपमें उत्पन्न होते हैं। हे जगदीश्वर ! आप ही क्रोधके मूलकारण हैं ॥ २० ॥ जहाँ-जहाँ भी तेज दिखलायी पड़ता है, वह सब आपका ही रूप है। अतः तीनों लोकोंका उपकार करनेवाले हे अग्निदेव ! आपसे आज हम देवता प्रार्थना करते हैं* ॥ २१ ॥ हे विभो ! उस तारकासुरने अपने आक्रमणद्वारा

  • देवा ऊचुः त्वत्तो यज्ञक्रिया ब्रह्मन् संस्काः सर्व एव हि॥ अपां त्वमसि हेतुश्च देवानां मुखमेव च। अग्निहोत्रप्रणेता त्वं गार्हपत्यादिनामभिः ॥ त्वमेव पिबसीशाब्धिवारि नित्यं महत्तरम्। त्वमेव पचसे नृणां जठरे षड्रसानपि ॥ त्वमेव सर्वजन्तूनां सन्धी सन्धी विचेष्टसे । त्वया त्यक्तं प्रेतसंज्ञां लभते दह्यते त्वया ॥ हेतुस्त्वमसि देवेश जन्तूनां प्राणधारणे । त्वयाद्भिश्च विना चान्नं पक्तुं शक्यं न च क्वचित् ॥ त्वमेव ब्रह्मा रुद्रश्च सूर्यश्चानेकरूपधृक् । त्वमेव जायसे मूलं क्रोधस्य जगदीश्वर ॥ यत्र यत्र भवेत्तेजस्तत्तद्रूपं तवैव च । अतस्त्वां प्रार्थयामोऽद्य त्रिलोक्या उपकारक ॥

२५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तीनों लोकोंको अपने अधीन कर लिया है। आप उस | लिये वहाँपर आयीं ॥ ३११/२ ॥ आकाशवाणीको जानते ही हैं और कामदेवकी जो दुर्गति | तदनन्तर अग्निने यह समझकर गंगाजीके शीतल हुई है, वह भी आपको ज्ञात है ॥ २२ ॥ | जलमें उस तेजको डाल दिया कि ये गंगाजी यदि चिरकालसे क्रीडामें निमग्न भगवान् शंकर और | भगवान् शिवकी प्रिया होकर जलरूपमें स्थित हैं, तो ये पार्वतीको आप उद्बुद्ध करें। आप अपना दूसरा रूप | निश्चित ही इस वीर्यरूप तेजको धारण करनेमें समर्थ धारणकर वहाँ जाकर भिक्षाकी याचना करें। ऐसा | होंगी ॥ ३२१/२ ॥ करनेसे सम्पूर्ण जगत्का तथा हमारा भी कल्याण | तदनन्तर स्नानके लिये आयी हुई उन छः स्त्रियोंने होगा ॥ २३१/२ ॥ | उस शिववीर्यके छः भागकर पृथक्-पृथक् उसे ग्रहण ब्रह्माजी बोले-देवताओंका ऐसा वचन सुनकर | कर लिया। वे अग्निदेव उसी क्षण अन्तर्धान हो गये और वे अग्निदेव काषाय वस्त्र धारण करके ब्राह्मणका रूप | दूर पहुँच जानेपर उनके शरीरका शूल भी दूर हो बनाकर उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् शंकर एवं | गया ॥ ३३-३४ ॥ पार्वती क्रीडामें निमग्न थे। उन्होंने बाहर ही स्थित होकर | स्नानके अनन्तर वे स्त्रियाँ वस्त्र धारणकर अपने- 'भिक्षा दीजिये'-इस प्रकारसे तीन बार बड़े ही ऊँचे | अपने घर चली गयीं। उनके पतियोंने देखा कि उनकी स्वरमें कहा। उन दोनोंने वह ध्वनि सुन ली। तदनन्तर | पत्नियोंका मुखमण्डल अत्यन्त प्रकाशमान हो रहा है। उन अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर वे दोनों आपसमें कहने | मुनीश्वरोंने ज्ञानदृष्टिसे यह जान लिया कि ये गर्भावस्थाको लगे कि वस्त्र धारण कर लो। यह कौन है, जो यहाँ | प्राप्त हो गयी हैं। उन्होंने उन्हें गृहसे बाहर कर दिया और आ गया है, भिक्षामें इसे कौन-सी वस्तु दी जाय-इस | अपना मुख न दिखलानेको कहा ॥ ३५-३६ ॥ प्रकार वे विचार करने लगे ॥ २४-२७॥ | तब वे पुनः एकत्र होकर सरकण्डोंसे सुशोभित भगवान् शंकरके तेजको धारण करनेमें असमर्थ | गंगाजीके तटपर पहुँचीं और उन्होंने अपने-अपने गर्भको देवी उमाने उस तेजको अपनी अंजलिमें धारण किया | उन सरकण्डोंमें त्याग दिया। तदनन्तर स्नान करके पवित्र और भवितव्यताको भलीभाँति समझते हुए उन्होंने वह | होकर वे अपने घरोंको गयीं ॥ ३७ ॥ तेज उन भिक्षुक अग्निदेवको समर्पित कर दिया ॥ २८ ॥ | अपने-अपने गर्भका परित्यागकर जब वे छहों अग्निदेवने विचार किया कि इस तेजको यदि मैं | स्त्रियाँ वापस चली गयीं, तो छः मुखों तथा बारह भूमिपर गिरा देता हूँ, तो यह चराचर जीवोंसहित सम्पूर्ण | हाथोंवाला एक बालक वहाँ प्रादुर्भूत हो गया ॥ ३८ ॥ त्रिलोकीको दग्ध कर डालेगा, अतः उन्होंने भगवान् | उसके हुंकारमात्रसे ग्रह-नक्षत्र एवं तारे आकाशसे शंकरके उस तेजको उन दोनोंके शापसे भयभीत होकर | पृथ्वीपर गिरने लगे। सम्पूर्ण धरती, शेषनाग तथा स्वयं पी लिया। इसके फलस्वरूप वे अग्निदेव गर्भवान् | पाताललोक काँप उठा। वृक्ष उखड़ने लगे, सूर्य बादलोंसे हो गये, उन्हें अत्यन्त लज्जा तथा संताप हो उठा। वे | आच्छादित हो गये। इसी समय दिव्य दृष्टिवाले देवर्षि अग्नि जहाँ-जहाँ भी जाते, कहीं भी उन्हें शान्ति प्राप्त | नारद वहाँ आ उपस्थित हुए ॥ ३९-४० ॥ नहीं हुई ॥ २९-३० ॥ | नारदजी भगवान् शंकरका दर्शन करने जा रहे थे, तुला राशिमें भगवान् सूर्यके संक्रमण करनेपर एक | मार्गमें उन्होंने उस बालकको देखा। वह बालक अत्यन्त दिन उषाकालमें ही उठकर वे अग्निदेव गंगामें स्नान | दीप्तिमान्, महान् बलशाली तथा अपने तेजके कारण करनेके लिये गये। स्नानसे पूर्व वे जबतक शौच आदि | दुर्दर्शनीय था ॥ ४१ ॥ क्रियाओंसे निवृत्त हुए, उसी बीच छः स्त्रियाँ भी | ध्यान लगाकर उस बालकके विषयमें सब कुछ श्रद्धाभक्तिके साथ कार्तिकमासमें गंगाजीमें स्नान करनेके | जानकर वे नारद मौन होकर कैलासपर्वतपर चले आये

