श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 248, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] देवता बोले— हे प्रभो! आप पृथ्वी, आकाश, वायु, तेज, जल, सूर्य, चन्द्र तथा यजमानरूपमें स्थित हैं। हे शंकर! आप ही अपनी इच्छासे इस चराचर जगत्की सृष्टि करते हैं, आप ही इसका पालन-पोषण करते हैं और आप ही इस सब कुछका संहार भी करते हैं॥ २६॥ हे प्रभो! आप तो दूसरेके दुःखका निवारण करनेवाले हैं, फिर आपके लिये आज अपनी कीर्तिको दूसरेके हाथोंमें सौंपना उचित नहीं है। अतः आप तारकासुरका विनाश करें अथवा अत्यन्त दुखित चित्तवाले और आपकी सेवामें संलग्न मनवाले सभी मुनियों तथा देवोंका विनाश करें॥ २७॥ हे गिरीश! आपको छोड़कर हम अन्य किसकी शरण ग्रहण करें? हे महेश्वर! हे भगवन्! हम किसका भजन करें? पापोंका नाश करनेवाले हे पार्वतीपति! किससे हम अपनी व्यथा कहें? हे अखिलेश्वर! आपको छोड़कर कौन हमारी रक्षा करनेमें समर्थ है?॥ २८॥ ब्रह्माजी बोले— जब वे इस प्रकार स्तुति कर रहे थे, उसी बीच उन्हें यह आकाशवाणी सुनायी दी— 'हे देवो! जब शंकरजीका पुत्र होगा, तभी इस तारकासुरका विनाश होगा, इसके लिये आप लोग प्रयत्न करें।' आकाशवाणी सुनकर सभी देवता अत्यन्त हर्षमें भर गये और इन्द्र आदि वे देवता कैलासपर भगवान् शंकरजीके स्थानपर गये। किंतु वहाँ उन्होंने भगवान् शंकरको नहीं देखा। वहाँ देवताओंने अपने समक्ष मूलप्रकृतिस्वरूपा भगवती उमाका दर्शन किया। सभी देवताओंने उनसे निवेदन किया कि हे तारके! आप तारक मन्त्र प्रणवका ज्ञान प्रदान करनेवाली हैं। आप तीनों लोकोंको पीड़ा पहुँचानेवाले दुष्ट तारकासुरद्वारा अपने स्थानसे च्युत कर दिये गये मुनियों तथा देवताओंकी रक्षा करें और हे मात:! जैसे उसका विनाश हो सके, उस उपायका आप चिन्तन करें॥ २९-३३॥ हे शर्वाणि! आप तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाली हैं, आप देवमाताको हम प्रणाम करते हैं। हे त्रिपुरस्वरूपा! हे परात्परकलारूपा! आप ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा स्तुत होनेवाली हैं। आपका यथार्थ स्वरूप वेदोंद्वारा भी अज्ञेय है। हे शंकरप्रिये! आप जगत्का कल्याण करें। हे
[दायाँ स्तम्भ] अनघे! आप अपनी इच्छासे अपना सुन्दर स्वरूप धारण करनेवाली हैं, असुरोंका संहार करनेवाली हैं और इस विश्वकी आदिकारणभूता हैं॥ ३४॥ ब्रह्माजी बोले— इस प्रकारसे प्रार्थित वे जगन्माता भगवती पार्वती उन देवताओंसे बोलीं— 'आकाशवाणीको मैंने जान लिया है, वे शंकर निश्चित ही कल्याण करेंगे। जहाँपर वे भगवान् शंकर स्थित हैं, मेरे साथ ही आप सभी वहाँ चलें। वे भगवान् शंकर उत्तम नियमोंका पालन करते हुए परम तप कर रहे हैं'॥ ३५-३६॥ सभी देवताओंसे इस प्रकार कहकर उन पार्वतींने भिल्लिका वेश धारण किया, जिससे कि उसे देखकर वे परम योगी शिव कामके बाणोंके वशीभूत हो जायँ। उनका वह रमणीय स्वरूप देखकर उस समय कुछ देवता भी कामविह्वल हो गये। उन सर्वांगसुन्दरीको देखकर उर्वशी, मेनका, रम्भा, पूर्वचित्ति आदि अप्सराएँ तथा कामपत्नी रति भी लज्जित हो रही थीं। हे ब्रह्मन्! हे व्यासजी! तदनन्तर सभी देवता और वे गिरिपुत्री पार्वती उस समय भगवान् शिवके पास पहुँचे॥ ३७-३९॥ उन सभी देवताओंने स्थाणुभूत उन स्थाणु शिवका दर्शन किया। उनके नेत्र ध्यानावस्थामें निश्चल थे। वे मनसे परब्रह्मका ध्यान और जप कर रहे थे, वे सभी प्रकारके संग्रहोंसे रहित थे, भिल्लीका वेश धारण की हुई उन पार्वतींने भी उन त्रिलोचन शिवका दर्शन किया। तदनन्तर देवी उमाने सभी देवताओंसे सुखपूर्वक किया जानेवाला उपाय बताया॥ ४०-४१॥ [और कहा— हे देवो!] ये सदाशिव देहके भानसे रहित होकर तपस्यामें एकनिष्ठ होकर बैठे हैं, अतः इनको देहका भान करानेके लिये आपलोग कामदेवसे प्रार्थना करें। ये एकनिष्ठ सदाशिव जब उस कामके बाणसे विद्ध होंगे, तो इनका देहभाव जाग्रत् हो जायगा और तब तुम्हारा कार्य हो जायगा॥ ४२-४३॥ तदनन्तर सभी देवताओंने उत्कट कामदेवका स्मरण किया। उस कामदेवके उपस्थित हो जानेपर अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये निश्चययुक्त बुद्धिवाले देवताओंने उसे अपना प्रयोजन बतलाया। दूसरे देवताओंने अपना कार्य सम्पन्न करनेके लिये कामदेवकी प्रार्थना करते हुए कहा— ॥ ४४१/२ ॥