भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 656 में से

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पृष्ठ 247

उ०ख०-अ०८३] * तारकासुरका आख्यान * २४५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गन्धर्व, नाग तथा राक्षस आदि किसीके भी हाथों तथा उनके शस्त्रोंसे तुम्हारी किसी प्रकार भी कहीं भी मृत्यु नहीं होगी, जब कार्तिकेय प्रकट होंगे, तब तुम्हारा मरण होगा। 'हे मुने! ब्रह्माजीका ऐसा वचन सुनकर बल तथा गर्वमें भरा हुआ वह तारकासुर तीनों लोकोंमें निवास करनेवाले लोगोंको अत्यन्त पीड़ित करने लगा ॥७-९॥ उसने वेदोंके स्वाध्यायमें परायण, तप तथा अनुष्ठान करनेवाले एवं अग्निहोत्र करनेवाले और स्वधर्माचरण करनेवाले अन्य ब्राह्मणोंको भी कारागारमें डाल दिया ॥ १० ॥ सभी राजाओं तथा नागोंको अपने अधीनकर वह स्वर्गमें चला गया। [उससे भयभीत] इन्द्र आदि सभी देवता हिमालयकी गुफाओंमें छिप गये ॥ ११॥ उसके भयसे कहीं भी यज्ञ तथा पूजा आदि कार्य नहीं होते थे। वह कहता था—'मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही देवता हूँ, मैं ही ब्राह्मण हूँ, मैं ही कुलदेवता हूँ। मैं ही नमस्कार करनेयोग्य हूँ, मेरी ही पूजा करनी चाहिये, मेरे अतिरिक्त और कोई दूसरा संसारमें (बड़ा) नहीं है। जो मेरे अलावा कहीं भी और किसी दूसरेको प्रणाम करेगा अथवा उसकी पूजा करेगा, वह मेरे द्वारा दण्डनीय और ताडनीय होगा अथवा वह यमलोक चला जायगा।' इस प्रकारकी आज्ञा उसने अपने दूतोंद्वारा लोकोंमें प्रसिद्ध करवायी ॥ १२-१४॥ तभीसे सब लोग धर्म-कर्मसे हीन तथा सज्जनोंसे रहित हो गये। वे शास्त्रोंके स्वाध्यायसे रहित, वषट्कार तथा यज्ञ एवं दानसे रहित हो गये ॥ १५॥ लोगोंके कुल-धर्म उच्छिन्न हो गये, वे अपने आचारसे हीन हो गये और दुष्ट बन गये। मुनिजन तथा सभी साधु वृत्तिवाले लोगोंने पर्वतोंकी गुफाओंमें शरण ले ली। वे सभी मुनिजन भगवान् शिवसे प्रार्थना करने लगे कि हे शम्भो! आपने इस दैत्यको इतना बढ़ावा क्यों दिया है, अब हम आपकी शरणको छोड़ और किस जगदीश्वरकी शरणमें जायँ ? ॥ १६-१७ ॥ हे विभो! आप ही जगत्की सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले हैं। वह दैत्य अभिमानमें चूर होकर हम लोगोंको उसी प्रकार जला रहा है, जैसे दावाग्नि वनको जला डालती है ॥ १८ ॥ यदि आपकी संहार करनेकी ही इच्छा है, तो स्वयं संसारका संहार कर डालें, यदि ऐसा नहीं है तो उस सर्वपीडाकारी तारकासुरका आज विनाश करें ॥ १९॥ इस प्रकारकी प्रार्थनाकर वे सभी मुनिगण दुष्कर श्रेष्ठ तप करने लगे। वे पत्तोंका भक्षण करके, वायुका सेवन करके, निराहार रहकर तथा केवल जल ही पीकर तपस्या करने लगे। इस प्रकार मुनिजन उससे अज्ञात स्थानमें छिपकर तपस्यामें निरत थे। इधर उस दैत्यराज तारकासुरने देवराज इन्द्रके ऐन्द्रपदको ग्रहण कर लिया और वह ब्रह्माजीको प्रताडित करने लगा ॥ २०-२१ ॥ हे मुने ! तदनन्तर विष्णु निद्रास्थित होनेके लिये क्षीरसागरमें चले गये। भगवान् शंकर भी कैलास पर्वतको छोड़कर किसी दूसरी गुफामें चले गये ॥ २२ ॥ दिशाओंके दिक्पालों तथा दिग्गजोंने भी विविध गुफाओंका आश्रय लिया। उन सभीके स्थानोंपर दैत्यराज तारकासुरने अपने दैत्योंको नियुक्त कर दिया ॥ २३ ॥ वह निश्चल होकर इस पृथ्वीपर प्रजाओंको शासित करने लगा। जब वह अपने स्वभाववश गर्जना करने लगता था, तब स्वर्गलोक भी काँप उठता था ॥ २४॥ तब इन्द्रादि देवता पर्वतकी गुफामें जाकर पार्वतीपति भगवान् शंकरकी प्रसन्नतापूर्वक गम्भीर वाणीमें स्तुति करने लगे ॥ २५ ॥