उ०ख०-अ०८६ ] * ब्रह्मा तथा बृहस्पतिद्वारा स्कन्दका नामकरण * २५१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 और उन्होंने भगवान् शंकर तथा देवी पार्वतीको सम्पूर्ण | वह गंगाजीके तटपर पड़ा हुआ है, क्या आपने वृत्तान्त बतलाया ॥ ४२ ॥ | उस षण्मुख बालकका परित्याग कर दिया है। वह उस बालकको भगवान् शिवका पुत्र जानकर | करोड़ों कामदेवोंकी शोभासे समन्वित है, और अपनी सम्पूर्ण पृथिवी आनन्दित हो उठी। देवता दुन्दुभियाँ | गर्जनासे सम्पूर्ण लोकोंको क्षुब्ध कर रहा है। हे बजाने लगे और गन्धर्व अद्भुत गान करने लगे ॥ ४३ ॥ | गौरि ! उस सुन्दर बालकके प्रति आपने निष्ठुरता क्यों नारदजी बोले- हे देवि पार्वती ! मैंने यहाँ आते | की है ? ॥ ४५ १/२ ॥ समय मार्गमें तुम्हारे पुत्रको देखा है। उसके छः मुख हैं, | ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहनेके अनन्तर उन बारह भुजाएँ हैं और वह करोड़ों सूर्योंके समान | देवर्षि नारदजीके अन्तर्धान हो जानेपर वे देवी गौरी उस आभावाला है ॥ ४४ ॥ | बालकके समीप गयीं ॥ ४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'स्कन्दोपाख्यान' नामक पचासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८५ ॥ छियासीवाँ अध्याय ब्रह्मा तथा बृहस्पतिद्वारा स्कन्दका नामकरण, देवताओंद्वारा स्कन्दका 'सेनापति' पदपर अभिषेक, स्कन्दका वरदचतुर्थीके माहात्म्यके विषयमें शिवजीसे प्रश्न करना ब्रह्माजी बोले-उस प्रकारके बालकको देखकर | उसका नामकरण संस्कार करनेके लिये भगवान् देवी पार्वतीके स्तनोंसे दूध टपकने लगा। देवी सतीने | शिवने ब्रह्माजी और देवगुरु बृहस्पतिको बुलाकर उन प्रसन्नतापूर्वक बालकका आलिंगन किया, उस समय | दोनोंसे कहा कि 'आप लोग इस बालकका नाम रखें' ॥ ७ ॥ बालक उनके हृदयदेशमें स्थित था। उसी समय गम्भीर | ब्रह्मा तथा बृहस्पति बोले- हे भगवन् ! चूँकि स्वरवाली देवी गंगाने उनसे कहा कि 'यह बालक मेरा | यह बालक कार्तिकमासमें उत्पन्न हुआ है, इसलिये है', अग्निदेवने उपस्थित होकर उन गिरिकन्या पार्वतीसे | इसका 'कार्तिकेय' यह प्रथम नाम विख्यात होगा। कहा- 'यह मेरा पुत्र है' ॥ १-२ ॥ | इसका अन्य दूसरा नाम 'पार्वतीनन्दन' भी होगा। इसका कृत्तिका आदि छः स्त्रियोंने उनसे कहा कि 'यह | जन्म शरकण्डोंमें हुआ है, अतः यह 'शरजन्मा' भी बालक हमसे उत्पन्न हुआ है', रोते हुए व्याकुल होकर | कहलायेगा। कृत्तिकाओंसे उत्पन्न होनेसे भी यह 'कार्तिकेय' वे स्त्रियाँ कहने लगीं-'यह बालक हमारा ही है' ॥ ३ ॥ | इस नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ ८-९ ॥ इस प्रकार विवाद करती हुई वे स्त्रियाँ अग्निदेवको आगे | चूँकि [कृत्तिका आदि] इसकी छः माताएँ हैं, करके देवताओंके निवास-स्थल कैलासपर्वतपर चन्द्रमाको | इसलिये 'षाण्मातुर' भी इसका नाम होगा। आपका यह शिरपर धारण करनेवाले भगवान् शिवके पास गयीं ॥ ४ ॥ | पुत्र दैत्य तारकपर विजय प्राप्त करेगा, इसलिये यह उन सबसे भी पहले देवी पार्वती वहाँ पहुँचीं, वे | 'तारकजित्' नामसे भी प्रसिद्ध होगा ॥ १० ॥ अपनी गोदमें अपने उस बालकको लिये हुए थीं। भगवान् | यह भविष्यमें देवोंकी सेनाका पति होगा, इसलिये शिवने उस बालकको अपनी गोदमें धारण करके मन्त्रोच्चार- | 'सेनानी' नामसे भी इसे पुकारा जायगा। सेनापति पूर्वक उसके सिरको सूँघा और वे भगवान् त्रिलोचन उस | होनेके कारण यह 'महासेन' कहलायेगा। इसके छः बालकके साथ बड़ी प्रसन्नतापूर्वक क्रीडा करने लगे। देवी | मुख होनेसे यह 'षडानन' भी कहा जायगा। चूँकि गंगा, अग्निदेव और वे कृत्तिका आदि छहों स्त्रियाँ जैसे | भगवान् शिवका रेत तीन बार स्खलित हुआ, इसलिये आयी थीं, वैसे ही अपने घरोंको चली गयीं ॥ ५-६ ॥ | यह 'स्कन्द' कहा जायगा। ब्रह्मा और बृहस्पतिके

२५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 द्वारा इस प्रकार कहे जाते समय इन्द्र आदि देवता भी वहाँ उपस्थित हो गये ॥ ११-१२ ॥ उन सभी देवताओंने वहाँ हर्ष प्रकट किया, उन कार्तिकेयकी पूजा की तथा उनका स्तवन-वन्दन किया। दिव्य वाद्योंकी ध्वनि पृथ्वी, आकाश और रसातलमें गूँज उठी। तदनन्तर देवताओंने उन सेनानी कार्तिकेयको प्रणामकर उनसे कहा—'हे देव! तीनों लोकोंके लिये कंटक बने तारकासुरका विनाश करें' ॥ १३-१४॥ उन्होंने अभिषेककी विविध सामग्रियोंसे अनेक मुनियोंद्वारा उच्चरित किये गये वैदिक तथा तान्त्रिक मन्त्रोंद्वारा उनका सेनापति पदपर अभिषेक किया ॥ १५ ॥ तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्तकर वे सभी देवता अपने स्थानोंपर आ गये। उद्वेगरहित ऋषिगण भी पहलेकी भाँति तप करने लगे। कार्तिकेयके सेनापति होनेपर अब देवताओं तथा मुनियोंको कहीं भी भय नहीं रह गया था। वह बालक उसी प्रकार वृद्धिको प्राप्त करने लगा, जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ता रहता है ॥ १६-१७ ॥ एक दिनकी बात है, बालस्वभाववश वह बालक कार्तिकेय चन्द्रमाको पकड़नेके लिये उड़ चला, तब ब्रह्माजीने उसे रोका और कहा—'ऐसा साहस मत करो'। उस बालकने अपनी बुद्धिके द्वारा देवगुरु बृहस्पतिको और अपने पराक्रमद्वारा देवराज इन्द्रको भी जीत लिया। एक बारकी बात है, जब पार्वतीके साथ भगवान् शंकर सुखपूर्वक बैठे हुए थे, तो कार्तिकेयने उन्हें प्रणाम करके सभी कामनाओंकी सिद्धिके लिये उनसे पूछा— ॥ १८–१९ १/२ ॥ स्कन्द बोले—हे पिताजी! आप तीनों लोकोंके गुरुके द्वारा मैंने नाना प्रकारकी मंगलमयी महान् कथाओंको सुना है, तथापि मुझे पूर्ण सन्तुष्टि प्राप्त नहीं हुई है, हे देव! आप मुझे कोई मंगलमय व्रत बतलाइये, जो सभी प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाला हो, पुत्र, सम्पत्तिको बढ़ानेवाला हो, सभी प्रकारके पापोंका विनाशक, धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षको देनेवाला हो और सभी शत्रुओंपर विजय दिलानेवाला हो ॥ २०–२२ ॥ ईश्वर बोले—हे स्कन्द! तुमने सभी लोगोंका उपकार करनेवाले व्रतके विषयमें बहुत अच्छी बात पूछी है। मैं तुम्हें उस व्रतके विषयमें बता रहा हूँ, जो मानवोंको सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। वह व्रत सभी पापोंका हरण करनेवाला, धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला, सभी शत्रुओंका विनाश करनेवाला, पुत्र, सम्पत्तिको बढ़ानेवाला, अलक्ष्मीद्वारा उत्पन्न संकटको दूर करनेवाला और भगवान् गणेशजीको प्रसन्न करनेवाला है ॥ २३–२४ १/२ ॥ जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस व्रतको करता है, वह देवताओंके लिये भी पूज्य हो जाता है, अपनी स्वेच्छासे जहाँ-कहीं भी विचरण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है, इतना ही नहीं; वह सृष्टि, पालन तथा संहार करनेमें भी समर्थ हो जाता है। उसका दर्शन करनेवाले दूसरे लोगोंका महापाप भी विनष्ट हो जाता है ॥ २५-२६ ॥ हे स्कन्द! इस वरदचतुर्थीव्रतकी तुलना अन्य किसी व्रतसे नहीं की जा सकती। भगवान् शंकरद्वारा कही गयी ऐसी वाणी सुनकर सेनानी स्कन्दने पिता शंकरजीसे पुनः वरदचतुर्थीव्रतकी महिमाके विषयमें पूछा— ॥ २७ १/२ ॥ स्कन्द बोले—हे हर! इस वरदचतुर्थीव्रतके माहात्म्यको आप मुझे विस्तारसे बतलाइये। इस व्रतका

