श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२४४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तदनन्तर परशुरामजीने [कार्तवीर्यके समीप जाकर] काट डाला ॥ ४७ ॥ बड़े ही उच्च स्वरमें पृथ्वीपति कार्तवीर्यको ललकारा इक्कीस बार उन्होंने इस धरतीको क्षत्रियोंसे विहीन बना दिया और यज्ञमें दक्षिणासहित सम्पूर्ण पृथ्वीका ब्राह्मणोंको दान कर दिया ॥ ४८ ॥ तदनन्तर लोगोंने अन्य सभी देवोंसे बढ़ा-चढ़ा उनका दृढ़ पराक्रम देखकर उन परशुरामजीको भगवान् विष्णु समझकर उनकी पूजा की ॥ ४९ ॥ [ व्यासजी बोले-] हे ब्रह्मन् ! हे पुत्र ! इस प्रकारसे मैंने भगवान् गणेशकी विविध महिमा संक्षेपमें तुम्हें बतायी। हे मुनीश्वर ! उनकी सम्पूर्ण महिमाका वर्णन करनेमें सहस्र मुखवाले शेष भी समर्थ नहीं हैं। इस पृथ्वीपर जो इस [गणेशपुराणके]-के उपासनाखण्डका श्रवण करता है, वह अपने समस्त मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है और अन्तमें गणेशजीके धामको प्राप्त करता है और वहाँ वह प्रलयपर्यन्त इच्छानुसार आनन्दित होता और युद्धमें उस राजा सहस्रबाहुकी हजार भुजाओंको है॥ ५०-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'परशुरामवरदानप्राप्तिवर्णन' नामक बयासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८२ ॥ तिरासीवाँ अध्याय तारकासुरका आख्यान, ब्रह्माजीसे वरप्राप्त तारकासुरका अत्याचार, देवोंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति, भगवती उमाका प्रकट होकर तारकासुरके वधका उपाय बताना, देवताओंद्वारा कामदेवका आवाहन, कामदेवका शिवको विचलित करनेके लिये प्रस्थान मुनि बोले-हे लोकेश! परशुरामजीने किस गयी, अतः वे उस मयूरेश्वर नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुए। स्थानपर परम अद्भुत तप किया था, उसे मुझे बतानेकी वहाँ परशुरामजीने गणेशजीका अनुष्ठान किया था और कृपा करें। कथा सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही उनसे 'परशु' नामक अस्त्रको प्राप्त किया था॥ ४॥ है॥ १॥ तदनन्तर वे राम 'परशुराम' इस नामसे तीनों ब्रह्माजी बोले-चारों युगोंमें मयूरेश्वर नामसे जो लोकोंमें प्रसिद्ध हुए। हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं उस इतिहासको स्थान प्रसिद्ध है और जहाँ देवेश गणपति मयूरपर आरूढ़ बताता हूँ, आप श्रवण करें ॥ ५ ॥ होकर अवतीर्ण हुए थे, वहाँ उन्होंने कमलासुर नामक तारक नामका एक दैत्य हुआ, जो महान् बल एवं महान् दैत्यका वध किया था। चूँकि वे मयूरपर आरूढ़ पराक्रमसे सम्पन्न था। उसने हजार दिव्य वर्षोंतक होकर प्रकट हुए थे, इसलिये उनका मयूरेश्वर यह नाम अत्यन्त कठोर तपस्या की ॥ ६ ॥ प्रसिद्ध हुआ ॥ २-३ ॥ हे द्विज ! तब प्रसन्न होकर ब्रह्माजीने उसे सभीसे लोकमें देवताओं तथा मुनियोंद्वारा उनकी स्तुति की अभयप्राप्तिका वरदान दिया और कहा - 'देवर्षि, यक्ष,