श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 249, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०८४ ] * कामदेवद्वारा समाधिस्थ भगवान् शंकरको विचलित करना * २४७ आप इस चराचर जगत्के सभी प्राणियोंमें व्याप्त हैं। आपसे ही यह सृष्टि उत्पन्न होती है और यह सारा जगत् आपसे व्याप्त है, सभी पुरुष तथा स्त्रियाँ आपके द्वारा ही बलवान् बना दिये जाते हैं। आपके बिना यह सम्पूर्ण स्थावर-जंगमात्मक जगत् निःसार है। अतः आपको हम सभीका महान् कार्य अवश्य करना चाहिये ॥ ४५-४७ ॥ कामदेव बोला—मैं यद्यपि [इन महायोगीको विह्वल करके मानो] अग्निमें ही प्रवेश करने जा रहा हूँ, तथापि आपके अनुग्रहसे मैं देहके विनष्ट होनेतक आपलोगोंका कार्य अवश्य करूँगा ॥ ४८ ॥ हे देवो! यद्यपि पुष्प ही मेरा धनुष है, भ्रमर ही धनुषकी प्रत्यंचा है, स्त्रियोंका कटाक्ष ही बाण है और वसन्तऋतु ही मेरा सहयोगी है, तथापि मैं भगवान् शंकरसहित सभी देवताओंपर विजय प्राप्त कर लूँगा ॥ ४९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर देवताओंके कार्यको सिद्ध करनेके प्रयोजनसे तथा भगवान् शंकरको कामके वशीभूत करनेके लिये वह कामदेव वहाँ गया, जहाँ भगवान् शंकर स्थित थे ॥ ५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'तारकासुरोत्पत्तिकथन' नामक तिरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८३ ॥ चौरासीवाँ अध्याय कामदेवद्वारा समाधिस्थ भगवान् शंकरको विचलित करना, उनकी नेत्राग्निसे कामका दग्ध होना, पार्वतीद्वारा शंकरकी स्तुति तथा शिव-पार्वतीका कैलासगमन ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर कामदेव देवताओंके कार्यको सफल बनानेके लिये निकल पड़े और उन्होंने भगवान् शंकरका वह स्थान देखा, जो अनेक प्रकारके वृक्षों तथा लताओंसे सुशोभित था, सिंहों तथा शार्दूलोंसे सेवित था और पक्षियों तथा हिंसक पशुओंसे समन्वित था। तब कामदेवने उसी समय क्षणभरमें वहाँ एक मायामय उपवनकी संरचना की ॥ १-२ ॥ उस उपवनमें अनेक सरोवर थे, जो अमृतोपम जलसे परिपूर्ण थे। वहाँ अनेक वृक्ष तथा पुष्प थे, जिनकी सुगन्ध दो कोसतक व्याप्त थी। वहाँ भली-भाँति पके हुए जामुन, आम तथा बेरके फलवाले वृक्ष थे। उसी प्रकार उस उपवनमें केला, कटहल, नारियल, खर्जूर, इलायची, लौंग तथा मिरचके अनेकों प्रकारके वृक्ष थे। भगवान् शिवके द्वारा [इससे पूर्व] ग्रहण न की जानेवाली वह पुष्पोंकी सुगन्ध (कामदेवके प्रभावसे) उनके नासापुटोंमें प्रविष्ट हो गयी ॥ ३-५ ॥ उषाकाल होनेपर भगवान् शिवने कामदेवके द्वारा मायासे निर्मित उस अद्भुत उपवनको देखा, जो चन्द्रमाकी चाँदनीसे अत्यन्त मनोहर प्रतीत हो रहा था और अनेक फलों तथा पुष्पोंसे समन्वित था ॥ ६ ॥ उसी समय कामदेवने त्रिशूली भगवान् शंकरके मनको अपने कामबाणोंसे विद्ध कर डाला। [कामदेवद्वारा मायासे निर्मित उस वाटिकाको देखकर] भगवान् शिवने मन-ही-मन अपनी अशोकवाटिकाको धिक्कारा ॥ ७ ॥ उसी समय भगवान् शिवका देहभाव जाग्रत् हो गया, तब वे इसका कारण सोचने लगे कि किसने मेरी तपस्यामें विघ्न उपस्थित किया और इस सुन्दर उपवनकी रचना किसने की? क्रोधसे शिवके नेत्र लाल हो उठे,