सतासीवाँ अध्याय

उ०ख०-अ०८७ ] * वरदचतुर्थीव्रतका विधान * २५३ प्रारम्भ किस दिनसे किया जाता है, इस व्रतकी विधि | प्रसन्न हैं, तो सभी मानवोंके कल्याणके लिये तथा इस क्या है, इसका फल क्या है और इस व्रतकी महिमाका | व्रतकी प्रसिद्धिके लिये यह सब मुझे पूर्ण रूपसे किसे प्रत्यक्ष हुआ है? हे शंकर! यदि आप मुझपर | बताइये॥ २८-३०॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'स्कन्दोपाख्यान' नामक छियासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८६॥

सतासीवाँ अध्याय वरदचतुर्थीव्रतका विधान, शिवजीके उपदेशसे स्कन्दद्वारा वरदचतुर्थीव्रतका प्रत्यक्ष अनुष्ठान, कार्तिकेयको लक्ष्यविनायक गणेशजीके दिव्य स्वरूपका दर्शन और अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, कार्तिकेयद्वारा लक्ष्यविनायक गणेशकी प्रतिमाकी स्थापना और तारकासुरका वध

शंकरजी बोले- [हे स्कन्द!] इस व्रतकी उत्तम विधिको मैं तुम्हें बताता हूँ। श्रावणमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीसे यह व्रत आरम्भ करना चाहिये॥ १॥ व्रतीको चाहिये कि व्रतके दिन प्रातःकाल तिल और आँवलेके चूर्णका उबटन लगाकर स्नान करे। क्रोधसे रहित होकर नित्य-नैमित्तिक सभी क्रियाओंको सम्पन्न करे। तदनन्तर किसी पवित्र स्थानमें एक मण्डपका निर्माण करे, जो केलेके स्तम्भसे सुसज्जित हो तथा जो ईख, चामर एवं पुष्पोंसे सुशोभित हो और दर्पणोंकी पंक्तिसे मण्डित हो॥ २-३॥ उस मण्डपके मध्य देशमें दो वस्त्रोंसे वेष्टित एक कलशकी स्थापना करे और वहीं चन्दनसे आठ दलवाले एक कमलकी रचना करे। तदनन्तर गुरुकी अनुमति लेकर पूजाकी सामग्रीका (जलसे) प्रोक्षण करे और सोलह उपचारोंके द्वारा गणनायक गणेशजीकी पूजा करे॥ ४-५॥ भगवान् गणेशकी प्रतिमा अपने-अपने सामर्थ्यके अनुसार सुवर्णकी अथवा रजतकी बनवाये। इक्कीस प्रकारके पक्वान्नोंको इक्कीस-इक्कीसकी संख्यामें बनाकर भगवान् गजाननके लिये नैवेद्य निवेदित करे और इक्कीस मुद्रा दक्षिणाके निमित्त प्रदान करे॥ ६-७॥ भगवान् गणेशके निमित्त दक्षिणारूपमें स्वर्णमुद्रा अथवा रजतमुद्रा अर्पित करे, इसमें कृपणता न करे। इक्कीसकी संख्यामें श्वेत अथवा हरित दूर्वा देवदेव गणेशजीको अर्पित करे, तदनन्तर मन्त्रपूर्वक पुष्पांजलि प्रदान करे, इक्कीसकी संख्यामें ही वेदज्ञ ब्राह्मणोंका पूजन करे॥ ८-९॥

ब्राह्मणोंको इक्कीस प्रकारके ही पक्वान्नोंका भोजन कराये और उतनी ही संख्यामें उन्हें दान दे। तदनन्तर उन्हें प्रणाम करे और उनसे क्षमा-याचना करे। अन्तमें (व्रतकी न्यूनांगतापूर्तिके लिये) उनसे अच्छिद्रवाचन कराये। गणेशजीकी पार्थिवपूजाकी विधिको पूर्वमें बतलाया गया है, उसी विधि-विधानसे यहाँ भी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर गणेशजीका ध्यान करते हुए बन्धु- बान्धवोंके साथ स्वयं भी गणेशजीकी उस कथाका श्रवण करे और फिर भोजन करे अथवा मौन रहकर उपवास करे॥ १०-१२॥ इस प्रकार श्रावणमासकी चतुर्थीसे भाद्रपदमासकी शुक्लपक्षकी चतुर्थीतक एक मासभर व्रत करे। भाद्रपद चतुर्थीको अपनी शक्तिके अनुसार बड़े ही श्रद्धापूर्वक महान् उत्सव मनाये॥ १३॥ उस दिन पूर्वोक्त विधानके अनुसार गणनायक गणेशजीका पूजन करे। रात्रिमें गीत-वाद्यों आदिकी ध्वनियोंसे जागरण करे। साथ ही पुराण तथा अन्य श्रेष्ठ कथाओंका श्रवण करना चाहिये और गणेशजीके सहस्र- नाममन्त्रोंसे उनकी स्तुति करे॥ १४-१५॥ प्रभातकालमें पवित्र जलमें स्नान करके द्विरदानन गणेशजीका पूजन करे तथा श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एक सौ इक्कीस ब्राह्मणोंको भोजन कराये॥ १६॥ यथाशक्ति उन्हें गाय, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, आभूषण तथा धन प्रदान करे। दीनों, अन्धों तथा अनाथोंको भी भोजन-धन आदि प्रदान करे॥ १७॥

२५४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

यदि इतना सामर्थ्य न हो तो इक्कीस ब्राह्मणों अथवा फिर एक ही ब्राह्मणको भोजन कराये। यदि गणेशजीकी स्वर्ण आदि धातुकी मूर्ति बनवायी हो, तो उसे ब्राह्मणको प्रदान कर देना चाहिये। यदि गणेशजीकी प्रतिमा मिट्टीकी बनायी गयी हो; तो उसे पालकीमें रखकर दिव्य वाद्योंकी ध्वनिके साथ बड़े ही उत्साहपूर्वक जलके मध्यमें विसर्जित कर देना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ उस प्रतिमाको ध्वज, पताका आदिसे आच्छादित करके, वेदोंके घोष तथा गीतोंकी ध्वनियों और बालकोंके दण्डयुद्धरूप क्रीड़ा-कौतुकके साथ विसर्जित करके वापस घर आना चाहिये ॥ २० ॥ हे षडानन ! जो इस प्रकारसे एक बार भी गणेशजीका व्रत करता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्तकर अन्तमें गणेशजीके लोकको प्राप्त करता है ॥ २१ ॥ ब्रह्माजीने सृष्टि-रचनाकी शक्ति प्राप्त करनेके लिये भगवान् गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका जप करते हुए यह व्रत किया था। तब गणेशजीने उनके सामने प्रकट होकर उन्हें विविध प्रकारकी शक्ति प्रदान की थी ॥ २२ ॥ भगवान् विष्णुने भी सृष्टिका पालन-पोषण करनेके लिये इस व्रतको किया था और परम अद्भुत षडक्षर महामन्त्रका जप किया था ॥ २३ ॥ हे षडानन ! इस व्रतके प्रभावसे उन्होंने स्वेच्छापूर्वक अवतार धारण करनेकी क्षमता प्राप्त की थी। हे पुत्र ! मैंने भी गणेशजीके अष्टाक्षर मन्त्रका जप करते हुए इस व्रतको किया था ॥ २४ ॥ इससे मैं विविध प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न हो गया और उसी शक्ति-सामर्थ्यसे मैं तीनों लोकोंका संहार करता हूँ। वृत्रासुरका विनाश करनेके लिये देवराज इन्द्रने तथा दैत्य शम्बरासुरका वध करनेके लिये कामदेवावतार प्रद्युम्नने इस व्रतको किया था। इसी कारण वे दोनों उन दोनोंका वध करनेमें समर्थ हुए। यक्षों, गन्धर्वों, मुनियों, किन्नरों, नागों, राक्षसों, सिद्धों, चारणों तथा मानवोंने अपने-अपने इष्टकी सिद्धिके लिये इस व्रतको किया था। अतः हे स्कन्द ! तुम भी इस चतुर्थी व्रतको करो ॥ २५-२७ ॥ इससे तुम युद्धमें अजेय हो जाओगे और तीनों लोकोंमें तुम्हारी प्रसिद्धि हो जायगी। मैं वरदाता गणेशजीका षडक्षर मन्त्र तुम्हें प्रदान करता हूँ ॥ २८ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे द्विजोत्तम ! तदनन्तर शुभ मुहूर्तमें भगवान् शिवने उन्हें षडक्षरी दीक्षा प्रदान की और वे स्कन्द उसी समय तपस्याके लिये निकल पड़े। वे एक ऐसे अत्यन्त निर्मल स्थानमें गये, जो वृक्षों तथा लताओंसे व्याप्त था, बहुतसे मूलवाले तथा फलवाले वृक्षोंसे समन्वित था और अनेक सरोवरों तथा वापियोंसे सुशोभित था ॥ २९-३० ॥ स्कन्दजीने एक पैरपर खड़े होकर अत्यन्त दारुण तप किया और भगवान् शंकरने पूर्वमें जो व्रत बताया था, उसका विधिवत् पालन किया। तब षडक्षर मन्त्रके अनुष्ठान तथा इस वरदचतुर्थी व्रतके प्रभावसे परमात्मा गजानन उनपर अति प्रसन्न हो गये ॥ ३१-३२ ॥ तदनन्तर गणेशजीने सेनानी कार्तिकेयको अपने उस अत्यन्त श्रेष्ठ स्वरूपका दर्शन दिया, जो योगियोंके द्वारा ध्यान करनेयोग्य था, महान् तेजस्वी था, चार हाथोंसे सुशोभित था, महान् मुकुटसे अलंकृत हो रहा था, कुण्डलों तथा बाजूबन्दोंसे मण्डित था। भगवान् गणेशके एक दाँत था, माथेपर चन्द्रमा सुशोभित हो रहा था, उनकी लम्बी सूँड सुशोभित हो रही थी। वे अपने हाथोंमें पाश, अंकुश, माला तथा दाँतको धारणकर सुशोभित हो रहे थे। मोती तथा मणियोंको धारण किये हुए थे। उदरदेशमें नागराजको धारण किये थे। उन्होंने दिव्य वस्त्रोंका परिधान धारण किया हुआ था, दिव्य सुगन्धित द्रव्योंका अनुलेप लगाया हुआ था, वे भगवान् गणेश अनेकों सूर्योंके सदृश आभासे देदीप्यमान हो रहे थे और तेजकी ज्वालासे आभासित थे ॥ ३३-३६ ॥ ऐसे स्वरूपका दर्शनकर वे षण्मुख कार्तिकेय आश्चर्यचकित और विस्फारित नेत्रोंवाले हो गये। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल हो उठा और 'यह क्या है'- इस प्रकारसे वे सोचने लगे। मैंने जिनका ध्यान किया था, क्या ये वे ही हैं या और कोई। मैं इन्हें नहीं जान पा रहा हूँ, ये कौन हैं। तब उन्होंने धीरेसे पूछा- 'आप कौन हैं और आपका नाम क्या है ?' ॥ ३७-३८ ॥ गजानन बोले- हे षडानन ! जिनका तुम एकाग्र मनसे रात-दिन ध्यान किया करते थे, वही मैं तुम्हें वर

उ०ख०-अ०८७] * वरदचतुर्थीव्रतका विधान * २५५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

देनेके लिये प्रस्तुत हुआ हूँ, तुम्हारे हृदयमें जो इच्छा हो, उसे बताओ, मैं गजानन गणेश तुम्हारी तपस्यासे प्रसन्न हूँ और तुम्हें यथेष्ट वर देता हूँ॥ ३९॥ स्कन्द बोले- हे जगदीश्वर ! आपके जिस यथार्थ स्वरूपको न देवता जानते हैं, न शास्त्रकार मुनिगण, न ब्रह्मा आदि देवता और न ही शेषनाग आदि प्रमुख नाग; हे द्विरदानन ! उसी स्वरूपका आज मुझे सम्यक् रूपसे दर्शन प्राप्त हुआ है॥ ४० ॥ आपके दर्शन हो जानेसे ही आज मैं पूर्ण मनोरथवाला हो गया हूँ। हे देव ! फिर भी आपके कथनके अनुसार आपसे यह याचना करता हूँ कि कभी भी मेरी पराजय न हो और मेरे द्वारा आपका ध्यान किये जानेपर आप मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दें॥ ४१ ॥ [हे प्रभो !] आपके चरणारविन्दोंका कभी भी मुझे विस्मरण न हो और सभी देवताओंमें मुझे श्रेष्ठता प्राप्त हो। अलक्ष्य अर्थात् अदर्शनीय होनेपर भी मुझे आज आपका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है, इसलिये आप लक्ष्य विनायक नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त करें और अपने भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेके लिये आप कल्पवृक्षके समान बनें ॥ ४२-४३॥ लक्ष्यविनायक बोले- हे स्कन्द ! वह सब कुछ पूर्ण होगा, जो आज तुमने मुझसे प्रार्थना की है। कभी भी तुम्हें मेरा विस्मरण नहीं होगा। जब-जब तुम मेरा ध्यान करोगे, तब-तब तुम मेरा सान्निध्य प्राप्त करोगे। तुम्हारे शत्रुओंकी पराजय होगी और तुम देवताओंमें श्रेष्ठ पद प्राप्त करोगे ॥ ४४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार स्कन्दजीकी नम्रता और उनकी तपस्याके प्रभावसे प्रसन्न होकर देव गणेशजीने उन्हें माँगे गये सभी वरोंको और अपना निजी वाहन 'मयूर' भी प्रदान किया। तभीसे स्कन्दका 'मयूरध्वज' यह नाम भी प्रसिद्ध हो गया ॥ ४५-४६ ॥ गजानन बोले- तुम्हारे हाथों तारक आदि महान् असुर मृत्युको प्राप्त करेंगे। हे अनघ ! मैं तुम्हारे कथनानुसार भक्तवत्सलके रूपमें लक्ष्यविनायक इस नामसे चिरकालतक इस क्षेत्रमें निवास करूँगा ॥ ४७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर विकट नामवाले वे गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर स्कन्दने ब्राह्मणोंके साथ वहाँ गणेशजीकी महान् मूर्तिको स्थापित किया और उस समय उन्होंने उस मूर्तिका 'लक्ष्यविनायक' यह मंगलमय नाम रखा। उन्होंने एक लाख मोदकों, उतने ही पुष्पों एवं उतने ही दूर्वांकुरों तथा उन-उन प्रकारकी विविध वस्तुओंसे उस मूर्तिकी पूजा की और उतनी ही संख्यामें अर्थात् एक लाख ब्राह्मणोंको भोजन कराया। तदुपरान्त उन लक्ष्यविनायकका स्तवन करके और उन्हें प्रणाम करके स्कन्द मयूरपर आरूढ़ होकर लोगोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरके समीप गये और उनको वह सारा वृत्तान्त बतलाया तथा गणेशजीद्वारा किया गया अपना 'मयूरध्वज' नाम भी उनको बतलाया ॥ ४८-५२ ॥ तदनन्तर भगवान् शिवकी अनुमति पाकर और उनका आशीर्वाद ग्रहणकर एवं भगवान् गजाननका स्मरणकर स्कन्द तारकासुरके विनाशके लिये चल पड़े। देवताओं तथा ऋषियोंने उन्हें देवसेनापतिके पदपर अभिषिक्त किया। तदनन्तर महान् पराक्रमशाली सेनानी कार्तिकेयने तारकासुरको देखकर उसके साथ युद्ध किया ॥ ५३-५४ ॥ एक लाख वर्षतक युद्ध करनेके अनन्तर उन्होंने अपनी शक्तिके प्रहारसे उसे मार डाला। शेषनागमें भी उस युद्धका वर्णन करनेकी सामर्थ्य नहीं है ॥ ५५ ॥

२५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तारकासुरके मारे जानेपर सभी देवता, मुनिगण, लोकपाल, नाग तथा सभी मनुष्य प्रसन्न हो गये। आनन्दित होकर उन्होंने स्कन्दके ऊपर फूलोंकी वर्षा की। तदनन्तर सभी देवता तथा सभी लोग अपने-अपने निवास-स्थानोंको चले गये और वे पहलेके समान ही यज्ञ-यागादि, श्राद्धादि पितृकर्म तथा अतिथिपूजन आदि करने लगे ॥ ५६-५७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] मैंने गणेशजीकी इस प्रकारकी अद्भुत महिमाको आपसे कहा। उनके व्रतकी महिमाको भी यथार्थ रूपमें आपको बतलाया, गणेशजीके इस वरदचतुर्थीव्रतके प्रभावसे ही स्कन्दने तैंतीस करोड़ देवताओंसे भी अवध्य उस महान् असुर तारकको युद्धमें मार गिराया। इसी कारण वे स्कन्द इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी पूज्य बन गये ॥ ५८-६० ॥ व्यासजी बोले- हे प्रजापते! उन कार्तिकेयने महान् समाधिमें स्थित होकर किस स्थानपर अनुष्ठान किया था, उसे आप मुझे बतायें ॥ ६१ ॥ ब्रह्माजी बोले- जहाँपर घृष्णेश्वर नामक भगवान् शंकर विराजमान हैं, उसी स्थानपर स्कन्दने अनुष्ठान किया था। स्कन्दद्वारा वहाँपर स्थापित गणेश लक्ष्यविनायक नामसे प्रसिद्ध हो गये ॥ ६२ ॥ उसी नगरमें बादमें अत्यन्त विख्यात एल नामक राजा हुए। हे मुने! उन्हींके नामसे बादमें वह नगर भी एलनगर* के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ६३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'तारकवधका वर्णन' नामक सतासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८७ ॥ अठासीवाँ अध्याय कामदेवके दग्ध किये जानेपर कामपत्नी रतिद्वारा भगवान् शिवकी प्रार्थना, प्रसन्न होकर शिवद्वारा उसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति तथा कामदेवके सदेह होनेका वरदान दिया जाना, कामदेवद्वारा गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका अनुष्ठान तथा गणेशजीकी आराधना मुनि बोले- हे ब्रह्मन्! मैंने गणेशजीके व्रतसे सम्बद्ध आख्यानको सुना, यदि उन भगवान् शंकरने अपनी क्रोधाग्निसे कामदेवको भस्म कर डाला, तो फिर वह कामदेव आज भी सभी लोगोंमें व्याप्त कैसे दिखायी देता है? हे चतुर्मुख ब्रह्माजी! यह सब मुझे विस्तारसे बतलाइये ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले- जब भगवान् शंकरने रुष्ट होकर अपना तीसरा नेत्र खोला था, तब अपने पति कामदेवका अपराध जानकर कामपत्नी रति मृत कामदेवके निमित्त विलाप करती हुई भगवान् शंकरके पास पहुँची और उन्हें साष्टांग प्रणामकर अपनी बुद्धिके अनुसार उनकी स्तुति करने लगी ॥ ३-४ ॥ रति बोली- मैं देवी पार्वतीके स्वामी तथा मस्तकमें तीसरा नेत्र धारण करनेवाले उन भगवान् वृषध्वजको प्रणाम करती हूँ, जो सत्त्वगुणका आश्रय लेकर समस्त जगत्‌का पालन करते हैं और रजोगुणसे सम्पन्न होकर समस्त लोकोंकी सृष्टि करते हैं ॥ ५ ॥ सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी वे महेश्वर तमोगुणसे आविष्ट शरीर धारणकर अपनी इच्छासे जगत्‌का संहार करते हैं। जो हाथमें कपाल धारण करते हैं और भिक्षा ग्रहणकर भी लोगोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करते हैं। जो भगवान् शिव स्वेच्छासे सब कुछ करने, कुछ भी न करने तथा कुछका कुछ करनेका सामर्थ्य रखनेवाले हैं और महान् पराक्रमसे सम्पन्न हैं; दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले ऐसे वे महेश्वर शिव पतिसे हीन मुझ अबलाको शरण प्रदान करें ॥ ६-७ ॥ वे भगवान् शिव शीघ्र ही मेरे मृत पतिको जीवनदान दे करके शरणमें आयी हुई मुझको सौभाग्यशाली बनायें, यदि ऐसा नहीं होता है, तो हे ईश! मैं अपने प्राणोंका त्याग करके आपकी कीर्तिको अपकीर्तिमें बदल दूँगी ॥ ८ ॥ *एलनगरका प्राचीन नाम 'एलारपुरक्षेत्र' है। यह वर्तमानमें महाराष्ट्र-प्रान्तके औरंगाबाद जिलेमें स्थित है। इसका नाम बेरोल या बेरूल है। घृष्णेश्वर (घुश्मेश्वर) ज्योतिर्लिंग यहीं है। उसी मन्दिरमें गणेशजीकी भी मूर्ति है।

उ०ख०-अ०८८ ] * कामदेवके दग्ध किये जानेपर कामपत्नी रतिद्वारा भगवान् शिवकी प्रार्थना * २५७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

(बायाँ स्तम्भ) ब्रह्माजी बोले—रतिके द्वारा इस प्रकारसे स्तुत हुए भगवान् शिव उसपर प्रसन्न हो गये और बोले— ॥ ८१/२ ॥ शम्भु बोले—सुन्दर मुखमण्डलवाली हे कामदेवकी पत्नी ! हे महाभागे ! तुम वर माँगो। तुम्हारी इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर तुम्हारे मनमें विद्यमान जो-जो कामनाएँ हैं, मैं उन सभीको देता हूँ॥ ९१/२ ॥ भगवान् शिवके इस प्रकारके वचनको सुनकर रति अत्यन्त प्रसन्न हो गयी। उसने उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर सौभाग्यकी अभिलाषा करनेवाली वह रति अत्यन्त व्याकुल होकर उन भगवान् शिवसे बोली— ॥ १०१/२ ॥ रति बोली—हे स्वामिन् ! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मेरे श्रेष्ठ वचनको सुनें। हे त्रिलोचन ! यद्यपि पृथ्वी, आकाश तथा पातालमें भी स्त्रियोंमें कामिनियोंके गुण होते हैं, किंतु उन सबमें किसीमें भी मेरे लावण्यके तुल्य लावण्य लेशमात्र भी नहीं है ॥ ११-१२ ॥ मुझे देखकर इन्द्र आदि देवताओंने भी लज्जारहित होकर अपने तेजका परित्याग कर दिया था। उससे मुझे महान् लज्जा उत्पन्न हो गयी थी, उस लज्जाको आप दूर कर दें। हे शंकर ! मेरे पति कामदेवके न रहनेपर मेरा सौन्दर्य सर्वथा निष्प्रयोजन हो गया है। 'कामपत्नी रति विधवा हो गयी है' इस प्रकारकी

(दायाँ स्तम्भ) अपकीर्ति मुझे जला डाल रही है ॥ १३-१४॥ हे देवेश ! हे दयानिधे ! मुझे पतिका दानकर मेरी रक्षा कीजिये। इस प्रकारसे उस रतिके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर लोगोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकर कामदेवकी पत्नी रतिको आनन्दित करते हुए स्निग्ध वाणीमें बोले ॥ १५१/२ ॥ शिव बोले—हे कल्याणि ! तुम चिन्ता मत करो और अब लज्जा भी मत करो। हे बाले ! तुम्हारे द्वारा स्मरणमात्र किये जानेपर वे कामदेव तुम्हें दर्शन देंगे। मनसे चिन्तित किये जानेपर भी वे तुम्हारे पास आ जायँगे। इसी कारण 'मनोभू' उनका यह नाम प्रसिद्ध होगा ॥ १६-१७ ॥ कामदेव तुम्हारे सभी मनोरथोंको पूर्ण करेंगे और तुम सर्वत्र मान्य हो जाओगी। जब वे भगवान् विष्णुके द्वारा देवी लक्ष्मीसे उत्पन्न होंगे, तब प्रद्युम्न नामसे तुम्हारे पतिके रूपमें लोगोंमें प्रसिद्ध होंगे। हे महाभागे ! इस समय तुम अपने घर लौट जाओ ॥ १८-१९ ॥ शिवकी आज्ञा मानकर वह रति अपने अत्यन्त सुन्दर भवनमें आ गयी। वहाँ आकर उसने अपने पतिका स्मरण किया, तो वे अनंग उसके समक्ष प्रकट हो गये। ईश्वरकी इच्छासे ही वे अनंग उसके सामने प्रत्यक्ष प्रकट हुए, तब आश्चर्यचकित वह रति अपने पतिके साथ अत्यन्त आनन्दित हो गयी। तदनन्तर वे अनंग भगवान् शिवके पास गये और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगे— ॥ २०-२११/२ ॥ अनंग बोले—हे देवेश्वर ! बिना अपराधके ही मुझे आपने अनंग (बिना देहवाला) क्यों बना दिया ? ॥ २२ ॥ हे विभो ! आपसे ही स्कन्दकी उत्पत्ति होगी—ऐसा जाननेवाले एवं तारकासुरद्वारा पीड़ित इन्द्रादि देवताओं तथा मुनियोंने ही आपकी तपस्याको भंग करनेके लिये मुझसे कहा था। इसीलिये मैंने सभीका उपकार करनेकी दृष्टिसे वैसा कर्म किया था ॥ २३-२४ ॥ तीनों लोकोंमें परोपकारके समान दूसरा कोई पुण्य नहीं है। हे सुरेश्वर ! मेरे लिये वह सब मेरे दुर्भाग्यके कारण विपरीत ही हुआ ॥ २५ ॥

२५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

आजसे पहले तैंतीस करोड़ देवताओंमें मैं ही सबसे अधिक सुन्दर था और सभीके द्वारा सुन्दर पुरुषकी उपमा मुझसे ही दी जाती रही है। हे देवेश ! अपने शरीरसे रहित मैं प्रेतकी भाँति कैसे रहूँ? अतः हे महादेव ! कृपा करके आप मुझपर अनुग्रह करें ॥ २६-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर प्रणाम करनेवाले उन अनंगको भगवान् शिवने गणेशजीका एकाक्षर मन्त्र प्रदान किया और उसका अनुष्ठान करनेके लिये उन्हें आज्ञा प्रदान की। तदनन्तर अनंग एक रमणीय जनस्थानमें गये, वह स्थान सब प्रकारकी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला था। भगवान् शंकरजीकी आज्ञासे अनंगने वहाँ अनुष्ठान किया। उन्होंने गणेशजीके ध्यानपरायण होकर उनके एकाक्षर मन्त्रका जप करते हुए सौ वर्षपर्यन्त महान् तप किया ॥ २८-३० ॥ रतिके साथ [वहाँ] स्थित वे नित्य वायुका ही आहार करते थे। तदनन्तर देवदेवेश भगवान् गजानन उनपर प्रसन्न हो गये और उनके समक्ष प्रकट हो गये। उनकी दस भुजाएँ थीं, वे श्रेष्ठ मुकुटसे सुशोभित थे, देदीप्यमान रत्नोंकी आभासे रमणीय, कुण्डलों और बाजूबन्दोंसे वे मण्डित थे, करोड़ों सूर्योंके समान उनकी आभा थी, मोतियोंकी मालाओंसे वे सुशोभित हो रहे थे, उन्होंने दिव्य मालाएँ और वस्त्र धारण कर रखे थे, दिव्य गन्धोंका अनुलेपन किया हुआ था, उनकी सूँड़ तथा उनका मुखमण्डल सिन्दूरके समान अरुण वर्णका था। दस आयुधवाले उनके दस हाथ सुशोभित हो रहे थे, उनकी नाभि शेषनागसे अलंकृत थी, विविध प्रकारके अलंकारोंसे वे सुशोभित हो रहे थे, उनके कन्धे सिंहके समान थे, वे महान् समृद्धिसे सम्पन्न तथा अपनी चीत्कार ध्वनिसे अखिल लोकोंको त्रास पहुँचानेवाले थे ॥ ३१-३४ १/२ ॥ भगवान् गणेशजीके प्रकट हो जानेपर इन्द्र आदि देवता, सभी मुनिगण, अप्सराओं, यक्षों, गन्धर्वों तथा किन्नरोंके साथ वहाँ आये और दिव्य वाद्योंकी ध्वनि करते हुए उन सबने पृथक्-पृथक् होकर सोलह उपचारोंके द्वारा भगवान् गणेशजीकी पूजा की ॥ ३५-३६ १/२ ॥

तदनन्तर उठकर कामदेवने सर्वप्रथम सभी देवताओंको प्रणाम करके उनके चरणोंमें वन्दना की, इसी प्रकार मुनियोंको भी उन्होंने प्रणाम किया। तदनन्तर कृपालु भगवान् गणेशकी महिमाका वे गान करने लगे ॥ ३७-३८ ॥ काम बोले—हे भक्तवत्सल ! आप धन्य हैं। सभी देवताओंमें आप परब्रह्मस्वरूप हैं। आप निराकार होनेपर भी साकाररूपमें प्रकट हुए हैं ॥ ३९ ॥ आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया है। मेरी तपस्या भी आज धन्यतर हो गयी है, जो कि सभी दुःखोंका मोचन करनेवाले आपके युगल-चरणोंका आज मुझे दर्शन हुआ है ॥ ४० ॥ आपका दर्शन सभी सिद्धियोंका कारण और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इस चतुर्विध पुरुषार्थको देनेवाला है। आज मेरे दोनों नेत्र धन्य हो गये हैं, जिन्होंने परम पुरुष परमात्माका दर्शन किया है ॥ ४१ ॥ जिनके यथार्थ स्वरूपको न वेदान्तदर्शनके विद्वान् जानते हैं, न सांख्यदर्शनके मनीषी और न योगदर्शनकार महर्षि पतंजलि आदि ही जानते हैं। वे 'नेति-नेति' कहकर मौन हो जाते हैं। जिनके स्वरूप-निर्धारणमें वेद भी कुण्ठित हो जाता है। जिन अखिलेश्वरके एक-एक रोम-कूपमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड विराजमान हैं, उन प्रभु गणेशजीका मैंने जिस मन्त्रके प्रभावसे दर्शन किया है, वह मन्त्र भी अत्यन्त धन्य है ॥ ४२-४३ ॥ गणेशजी बोले—हे रतिपते ! तुमने ठीक ही कहा है, ब्रह्मा आदि देवता भी मुझे नहीं जानते हैं। जब मैं साकार रूप धारण करता हूँ, तब वे मुझे जान पाते हैं ॥ ४४ ॥ हे काम ! मैं तुम्हारी तपस्या और मन्त्रानुष्ठानसे प्रसन्न हुआ हूँ, इसी कारण इस समय तुमने मेरे अनुग्रहसे ही मेरा दर्शन किया है। हे काम ! मुझसे तुम सम्पूर्ण मनोरथोंको माँग लो, मैं तुम्हें इच्छित वर प्रदान करता हूँ ॥ ४५ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—भगवान् गणेशका ऐसा वचन सुनकर मनोभव कामदेव उनसे पुनः बोले और भगवान् शिवद्वारा किये सम्पूर्ण वृत्तान्तको उन्हें क्रमशः बतलाया। कामदेवने प्रसन्न होकर वर प्रदान करनेवाले उन भगवान् गणेशजीको अपनी अनंगताकी प्राप्ति, रतिके विलाप, मन्त्रकी प्राप्ति,

उ०ख०-अ०८९ ] * गणेशजीद्वारा कामदेवको अनेक वरोंकी प्राप्ति * २५९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

२६० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- उन्होंने अकेले ही बहुतोंपर विजय प्राप्त कर ली। वे कामदेव ही 'प्रद्युम्न' इस नामसे विख्यात हुए। तदनन्तर वे रति (मायावती)-को लेकर [द्वारका] पुरीको चले गये ॥ १२-१३॥ गणेशजीकी कृपासे वे सभी देवोंके लिये मान्य, तीनों लोकोंमें विजय प्राप्त करनेवाले तथा आनन्दित होकर परम प्रसन्न हो गये। रुक्मिणी आदि स्त्रियाँ उन्हें दूसरे कृष्णके समान ही देखकर लज्जित हो उठीं और उठकर इधर-उधर चली गयीं ॥ १४-१५ ॥ तदनन्तर नारदजीके कथनानुसार उन्हें अपना पुत्र जानकर वे सब अत्यन्त आनन्दित हो गयीं और उनके समीप जाकर उन्होंने उनका आलिंगन किया। प्रद्युम्नके साथ आयी मायावतीरूपा रतिने भी उन सभीको प्रणाम किया। उनके वहाँ आनेपर उस द्वारकापुरीके सभी लोग अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ १६ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे महामुने व्यासजी! इस प्रकार मैंने आपको जनस्थानमें स्थित गणेशजीकी महिमाका निरूपण किया। उस स्थानपर ही राम [के भ्राता लक्ष्मण]-ने शूर्पणखाका नासिका-छेदन किया था, इसी कारण वह जनस्थान 'नासिक' इस नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १७-१८॥ वहाँके पत्थरके टुकड़े आज भी मोदक-जैसे दिखायी देते हैं। इस प्रकार कामदेवने षडक्षर मन्त्रके द्वारा गजाननदेवकी वैसे ही आराधना की, जिस प्रकार कि शेषनागने उनकी आराधना की थी। [गणेशोपासनाके] फलस्वरूप रति तथा कामदेव (मायावती और प्रद्युम्न) दोनों अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ १९-२० ॥ व्यासजी बोले- ब्रह्मन्! शेषनागने भगवान् गजाननकी आराधना किस प्रकार की थी, किसलिये की थी और प्रसन्न हुए गणेशजीसे उन्होंने किस वस्तुको प्राप्त किया था? हे चतुरानन ब्रह्माजी! यह सब मुझे विस्तारसे बतलाइये; क्योंकि भगवान्की कथाके विषयमें प्रश्न करनेवाले, कथा सुननेवाले तथा कथाको बतलानेवाले- तीनोंके पुण्यकी वृद्धि होती है ॥ २१-२२॥ ब्रह्माजी बोले-हे ब्रह्मन्! आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। मैं उस कथारूपी अमृतको बताता हूँ। सत्यवतीके पुत्र हे व्यासजी ! आप सावधान होकर वह सब सुनें ॥ २३ ॥ हे मुने! किसी समयकी बात है, पार्वतीजीके साथ भगवान् शिव सुन्दर शिखरवाले श्रेष्ठ हिमालयपर्वतकी चोटीपर सुखपूर्वक विराजमान थे। वह पर्वत विविध प्रकारके वृक्षों तथा लताओंसे परिव्याप्त तथा झरनोंकी

उ०ख०-अ०८९ ] * गणेशजीद्वारा कामदेवको अनेक वरोंकी प्राप्ति * २६१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ध्वनिसे निनादित था। स्वर्ण-कमलोंपर निवास करनेवाले | समुद्र-मन्थनमें सहयोग प्रदान किया था, तभी देवताओंने भ्रमर वहाँ गुंजन कर रहे थे। चम्पक, अशोक, बकुल | अमृत प्राप्त किया था और तभी उन्होंने अमरत्व प्राप्त तथा मालती-पुष्पोंसे सुगन्धित वायु उस पर्वतके शिखरपर | किया था, अतः मुझसे श्रेष्ठ और कोई दूसरा नहीं है। निवास करनेवाले जनोंके चित्तको अत्यन्त आह्लादित कर | उन शेषनागके मनके अभिमानको जानकर तीनों लोकोंका रही थी॥ २४-२६॥ | संहार करनेवाले तथा कल्याण करनेवाले और सब कुछ उस समय गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष, किन्नर, देवता, | देख लेनेवाले भगवान् शिव मौन हो गये और फिर मुनिगण तथा नाग उन गिरिजापति भगवान् शंकरका | सहसा उठ खड़े हुए॥ ३५-३६॥ दर्शन करनेके लिये वहाँ आये। उनमेंसे कुछने साष्टांग | उन्होंने उस प्रकारके अभिमानमें चूर शेषनागको दण्डवत् प्रणामकर उनका अभिवादन किया। गन्धर्वोंने | भूमिपर पटक दिया, तब उनका एक-एक सिर दस-दस उच्च स्वरसे गान किया और अप्सराएँ नृत्य करने | भागोंमें विभक्त हो गया। इससे वे शेषनाग आधे प्रहरतक लगीं॥ २७-२८॥ | मूर्च्छित और चेतनाहीन-से हो गये। तभीसे वे शेषनाग उन्होंने दस भुजाधारी, व्याघ्राम्बर धारण किये हुए, | हजार फणोंसे सुशोभित हो गये॥ ३७-३८॥ नन्दी तथा भृंगी आदि गणोंसे परिव्याप्त, भालमें चन्द्रमाको | प्राणोंके बच जानेपर वे शेषनाग सोचने लगे कि धारण किये हुए, त्रिशूल लिये हुए, सारे शरीरमें भस्म | मैं तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् शिवका आभूषण था लगाये हुए, शेषनागको सिरपर धारण किये हुए, | और सम्पूर्ण नागोंका भूषणस्वरूप था॥ ३९॥ कल्याण करनेवाले तथा वृषभपर आरूढ़ भगवान् शिवकी | लेकिन आज न जाने किस कर्मके फलस्वरूप इस पूजा की। अन्य देवोंने [भी] मानसिक उपचारोंद्वारा | अवस्थाको प्राप्त हो गया हूँ। जैसे पंखहीन पक्षी चलनेमें भगवान् शिवका पूजन किया॥ २९-३०॥ | असमर्थ होता है, वैसे ही आज मैं चलनेमें असमर्थ हो कोई-कोई अपनी दोनों आँखें बन्दकर उनका | गया हूँ। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ। इस समय कौन मेरा ध्यान करने लगे। वसिष्ठ, वामदेव, जमदग्नि, द्वित, त्रित, | रक्षक हो सकता है, और ऐसा कौन है, जो मुझे अपनी अत्रि, कण्व, भरद्वाज तथा गौतम आदि मुनीश्वर विविध | पूर्वावस्थाको प्राप्त करनेका मंगलमय उपाय बता सकता स्तुतियोंके द्वारा उन पार्वतीपति भगवान् शंकरका स्तवन | है? अथवा कौन है, जो मेरे दुःखको दूर कर सकता है, करने लगे॥ ३१-३२॥ | इस प्रकार वे अत्यन्त चिन्तातुर हो उठे। उसी समय उन्होंने जब वे देवता तथा मुनिगण वहाँ भगवान् शंकरकी | मार्गमें जाते हुए मुनि नारदजीको देखा॥ ४०-४२॥ आराधना कर रहे थे, उस समय शेषनाग अत्यन्त गर्वित | जैसे कोई भिक्षुक स्वप्नमें धन-सम्पत्ति प्राप्तकर हो उठे कि तीनों लोकोंमें मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ, दूसरा | कुछ प्रसन्न हो उठता है, वैसे ही वे नागराज शेष उन्हें और कोई श्रेष्ठ नहीं है। शिव [यदि] श्रेष्ठतर हैं तो | देखकर प्रसन्न हुए। नारदजीने अत्यन्त कष्टमें पड़े हुए मैं तो उनके भी सिरपर विराजमान हूँ, इस पृथ्वीको | उन नागराजको अपने समक्ष देखा॥ ४३॥ धारण करनेकी शक्ति मुझमें ही है और कहीं किसीमें | उन्हें चेष्टारहित, श्वासक्रियासे हीन तथा एक नहीं॥ ३३-३४॥ | मुनिकी भाँति ध्याननिष्ठ देखकर सब कुछ जाननेवाले मेरे कुलमें उत्पन्न वासुकि नागने जब रस्सी बनकर | होनेपर भी नारदजीने उन शेषसे पूछा- ॥ ४४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कामके पुनर्जन्मसम्बन्धी वृत्तान्तका वर्णन' नामक नवासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥८९॥

नब्बेवाँ अध्याय

२६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 नब्बेवाँ अध्याय देवर्षि नारदजीका शेषनागको गणेशोपासनाकी दीक्षा देना, शेषनागद्वारा षडक्षर मन्त्रका अनुष्ठान, प्रसन्न होकर गणेशजीका उन्हें दिव्यस्वरूपमें दर्शन देना, शेषनागद्वारा गणेश-स्तवन और अनेक वरोंकी प्राप्ति, गणेशजीकी कृपासे शेषनागका सहस्र सिरवाला होना, शेषनागका धरणीधर नामसे गणेश-प्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना नारदजी बोले-[हे नागराज!] तुम इस प्रकारसे तेजरहित और अत्यन्त दुखी क्यों हुए हो? तुम्हारे सिर कैसे फूटे हैं और तुमने किस मुनिका अत्यन्त अप्रिय किया है? क्या तुमसे भगवान् शिव नाराज हैं? अथवा तुमने गर्व क्यों किया था? हे शेष! इन सबका कारण मुझे बताओ, तभी मैं उसको दूर करनेका उपाय बतलाऊँगा ॥ १-२॥ तुम्हारे बिना कौन ऐसा है, जो चराचर जीवोंसे समन्वित इस पृथ्वीको धारण कर सकता है। इतनेपर भी जब वे शेषनाग कुछ नहीं बोले, तो मुनि नारदजीने स्वयं ही उन नागराजको अपना पद पुनः प्राप्त करनेका शुभ उपाय बताया ॥ ३१/२॥ नारदजी बोला- सम्पूर्ण कलाओंके निधान हे शेषनाग ! मेरे कथनको ध्यानपूर्वक सुनो। मैं वह उपाय बतला रहा हूँ, जिससे ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवता भी तुम्हारे सेवकके समान हो जायँगे और तुम इस सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने ऊपर उसी प्रकार धारण कर सकोगे, जैसे कि एक बालक पुष्पकी मालाको धारण कर लेता है ॥ ४-५ ॥ शेषनाग बोले-मेरा कोई जन्मान्तरीय पुण्य था, जिसके प्रभावसे अकस्मात् मुझे आपका दर्शन हुआ। आगे भी ठीक ही होगा, इसमें कोई संशय नहीं ॥ ६ ॥ अन्यथा जो पुण्यकर्म नहीं करते हैं, उन्हें आपका दर्शन कैसे हो सकता है? इस समय मेरा शरीर अत्यन्त विह्वल हो गया है, अतः मैं पृथ्वीको धारण करनेमें असमर्थ हूँ। हे मुने! आप वह उपाय बताइये, जिससे कि मैं पूर्वके समान हो जाऊँ ॥ ७१/२ ॥ नारदजी बोले-हे नागराज! मैं तुमको उन भगवान् गणेशजीके महामन्त्रको बताता हूँ, जिनके कृपाप्रसादसे इन्द्र आदि देवताओैंने अपने-अपने पद प्राप्त किये थे और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव जिनकी आज्ञासे सृष्टि, स्थिति तथा संहारका कार्य करते हैं ॥ ८-९ ॥ उन सर्वेश्वर भगवान् गणेशजीके प्रसन्न होनेपर तुम अपनी पूर्वावस्थाको प्राप्त कर लोगे। तुम्हारी दीन दशा देखकर मेरा मन अत्यन्त दयार्द्र हो उठा है ॥ १० ॥ इसी कारण मैं तुम्हें गणेशजीका षडक्षर मन्त्र प्रदान करता हूँ। इसका अनुष्ठानमात्र करनेसे भगवान् गजानन तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हो जायँगे और तुम उन सभी कामनाओंको प्राप्त कर लोगे, जिन-जिनकी तुम उनसे याचना करोगे ॥ १११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-शेषनागको उपदेश देकर देवर्षि नारद अन्तर्धान हो गये और शेषनागने भी तपस्या करनेके लिये अत्यन्त शुभ निश्चय करके अपनी सभी इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे लौटाकर उन गणेशजीका ध्यान करते हुए एक हजार वर्षोंतक उस श्रेष्ठ (षडक्षर) मन्त्रका जप किया। मन्त्रानुष्ठान पूरा होनेपर उन्होंने देवाधिदेव भगवान् गजाननका अपने समक्ष दर्शन किया ॥ १२-१४ ॥ वे सिंहपर आरूढ़ थे, उनके तीन नेत्र थे, दस भुजाएँ थीं, वे नागको धारण किये थे तथा कुण्डल एवं बाजूबन्द पहने हुए थे। उन्होंने वक्षःस्थलपर मोतियोंकी माला धारण की थी, उनका मुकुट अत्यन्त सुन्दर था, वे रत्नमुद्रा तथा अक्षसूत्र लिये हुए थे। वे अनेकों देवों तथा ऋषिवृन्दोंद्वारा निरन्तर सेवित हो रहे थे, उनकी सूँड़ टेढ़ी थी और मुख हाथीका था। वे भक्तजनोंकी अभिलाषाको परिपूर्ण करनेके लिये विग्रह धारण किये थे, वे देवताओं तथा मनुष्योंको वर देनेवाले थे और आराधना करनेवालेको उसका मनोभिलषित पदार्थ प्रदान करनेवाले थे ॥ १५ ॥ शेषनागने सिद्धि-बुद्धि नामक दो पत्नियोंसे समन्वित